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फसल की खेती (Crop Cultivation)

किसानों के लिए वरदान है बैंगन की ये टॉप 5 हाई-यील्ड किस्में,  प्रति हेक्टेयर 650 क्विंटल तक होगी पैदावार

21 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: किसानों के लिए वरदान है बैंगन की ये टॉप 5 हाई-यील्ड किस्में,  प्रति हेक्टेयर 650 क्विंटल तक होगी पैदावार – किसानों के लिए बैंगन की खेती में बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा कमाने के कई विकल्प उपलब्ध हैं। कृषि अनुसंधान संस्थानों और बीज कंपनियों द्वारा विकसित संकर (हाइब्रिड) किस्में अब खेती को अधिक लाभकारी बना रही हैं। इन किस्मों की खासियत उच्च उपज क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन है। बैंगन की ये टॉप 5 हाइब्रिड किस्में किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन रही हैं।  

1. PBHSR-31 (पीएयू, लुधियाना)

यह संकर किस्म छोटे आयताकार चमकदार बैंगनी फलों के लिए जानी जाती है। इसकी उपज क्षमता 600 से 650 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। बीज दर 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर है और इसे खरीफ सीजन में बोया जाता है। यह किस्म पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों के लिए उपयुक्त है।

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2. VNR-51C (वीएनआर सीड्स, रायपुर)

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छोटे गोल फलों वाली यह हाइब्रिड किस्म 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है। इसकी बीज दर भी 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म मुख्य रूप से पंजाब, यूपी, बिहार और झारखंड में सफलतापूर्वक उगाई जाती है।

3. HABH-8 (आईसीएआर-आईआईसीएआर, रांची)

यह किस्म छोटे गोल फलों वाली है और इसकी उपज क्षमता 375 से 544 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इसे खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में उगाया जा सकता है। यह दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

4. PB-70 (जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर)

यह किस्म रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है, जिसमें फोमोप्सिस ब्लाइट और बैक्टीरियल विल्ट के प्रति सहनशीलता होती है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसे देश के लगभग सभी प्रमुख कृषि राज्यों में उगाया जा सकता है।

5. DBL-02 (आईसीएआर-आईएआरआई, नई दिल्ली)

यह किस्म लंबे बैंगनी फलों के लिए प्रसिद्ध है और इसकी उपज 370 से 390 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। इसे खरीफ और वसंत दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। यह उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्यों सहित कई क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।  

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