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फसल की खेती (Crop Cultivation)

पराली विकराल होती समस्या

का समाधान : पूसा डी-कम्पोजर

poosa

14 नवम्बर 2022, भोपाल । पराली विकराल होती समस्या का समाधान : पूसा डी-कम्पोजर– पूसा डी-कम्पोजर कैप्सूल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित एक ऐसा घोल है। जिससे फसलों के अवशेष या पराली को गलाकर खाद बना दिया जाता है। आपको बता दें, डी-कम्पोजर के 4 कैप्सूल, थोड़ा गुड़ और चने का आटा मिलाकर लगभग 10-12 दिन मेंं 25 लीटर घोल तैयार किया जा सकता है। इस घोल की इतनी मात्रा से एक हेक्टेयर भूमि की पराली को नष्ट किया जा सकता है। धान की पराली को खेत में ही सड़ाने गलाने के लिए पूसा डी-कम्पोजर का प्रयोग बाकी तरीकों की तुलना में सबसे सस्ता एवं आसान है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा प्रभावी माइक्रोबियल कंसोर्टियम अर्थात् पूसा डी-कम्पोजर अब पाउडर आधारित फॉर्मूलेशन के तौर पर भी विकसित किया गया है। एक पैकेट केवल 1 एकड़ के लिए पर्याप्त है जिसको 200 लीटर पानी में घोलकर तुरंत छिडक़ाव किया जा सकता है। इससे किसानों को पराली जलाने से छुटकारा मिल जाता है और इसके इस्तेमाल से फसल अवशेष खाद में तब्दील हो जाते हैं। इसका उपयोग करने से पर्यावरण को किसी भी प्रकार की हानि भी नहीं होती है।

बता दें कि इसका उपयोग किसान अपने खेत में धान की पुआल कटाई के बाद करते हैं। मिट्टी को उपजाऊ और बेहतर रखने के लिए किसान के लिए यह स्थाई समाधान है। गत तीन वर्षों में पूसा डी-कम्पोजर प्रयोग/प्रदर्शन औसतन उत्तर प्रदेश में 26 लाख एकड़, नई दिल्ली 10 हजार एकड़, पंजाब 5 लाख एकड़, हरियाणा 3.5 लाख एकड़ में किया गया है और इसके बहुत ही अच्छे परिणाम सामने आए हैं। इस डी-कम्पोजर से आप भूसे को भी गला सकते हैं। बता दें कि इसका उपयोग किसान अपने खेत में धान की पुआल कटाई के बाद करते हैं। मिट्टी को उपजाऊ और बेहतर रखने के लिए किसान के लिए यह स्थाई समाधान है।

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पराली के समाधान अनेक

हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 550 लाख टन फसल अवशेषों का उत्पादन होता है, फसल अवशेषों का उत्पादन उत्तर प्रदेश (60 मिलियन टन) में सबसे अधिक है, इसके बाद पंजाब (51 मिलियन टन), महाराष्ट्र (46 मिलियन टन) और हरियाणा (22 मिलियन टन) का स्थान आता है। भारत में सभी फसलों के अवशेषों में अनाज वाले फसल अवशेष (352 मिलियन टन) उत्पन्न होते हैं। जिसमे चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा का योगदान 70 प्रतिशत है, जबकि अकेले धान की पराली का योगदान 34 प्रतिशत है।

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वायु प्रदूषण

वायु- प्रदूषण की समस्या लगभग भारत के हर एक हिस्से में बढ़ती जा रही है। पराली और दिवाली के पटाखे जलाने से प्रदूषण की समस्या और भी बढ़ जाती है। धान की कटाई और दीपावली के समय यह समस्या सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। इसका मुख्य कारण पंजाब और हरियाणा में किसानों के द्वारा जलाई जाने वाली पराली होती है। पराली के धुएं से दिन के समय में भी धुंध छा जाती है। अक्टूबर और नवम्बर के महीनों में हवा की गति बहुत कम हो जाती है। जिसके कारण यह धुंआ और भी खतरनाक हो जाता है। इससे निकलने वाला हानिकारक धुआं केवल स्वास्थ्य के लिए ही खतरनाक नहीं बल्कि यह कोरोना जैसे महामारी में और भी अधिक खतरनाक हो जाता है। इसीलिए किसान खेत में लगी हुई पराली को काटने की बजाय उनमें आग लगा देते हैं। जिससे खेत जल्दी से खाली हो जाए और वह उस जमीन पर गेहूं या अन्य किसी फसल की उत्पादन के लिए बुआई कर सकें। किसान जल्दी-जल्दी अपने खेत को खाली कर दूसरी फसल लगाना चाहता है।

मशीन बेलर-हैप्पी सीडर

इन सब समस्याओं को देखते हुए किसानों को पराली न जलाने के लिए केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकार भी अपने-अपने स्तर पर कई इंतजाम करती रहती है। किसान अपने खेत से पुआल निकालने के लिए मशीन बेलर का इस्तेमाल कर सकते हंै। इसे आप गांठें बना सकते हैं। यदि आप पुआल को नहीं हटाते हंै, तो आपको धान के भूसा प्रबंधन का विकल्प चुनना होगा। इसमें किसान अपनी पराली को आसान तरीके से नष्ट कर सकते हैं। हैप्पी सीडर एक मशीन है, जिसका डिजाइन सिर्फ खड़े धान की बुआई करने लिए ही किया गया है, जो किसानों के लिए बेहद ही सुविधाजनक है।

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