संपादकीय (Editorial)

खनिज की खातिर खत्म होती खेती

  •  कुमार कृष्णन

29 अप्रैल 2023, भोपाल खनिज की खातिर खत्म होती खेती – किसानों, आदिवासियों और खेती से जुड़े अनेक लोगों के लिए आजकल विकास का मतलब उनके प्राकृतिक संसाधनों, खासकर जमीन की लूट हो गया है। आदिवासी राज्य झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। झारखंड के एक इलाके में जमीन की मारामार के अनुभवों पर कुमार कृष्णन का यह लेख।

खनन के लिए यदि ‘पांचवीं अनुसूची’ के क्षेत्रों में जमीनें ली जायेंगी, तो सबसे पहले ग्रामसभा की मंजूरी जरूरी है, अन्यथा यह गैर-कानूनी हो जायेगा। संविधान की ‘पांचवीं अनुसूची’ और ‘छठवीं अनुसूची’ ने आदिवासियों को उन इलाकों की सारी भूमि का मालिक बनाया है। ‘संथाल परगना टेनेंसी एक्ट’ के अनुसार, इस इलाके की जमीन को न तो बेचा जा सकता है और न ही इसका हस्तांतरण किया जा सकता है, चाहे वह आदिवासियों की जमीन हो या गैर-आदिवासियों की, लेकिन विकास का मॉडल दूसरे की जमीन छीनकर ही बनता है।

झारखंड में ढेर सारी कोयला खदानें हैं, लेकिन वे आदिवासियों के लिए अभिशाप हैं। गोड्डा जिला में कोयला निकालने के लिए ‘राजमहल परियोजना’ के अंतर्गत ‘ईसीएल’ (ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) लगातार कई गाँवों को विस्थापित कर रही है। गोड्डा जिला के लालमटिया प्रखंड के कई गाँव देखते-ही-देखते नक्शे से गायब होकर विकास की भेंट चढ़ गए हैं। पहले कुछ गाँवों को लालच देकर और बाद में कई गाँवों को जबरदस्ती, दमन करके विस्थापित किया गया और  खदान बनाकर कोयला निकाला गया।

बसडीहा, लोहन्डिया, डकैटा, सहित कई गाँव आज हैं ही नहीं या फिर थोड़ा बहुत बचे हैं जो कुछ दिनों में खत्म हो जायेंगे। इसी क्रम में तालझारी गाँव भी है, जहाँ आदिवासी समुदाय के संथाल जनजाति के लोग बहुसंख्यक हैं। बेहद शांत और पहाड़ी के किनारे बसे इस गाँव में बहुफसली खेती होती है, लेकिन आज यह गाँव अपने अस्तित्व के लिए सरकारी तंत्र से लड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि झारखंड के खतियानी लोगों का यह गाँव गैर-कानूनी तरीके से बसा है। सभी के पास जमीनों के दस्तावेज हैं जो कानूनन वैध भी हैं, लेकिन फिर भी इसे जबरदस्ती खनन के नाम पर विस्थापित करने के लिए गोड्डा का जिला प्रशासन हर हथकंडा अख्तियार कर रहा है।

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पिछले दिनों जब ‘ईसीएल’ खनन का अपना क्षेत्र बढ़ा रही थी और तलझारी गाँव की सीमा के पास पहुँच गई थी, उसी समय संथाल समुदाय के हजारों आदिवासी अपने परंपरागत हथियारों के साथ वहां पहुँच गए और अपनी जमीनों पर जबरदस्ती खनन का विरोध किया। गाँव वालों का कहना था कि हम ‘जान दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे।’ आदिवासी समाज के लोगों का कहना था कि ‘हमें मत उजाड़ो, हमारी जमीनें चली जायेंगी तो हम जीते जी मर जायेंगे। यहां खदान से कोई फायदा नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण और प्रकृति का नुकसान कर रही है। इसके साथ – साथ आदिवासी संस्कृति और आजीविका भी संकट में है।’ इसके बावजूद प्रशासन ‘ईसीएल’ के लिए जबरदस्ती जमीन अधिग्रहीत करने की जोर-आजमाइश करता हुआ कंपनी के एजेंट के रूप में दिखा।

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जब आदिवासी पुरुष थक गए तो आदिवासी महिलाओं ने मोर्चा संभाला। सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच टकराव ने हिंसक रूप ले लिया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वाटर-कैनन और टीयर-गैस का इस्तेमाल किया गया। इस संघर्ष में महगामा के एसडीओपी सहित सुरक्षा बलों के पांच जवान और लगभग एक दर्जन ग्रामीण घायल हुए तथा एक दर्जन से ज्यादा ग्रामीणों को हिरासत में लिया गया। संघर्ष, तनाव और ग्रामीणों की नारेबाजी के बीच ‘ईसीएल’ के अफसरों ने तालझारी गांव में अधिग्रहित जमीन पर बुलडोजर और जेसीबी की मदद से सीमांकन और समतलीकरण शुरू करा दिया। इस क्षेत्र में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।

ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ‘ईसीएल’ प्रबंधन ने पूर्व में लोगों को ठगने का काम किया है, जिसका नतीजा है कि पूर्व में हुए विस्थापित लोगों में कइयों को आज तक मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास नहीं मिला है। वहीं रैयतों की जो जमीन ली गयी है, वह ग्रामसभा की सहमति की बजाए कुछ लोगों को प्रबंधन द्वारा अपने पक्ष में करके ली गई है। ऐसे में, बगैर ग्रामसभा के भूमि-अधिग्रहण को वे नहीं मानते। आज से करीब सात-आठ साल पहले गोड्डा में अडानी-कंपनी का प्रवेश हुआ था। परसपानी गाँव में पॉवर-प्लांट लगना था, वो भी बंजर जमीन पर, लेकिन राजनीति के कारण वहाँ जमीन अधिग्रहण नहीं हो पाया। बाद में मोतिया गाँव के लोगों ने अडानी का स्वागत किया, हालांकि कुछ लोगों द्वारा विरोध भी हुआ। इस विरोध में शामिल कुछ लोगों का जमीन से मोह था, तो कुछ राजनीति से प्रेरित थे।

सदर-अस्पताल के ऊपरी तल का निर्माण इसी मद में हो रहा है और जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने का प्रयास भी ‘डीएमएफटी’ (जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट) द्वारा ही किया जा रहा है, इसलिए ‘मलाई’ के लिए सभी मिलकर गरीब आदिवासियों के घर उजाडऩे में लग गए है। तालझारी के आदिवासी रैयतों का कहना है कि यहां से उजड़े तो लगभग 200 परिवारों के समक्ष रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा। तालझारी, भेरेंडा, पहाड़पुर में रहने वाले आदिवासी ‘राजमहल परियोजना’ के लिए अपनी कृषि योग्य जमीन नहीं देंगे। इस जमीन पर किसी सूरत में खनन नहीं होगा। सामाजिक कार्यकर्ता हंसराज मीणा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को टैग कर उनसे वनवासियों और आदिवासियों की रक्षा के लिए गुहार लगाई है। उन्होंने लिखा है कि ‘देख रही हैं ना, महामहिम मुर्मू, कैसे झारखंड के गोड्डा जिले के तालझारी गांव में ‘ईसीएल’ की कोल परियोजना के लिए आदिवासियों की जमीन सुरक्षा बलों के सहारे अदाणी लूट रहा है। लोग विरोध कर रहे हैं, लेकिन आदिवासियों को यहां से खदेड़ा जा रहा है। उन्हें मारा-पीटा जा रहा है। धिक्कार है। जब जमीन ही नहीं रहेगी, तो 1932 वाला झंडा कहाँ गड़ेगा ?   

(सप्रेस)

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