फसल की खेती (Crop Cultivation)

सालों से सोयाबीन उगा रहे हैं, फिर भी नहीं मिल रही उपज? अब “जैसे-तैसे खेती” से नहीं चलेगा काम

26 मई 2026, नई दिल्ली: सालों से सोयाबीन उगा रहे हैं, फिर भी नहीं मिल रही उपज? अब “जैसे-तैसे खेती” से नहीं चलेगा काम – सोयाबीन किसानों के बीच आज सबसे बड़ी चिंता यही है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन पहले जैसा ही अटका हुआ है। किसान अच्छी बारिश होने के बावजूद उम्मीद के मुताबिक पैदावार नहीं ले पा रहे। कई क्षेत्रों में किसान 15–20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उम्मीद रखते हैं, लेकिन उत्पादन 8–10 क्विंटल तक सीमित रह जाता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर गलती कहाँ हो रही है? क्या केवल मौसम जिम्मेदार है, या खेती के तरीके में भी कुछ ऐसी गलतियाँ हैं जो धीरे-धीरे मिट्टी और फसल दोनों को कमजोर कर रही हैं?

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर द्वारा जारी नई वैज्ञानिक सलाह बताती है कि सोयाबीन में उत्पादन घटने की बड़ी वजह खेत प्रबंधन की वे गलतियाँ हैं जिन्हें किसान अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। 

सबसे बड़ी गलती: सोयाबीन में जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना

कई किसान मानते हैं कि जितना ज्यादा यूरिया डालेंगे, फसल उतनी हरी और मजबूत होगी। शुरुआत में पौधे सचमुच हरे दिखाई देते हैं, लेकिन यही बाद में नुकसान का कारण बनता है।

सोयाबीन दलहनी फसल है, जो वातावरण से नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखती है। इसलिए इसमें अत्यधिक यूरिया की जरूरत नहीं होती। वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य भारत के लिए केवल 25 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है, जिसे लगभग 56 किलो यूरिया से पूरा किया जा सकता है। 

लेकिन कई किसान 2–3 बोरी तक यूरिया डाल देते हैं। इससे पौधे केवल पत्तेदार बनते हैं, फलियाँ कम लगती हैं और फसल गिरने लगती है। ज्यादा नाइट्रोजन से रोग और कीट भी तेजी से बढ़ते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सोयाबीन में असली जरूरत फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की होती है। सल्फर की कमी होने पर दाने छोटे रह जाते हैं और तेल की मात्रा घट जाती है। इसलिए केवल यूरिया डालना उत्पादन बढ़ाने का तरीका नहीं है।

संतुलित खाद ही बढ़ाएगी उत्पादन

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने किसानों को संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। संस्थान के अनुसार मध्य क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर 56 किलो यूरिया, 375 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और 67 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) उपयोग करना लाभकारी है।

इसके अलावा 125 किलो DAP + 67 किलो MOP + 25 किलो बेंटोनाइट सल्फर का विकल्प भी दिया गया है। 

वैज्ञानिकों के अनुसार सल्फर का उपयोग करने वाले किसानों के खेतों में दानों की गुणवत्ता और तेल प्रतिशत बेहतर पाया गया है।

बिना बीजोपचार के बोवनी करना मतलब शुरुआत में ही नुकसान

कई किसान अभी भी सीधे बीज बो देते हैं। यही सबसे बड़ी शुरुआती गलती बन जाती है। बिना बीजोपचार के बीज जड़ सड़न, तना मक्खी, फफूंद और दीमक जैसे हमलों का शिकार हो जाते हैं।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने बोवनी से पहले बीजोपचार को अनिवार्य बताया है। संस्थान ने एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 2.5% + थायोफिनेट मिथाइल 11.25% + थायामेथोक्साम 25% FS को 10 मिली प्रति किलो बीज की दर से उपयोग करने की सलाह दी है। 

विशेषज्ञों के अनुसार बीजोपचार पर बहुत कम खर्च आता है, लेकिन इससे अंकुरण बेहतर होता है और शुरुआती अवस्था में पौधों की सुरक्षा मिलती है।

खेत में नरवाई जलाना मिट्टी को कमजोर कर रहा

गेहूँ कटाई के बाद कई किसान खेत की नरवाई जला देते हैं ताकि जल्दी तैयारी हो सके। लेकिन इससे मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव खत्म हो जाते हैं और जैविक कार्बन लगातार कम होता जाता है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने साफ सलाह दी है कि नरवाई जलाने के बजाय रोटावेटर और वेस्ट डीकम्पोजर का उपयोग करें। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है और नमी संरक्षण बेहतर होता है। 

हर साल गहरी जुताई भी जरूरी नहीं

कुछ किसान हर साल गहरी जुताई करते हैं, जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा करना आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने सलाह दी है कि केवल तीन साल में एक बार ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें। इससे मिट्टी की कठोर परत टूटती है और वर्षा जल नीचे तक पहुंचता है। 

एक ही किस्म पर निर्भर रहना बढ़ा रहा जोखिम

बदलते मौसम में एक ही किस्म की खेती करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि किसी रोग या मौसम का असर उस किस्म पर हुआ, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।

इसलिए राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने किसानों को कम से कम 2–3 सोयाबीन किस्में लगाने की सलाह दी है। मध्य भारत के लिए NRC 150, JS 21-72, JS 23-03, JS 22-12, JS 22-16 और NRC 165 जैसी किस्मों की अनुशंसा की गई है। 

गलत दूरी और ज्यादा बीज दर से भी घटती है उपज

कई किसान ज्यादा बीज डालकर अधिक उत्पादन की उम्मीद करते हैं, लेकिन इससे पौधों में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। रोशनी और पोषण कम मिलने से फलियाँ घट जाती हैं।

वैज्ञानिकों ने सीधी बढ़वार वाली किस्मों में 30 सेंटीमीटर और फैलाव वाली किस्मों में 45 सेंटीमीटर कतार दूरी रखने की सलाह दी है। पौधे से पौधे की दूरी 5–10 सेंटीमीटर होनी चाहिए। 

खरपतवार नियंत्रण में देरी सबसे महंगी गलती

सोयाबीन की शुरुआती अवस्था में खरपतवार सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। यदि पहले 40 दिनों तक खेत साफ नहीं रखा गया, तो उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने बोवनी पूर्व, बोवनी के तुरंत बाद और बाद की अवस्थाओं के लिए अलग-अलग खरपतवारनाशकों की अनुशंसा की है। पेंडीमेथालीन, डायक्लोसुलम, इमेजेथापायर और फोमेसाफेन जैसे रसायनों का उपयोग समय के अनुसार करने की सलाह दी गई है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि गलत समय पर खरपतवारनाशी उपयोग करने से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है। इसलिए कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही दवा का चयन करना चाहिए।

जैविक खाद और हरी खाद की अनदेखी पड़ रही भारी

लगातार रासायनिक खेती से मिट्टी की ताकत कमजोर होती जा रही है। इसी वजह से उत्पादन स्थिर हो गया है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने प्रति हेक्टेयर 5–10 टन गोबर की सड़ी खाद या 2.5 टन पोल्ट्री खाद डालने की सलाह दी है। जिन किसानों के पास सिंचाई उपलब्ध है, वे ढैंचा की हरी खाद का उपयोग करके मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ा सकते हैं। 

अब “जैसे-तैसे खेती” से नहीं चलेगा काम

विशेषज्ञों का मानना है कि आज सोयाबीन की खेती पूरी तरह वैज्ञानिक प्रबंधन मांगती है। केवल बारिश के भरोसे और पुराने तरीकों से अब अधिक उत्पादन लेना मुश्किल होता जा रहा है।

यदि किसान बीजोपचार, संतुलित उर्वरक, सही दूरी, वैज्ञानिक खरपतवार नियंत्रण और अनुशंसित किस्मों को अपनाएँ, तो सोयाबीन की लागत घटाने के साथ उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है।

यानी समस्या केवल मौसम की नहीं, बल्कि खेती की उन छोटी गलतियों की भी है जो सालों से दोहराई जा रही हैं।

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