धनिया की खेती से कमाना चाहते हैं अच्छा मुनाफा? जानें उन्नत किस्में, बीज उपचार, खाद और सिंचाई की पूरी जानकारी
24 जुलाई 2026, नई दिल्ली: धनिया की खेती से कमाना चाहते हैं अच्छा मुनाफा? जानें उन्नत किस्में, बीज उपचार, खाद और सिंचाई की पूरी जानकारी – भारत को प्राचीन काल से ही ‘मसालों की भूमि’ के रूप में जाना जाता है और धनिया देश की प्रमुख मसाला फसलों में से एक है। धनिया के बीज और हरी पत्तियां भोजन का स्वाद और सुगंध बढ़ाने के साथ-साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करें तो कम लागत में अच्छी पैदावार के साथ बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों ने धनिया की खेती के लिए मिट्टी के चयन से लेकर बुवाई, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई और रोग-कीट नियंत्रण तक कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
खेती के लिए कैसी हो मिट्टी और मौसम?
धनिया की खेती के लिए दोमट, मटियार या कछारी मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें पर्याप्त जीवांश और जल धारण क्षमता हो। खेत में पानी निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए तथा मिट्टी का पीएच 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। अच्छी पैदावार के लिए शुष्क और ठंडी जलवायु अनुकूल रहती है। बीजों के अंकुरण के लिए 25 से 26 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर माना जाता है, जबकि फूल और दाना बनने के समय पाले से बचाव जरूरी होता है।
उन्नत किस्मों का करें चयन
बेहतर उत्पादन के लिए किसानों को उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए। प्रमुख किस्मों में पंत धनिया-1, मोरोक्कन, सिम्पो एस-33, गुजरात धनिया-1, गुजरात धनिया-2, ग्वालियर-5365, जवाहर धनिया-1, सीएस-6, आरसीआर-4, यूडी-20,436, पंत हरितिमा और सिंधु शामिल हैं।
खेत की तैयारी और बीज उपचार
बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद मिलानी चाहिए। सिंचित क्षेत्र में खेत की तैयारी से पहले पलेवा करना लाभदायक रहता है। बीज बोने से पहले धनिया के दानों को दो भागों में हल्का फोड़कर 12 से 24 घंटे पानी में भिगोना चाहिए। इसके बाद 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार कर बुवाई करने से बीजजनित रोगों से बचाव होता है और अंकुरण बेहतर होता है।
कितनी रखें बीज की मात्रा?
सिंचित खेती के लिए 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर, जबकि असिंचित खेती के लिए 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना जाता है। बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी 25 से 30 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 5 से 10 सेंटीमीटर की दूरी रखें।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
अच्छी पैदावार के लिए मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना सबसे बेहतर होता है। सामान्य रूप से सिंचित क्षेत्रों में 60 किलोग्राम नत्रजन, 40 किलोग्राम फॉस्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर देने की सलाह दी जाती है। नत्रजन की एक-तिहाई मात्रा बुवाई के समय तथा शेष मात्रा पहली और दूसरी सिंचाई के दौरान देना लाभकारी रहता है।
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण
धनिया की फसल में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। पहली सिंचाई 30 से 35 दिन, दूसरी 60 से 70 दिन, तीसरी 80 से 90 दिन और चौथी 100 से 105 दिन के बीच करना लाभदायक माना जाता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए दो बार निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है। आवश्यकता पड़ने पर पेंडीमेथालीन का अंकुरण पूर्व छिड़काव भी किया जा सकता है।
रोग और कीट से ऐसे करें बचाव
धनिया की फसल में उकठा, चूर्णी फफूंदी, झुलसा और स्टेम गाल जैसे रोगों का प्रकोप हो सकता है। इनके नियंत्रण के लिए प्रमाणित बीज का उपयोग, बीज उपचार, फसल चक्र अपनाना और आवश्यकता अनुसार कार्बेन्डाजिम, थाइरम, मेंकोजेब तथा गंधक चूर्ण का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। कीटों में कटवर्म, वायर वर्म और माहू (एफिड) सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। इनके नियंत्रण के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का समय पर छिड़काव करना चाहिए।
कब करें कटाई और कितनी होगी उपज?
जब धनिया के पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगें, डोडी का रंग हरे से भूरा-पीला हो जाए और दानों में लगभग 18 प्रतिशत नमी रह जाए, तब फसल की कटाई करनी चाहिए। उचित वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने पर सिंचित क्षेत्रों में 12 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा असिंचित क्षेत्रों में 6 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दाना उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। वहीं हरे धनिये की फसल से 125 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिलने की संभावना रहती है।
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