डिजिटल मंडियाँ: विकल्प बढ़े, क्या किसान की सौदेबाजी भी?
लेखक: डॉ. सर्वेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, श्री दुर्गा जी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
ई-मेल:sarvesh6126@gmail.com
08 मई 2026, भोपाल: डिजिटल मंडियाँ: विकल्प बढ़े, क्या किसान की सौदेबाजी भी? – भारतीय कृषि की सबसे पुरानी विडंबना यह रही है कि किसान उत्पादन तो करता है, पर कीमत तय नहीं करता। खेत से बाजार तक की दूरी केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक रही है-जहाँ सीमित खरीदार, स्थानीय मंडियों का वर्चस्व और अपारदर्शी मूल्य-निर्धारण उसकी आय को सीमित करते रहे हैं। ऐसे में डिजिटल तकनीक का प्रवेश केवल एक सुधार नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन बदलने का दावा करता है। आज किसान के सामने ऑनलाइन बिक्री के कई रास्ते हैं, लेकिन मूल प्रश्न वही है-क्या इन विकल्पों ने उसकी सौदेबाजी की ताकत वास्तव में बढ़ाई है?
सरकारी स्तर पर ई-नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) ने डिजिटल कृषि विपणन की आधारशिला रखी है। 1,600 से अधिक मंडियों को जोड़ते हुए इस प्लेटफॉर्म ने लाखों करोड़ रुपये के व्यापार को ऑनलाइन ढाँचे में लाया है। पारदर्शी बोली और प्रत्यक्ष भुगतान जैसी सुविधाओं ने किसानों को बेहतर मूल्य खोजने का अवसर दिया है। फिर भी इसकी मूलभूत सीमा यह बनी हुई है कि किसान को अपनी उपज भौतिक मंडी में लानी पड़ती है। यह व्यवस्था डिजिटल सुविधा तो देती है, पर बाजार की वास्तविक स्वतंत्रता अभी भी सीमित रखती है।
‘‘डिजिटल कृषि बाजार ने किसानों के लिए नए विकल्प तो खोले हैं, पर उनकी मोलभाव की वास्तविक ताकत अब भी सीमित है। ई-नाम, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स और निजी प्लेटफॉर्म अवसर तो देते हैं, लेकिन डिजिटल पहुंच, जानकारी और अवसंरचना की कमी बड़ी बाधा बनी हुई है। जब तक किसान सक्षम नहीं होगा, डिजिटल क्रांति अधूरी रहेगी-ताकत तभी आएगी जब वह बाजार में अपनी शर्तों पर सौदा कर सके।‘‘
इसी के समानांतर, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओ0एन0एफ0डी0सी0) एक अधिक खुले और विकेंद्रीकृत मॉडल की ओर संकेत करता है। यहाँ किसान उत्पादक संगठन (एफ0पी0ओ0) सीधे खरीदारों से जुड़ सकते हैं, जिससे भौगोलिक सीमाएँ कमजोर पड़ती हैं। यह व्यवस्था “कहीं से भी, किसी को भी बेचने” की दिशा में एक संभावित छलांग है, हालांकि इसका लाभ अभी भी संगठित किसानों तक अधिक सीमित है।
निजी क्षेत्र ने इस परिवर्तन को और गति दी है। देहात, निन्जाकार्ट, एग्रोस्टार जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों को सीधे व्यापार, बेहतर लॉजिस्टिक्स और समयबद्ध भुगतान के विकल्प दे रहे हैं। कई मामलों में खेत से ही उपज उठाने की सुविधा भी उपलब्ध है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह मॉडल पारंपरिक मंडी व्यवस्था के समानांतर एक प्रतिस्पर्धी ढाँचा तैयार कर रहा है।
फिर भी, जमीनी हकीकत इस उत्साह को सीमित करती है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के एक छोटे गेहूँ किसान के लिए यह तय करना अब भी आसान नहीं है कि वह स्थानीय मंडी में तुरंत नकद बिक्री करे या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बेहतर कीमत की प्रतीक्षा करे, जहाँ परिवहन और समय दोनों का जोखिम जुड़ा होता है। इसी तरह महाराष्ट्र के फल उत्पादक किसानों ने कुछ निजी प्लेटफॉर्म के जरिए बेहतर दाम तो पाए हैं, लेकिन गुणवत्ता मानकों और लॉजिस्टिक शर्तों को पूरा करना हर किसान के लिए संभव नहीं होता। यह दिखाता है कि अवसर और चुनौती साथ-साथ चल रहे हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुँच, उनकी समझ और लेन-देन की सुरक्षा ये तीनों कारक लाभ को निर्धारित करते हैं। स्पष्ट मार्गदर्शन के अभाव में विकल्प कभी-कभी अवसर से अधिक भ्रम भी बन जाते हैं। डिजिटल विभाजन इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। जिन किसानों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल साक्षरता नहीं है, वे इस नई अर्थव्यवस्था से बाहर रह जाते हैं। साथ ही, पारंपरिक मंडी तंत्र से जुड़े हितों का प्रतिरोध भी इस परिवर्तन को सहज नहीं बनने देता।
स्पष्ट है कि आज किसान के पास ऑनलाइन ट्रेडिंग के कई रास्ते जैसे ई-नाम की डिजिटल मंडियाँ, ओ0एन0एफ0डी0सी0 के खुले नेटवर्क और निजी एग्री-टेक प्लेटफॉर्म हैं। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने बाजार के दरवाजे खोले हैं। परंतु दरवाजा खुलना और उसके पार जाकर बेहतर सौदा करना दो अलग वास्तविकताएँ हैं।
अंततः, डिजिटल बाजार किसान को विकल्प तो देता है, पर वास्तविक ताकत तभी देगा जब वह इन विकल्पों का सूचित, सुरक्षित और रणनीतिक उपयोग कर सके। इसलिए नीति का केंद्र केवल प्लेटफॉर्म निर्माण नहीं, बल्कि किसान को विश्वसनीय सूचना, स्थानीय भाषा में प्रशिक्षण और मजबूत अवसंरचना के माध्यम से सक्षम बनाना होना चाहिए। तभी डिजिटल क्रांति का वास्तविक अर्थ सामने आएगा जब किसान केवल बाजार तक पहुँचे नहीं, बल्कि वहाँ अपनी शर्तों पर सौदा भी कर सके।
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