सोयाबीन की उन्नत कृषि कार्यमाला खेती कैसे करें, प्रमुख किस्में , भण्डारण

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सोयाबीन भारत वर्ष की एक बहुत ही महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है

सोयाबीन की उन्नत कृषि कार्यमाला – सोयाबीन भारत वर्ष की एक बहुत ही महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है, इसकी खेती खरीफ के मौसम में प्रमुख रूप से की जाती है। सोया खली के निर्माण से लगभग 4 हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है जिसमें म. प्र. का हिस्सा सर्वाधिक है। भारत वर्ष का 50 प्रतिशत से अधिक सोयाबीन का उत्पादन केवल म.प्र. में होता है जो कि देश में सर्वाधिक है।

सोयाबीन का 8-10 प्रतिशत उपयोग घरेलू रुप में होता है जो की भविष्य में निश्चित रूप से बढऩे की सम्भावना है। भारत में वर्तमान में 113.4 लाख हे. क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की जाती है तथा इसका उत्पादन 136.3 लाख टन है और उत्पादकता 1200 किलोग्राम/हे. है ( वर्ष 2019)। म. प्र. में इसका क्षेत्रफल 52.4 लाख हे. उत्पादन लगभग 67.3 लाख टन और उत्पादकता 1285 किलोग्राम/हे. ( वर्ष 2018)।

सोयाबीन का उत्पादन, क्षेत्रफल और उत्पादकता में म.प्र. की भागीदारी सर्वाधिक और महत्वपूर्ण रही है। जिसके फलस्वरूप आज सोयाबीन की खेती का मध्यप्रदेश में जो अद्धितीय विस्तार हुआ है, उसका श्रेय वर्ष 1965 से आज तक अनवरत् किये गये विभिन्न अनुसंधान कार्यों को जाता है।

कृषकों का सोयाबीन खेती के प्रति झुकाव

जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय में वर्ष 1967 से अखिल भारतीय समन्वित सोयाबीन अनुसंधान परियोजना द्वारा उन्नत तथा विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल अधिक उपज व उच्च गुणवत्ता वाली जातियों तथा उन्नत सस्य एवं पौध संरक्षण तकनीकों के विकास ने सोयाबीन की खेती के नये आयाम खोल दिये हैं। इसके साथ ही कृषकों का सोयाबीन खेती के प्रति झुकाव, तेल उद्योग की स्थापना एवं सरकार द्वारा तैयार वातावरण ने सोयाबीन खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

जिसके कारण मध्यप्रदेश को सोया प्रदेश की संज्ञा दी गई है। वर्तमान में सोयाबीन ने भारत में तिलहनी फसलों में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। इसमें प्रचुर मात्रा में उच्च कोटि का प्रोटीन (40 प्रतिशत) एवं तेल (20 प्रतिशत) तथा 20-25 प्रतिशत कार्बोहाडे्रट पाया जाता है। इसके अलावा इसमें विटामिन्स एवं खनिज लवण की मात्रा भी अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक पायी जाती है।

उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारक: सोयाबीन मध्यप्रदेश में खरीफ मौसम में बहुत अधिक क्षेत्र में उगाई जाती है। खरीफ फसल के रुप में इसकी उपयुक्तता एवं आर्थिक लाभ ने किसानों को आकर्षित किया है। जिससे खरीफ में जो भी पड़ती जमीन रहती थी उसको आच्छादित किया एवं कई परंपरागत् खरीफ फसलों को भी विस्थापित कर गौण कर दिया।

किसानों ने धान के खेतों की मेड़ें तोड़कर सोयाबीन खेत में बदला

किसानों ने आर्थिक लाभ से प्रभावित होकर धान के खेतों की मेड़ें तोड़कर सोयाबीन खेत में बदला एवं सीमांत जमीन में भी खेती करने लगे। इस प्रकार सोयाबीन मध्यप्रदेश के वृहद क्षेत्र में उगाई जाने लगी है। वर्तमान में सोयाबीन उत्पादन को सीमित करने वाली कुछ प्रमुख समस्यायें हैं जिसके कारण उत्पादन एवं उत्पादकता में गिरावट दर्ज की जा रही है एवं किसानों को आर्थिक क्षति उठाना पड़ रही है। इन समस्यायों में:

  • चारकोल जड़ सडऩ, पीला मोजेक एवं झुलसन।
  • नए कीटों का प्रकोप जिसमें तने की मक्खी व चक्रभृंग (तना छेदक कीट), अर्ध कुंडलक इल्ली, कम्बल कीट, तम्बाखू की इल्ली, अलसी की इल्ली, चने की फली छेदक (पत्ती भक्षक कीट) एवं सफेद मक्खी।
  • भूमि में आवश्यक मुख्य तथा सूक्षम पोषक तत्वों का असंतुलन।
  • भूमि में कार्बनिक पदार्थ की कमी।
  • समुचित जल प्रबंध का अभाव एवं अवर्षा की स्थिति में सिंचाई साधनों की कमी।
  • खरपतवार की समस्या।
  • मौसम की प्रतिकूलता जिसमें महत्वपूर्ण अवस्था में लम्बा सूखा, पकने की अवस्था में वर्षा का होना आदि।

ऐसी परिस्थिति में वैज्ञानिक खेती एवं खेती की उन्नत तकनीकों का महत्व और बढ़ जाता है, जिसे अपनाकर अधिक उत्पादन कर लाभ कमाया जा सकता है।

सोयाबीन फसल के लिए जलवायु एवं उपयुक्त क्षेत्र:

सोयाबीन मध्यप्रदेश की प्रमुख खरीफ फसल (जून – अक्टूबर) है। इसकी खेती प्रदेश में ओैसतन 7500-800 मि. मी. (पश्चिमी एवं उत्तरी) से लेकर 1000-1200 मि. मी. (दक्षिण एवं पूर्व ) वर्षा वाले कृषि जलवायु क्षेत्र में की जाती है । फसल की उत्पादकता को वर्षा की कुल मात्रा एवं वितरण, तापक्रम एवं आद्र्र्रता अत्याधिक प्रभावित करते हैं ।

वर्तमान में इसकी खेती विभिन्न प्रकार की जमीनों जैसे उथली काली से गहरी काली (मालवा) मध्यम काली (विन्ध्य पठार) गहरी काली (मध्य नर्मदा धाटी) हल्की काली दोमट एवं सिल्टी दोमट (सतपुड़ा पठार) रेतीली दोमट से भारी काली (कैमोर पठार) लाल काली मिश्रित (बुन्देलखण्ड ) मिलवा लाल काली एवं दोमट (गिर्द )एवं उथली काली (निमाड़ धाटी) जमीनों में होती है।

सोयाबीन फसल के लिए भूमि का चयन एवं तैयारी :

सोयाबीन अम्लीय क्षारीय तथा रेतीली भूमि को छोड़कर हर प्रकार की मिट्टी में पैदा होती है। सोयाबीन की खेती उन खेतों में ही करें जहां जलभराव की समस्या न हो। रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद गर्मी में गहरी जुताई करें। ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई के बाद 15-30 दिवस खेत खाली छोडऩे पर जमीन के नीचे आश्रय पाने वाले कीटों एवं भूमि जनित बीमारियों के अवशेष नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि की जलधारण क्षमता एवं दशा में सुधार होता है। गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट तथा सिंगल सुपर फास्फेट को खेत में समान रूप से छिड़कने के बाद बोनी के लिए जुताई करना श्रेष्यकर है। खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाये एवं खरपतवार नष्ट हो जायें इस प्रकार जुताई करें ।

बुआई के पूर्व खेत के निचले हिस्से में प्रति 20 मीटर अंतराल पर जल निकास नाली का निर्माण अवश्य करें जिससे अधिक वर्षा की दशा में पानी का निकास आसानी से हो सके एवं अवर्षा की दशा में सिंचाई उपलब्ध करा सकें।

सोयाबीन फसल के लिए बुवाई का समय:

सोयाबीन फसल के लिए बुवाई 20 जून (4-5 इंच वर्षा होने पर) से जुलाई के प्रथम सप्ताह के बीच उत्तम परिणाम देती है। इसमें परिस्थितिवश कुछ दिन आगे पीछे होना कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता। मानसून में देरी होने पर जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध हों बुवाई समय से ही करें ।

सोयाबीन की जातियों का चयन:

सोयाबीन की जातियों का चुनाव उस क्षेत्र में वर्षा का औसत एवं भूमि के प्रकार को ध्यान में रखकर अर्थात् क्षेत्रीय अनुकूलता के आधार पर ही करना चाहिए । औसत से कम वर्षा एवं हल्की से मध्यम भूमि वाले क्षेत्रों में शीघ्र पकने वाली जातियॉँ एवं औसत से अधिक वर्षा वाले एवं मध्यम से भारी भूमि वाले क्षेत्रों में मध्यम अवधि की जातियॉँ लगाना उचित है। सोयाबीन की उन्नत जातियॉँ अनुवांशिक रुप से शुद्ध एवं कम से कम 70 प्रतिशत अंकुरण क्षमता वाली होनी चाहिये।
मध्यप्रदेश के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए सोयाबीन की अनुकूल जातियों को तालिका में तथा उन्नतशील प्रजातियॉँ एवं उनकी विशेषताओं को दिया गया है।

सोयाबीन फसल के लिए उत्तम बीज व बीज दर:

सोयाबीन की बीज दर 60-80 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर निर्धारित हैं। जब बीज छोटे हों या ज्यादा फैलने वाली प्रजाति हो तो 60-70 कि. ग्रा. एवं बड़ा बीज हो तथा कम फैलने वाली प्रजाति हो तो 80-90 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज का प्रयोग करें। सोयाबीन बीज की अंकुरण क्षमता 70 प्रतिशत से अधिक हो एवं अनुवांशिक रूप से पूर्णतया शु़द्ध हो वही बीज प्रयोग करें।

बीजोपचार:

कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत $ थायरम 37.5 प्रतिशत, 2 ग्राम दवा या थायोफिनेट मेथाइल+ पाइराक्लास्ट्रोबिन दवा 1-1.25 मि.ली दवा या ट्राइकोडर्मा हर्जियानम नामक जैविक फफूंदनाशक की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर सकते हैं, इससे बीज एवं मृदा जनित रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

जहां पर तना मक्खी, सफेद मक्खी एवं पीला मोजेक की समस्या ज्यादा हो वहां पर थायामेथोक्जाम 30 एफ.एस. नामक कीटनाशक दवा से 10 मि.ली/किलो बीज की दर से बीज उपचारित कर सकते हैं। फफूंदनाशक एवं कीटनाशक दवा के उपचार के पश्चात् 5-10 ग्राम राइजोबियम कल्चर एवं 5-10 ग्राम पी.एस.बी. कल्चर से प्रति किलो बीज उपचारित करने से सोयाबीन में जड़ ग्रंथियों का उचित विकास होता है।

सोयाबीन फसल के लिए उर्वरक एवं खाद :

भूमि की भौतिक दशा एवं गुणों को बनाये रखने तथा उत्पादन वृद्धि हेतु के लिए 5-10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट या 5 टन फसलों का बारीक किया हुआ कचरा या भूसा और 5 टन कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर का उपयोग अच्छा परिणाम देता है । जहॉंँ पर मृदा परीक्षण के उपरांत जिंक एवं बोरान तत्व की कमी पाई जाये, वहां 7.5 कि. ग्रा. प्रति दो वर्ष के अंतराल पर जिंक एवं 1.0-1.5 कि.ग्रा. बोरान प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभकारी है ।

फास्फोरस की पूरी मा़त्रा सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में देने पर गंधक पूर्ति हो जाती है या जिप्सम 2-2.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपयोग करने से भी गंधक की कमी पूरी हो जाती है। सामान्यत: सोयाबीन में 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन, 60-80 कि. ग्रा. फास्फोरस एवं 20-30 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. गंधक की मात्रा आवश्यक रूप से उपयोग करने की सलाह दी जाती है।

सोयाबीन फसल के लिए बुवाई का तरीका:

सोयाबीन की बुवाई करते समय कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. होना चाहिए। कम उॅँचाई वाली जातियों या कम फैलने वाली जातियों को 30 से.मी. की कतार से कतार की दूरी पर बोना चाहिए जैसे 95-60, 20-34 आदि। पौधे से पौधे की दूरी 5-7 से. मी. रखना चाहिए। बुवाई का कार्य मेड़ – नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी – नाली विधि से करने से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि पायी गयी है एवं नमी संरक्षण तथा जल निकास में भी यह विधियां अत्यंत प्रभावी पायी गयी है।

विपरीत परिस्थितियों में बुवाई दुफन, तिफन या सीड ड्रिल से कर सकते हैं। बुवाई के समय जमीन में उचित नमी आवश्यक है। बीज जमीन में 2.5 से 3 से. मी. गहराई पर पडऩे चाहिए।

सोयाबीन फसल की अंकुरण के बाद फसल की सुरक्षा :

बुवाई के तीसरे दिन से एक सप्ताह तक अंकुरित नवजात पौधों को पक्षियों से बचाना बहुत आवश्यक है।

पौधों की प्रति हेक्टेयर संख्या:

सोयाबीन में अधिक फैलने वाली जातियों की 3 से 4 लाख के आसपास पौध संख्या एवं कम फैलने वाली जातियों की 4 से 6 लाख पौध संख्या प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। वांछित पौध संख्या अधिक होने पर फसल के ढहने की सम्भावना रहती है एवं फूल तथा फल्लियॉँ प्रकाश के आभाव में सड़ जाती हैं तथा कीट नियंत्रण के लिए कीट नाशकों का छिड़काव भी असरकारक नहीं होता है।

सोयाबीन फसल मैं जल प्रबंध:

सोयाबीन की फसल में यदि उचित जल प्रबंध नहीं है, तो जो भी आदान दिया जाता है उसका समुचित उपयोग पौधों द्वारा नहीं हो पाता है। इसके साथ ही जड़ सडऩ, झुलसन जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है एवं नींदा नियंत्रण कठिन हो जाता है जिसके फलस्वरूप, पौधों का विकास सीमित हो जाता है एवं उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। अत: सामान्य तरीके से बुवाई के बाद 20-20 मीटर की दूरी पर ढाल के अनुरूप जल निकास नालियॉँ अवश्य बनायें, जिससे अधिक वर्षा की स्थिति में जलभराव की स्थिति पैदा न हो एवं आवश्यकतानुसार सिंचाई भी दी जा सके। मेड़- नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी – नाली विधि की बुवाई, जल निकास में भी प्रभावी पायी गयी हैं।

सोयाबीन फसल के लिए खरपतवार नियंत्रण:

सोयाबीन की उन्नत कृषि कार्यमाला मैं जाने खरपतवार नियंत्रण – सोयाबीन में विभिन्न प्रकार के घास कुल के एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार फसल के साथ जल एवं पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं जिससे पैदावार में कमी आ जाती है। अत: 20-25 दिन एवं 40-45 दिन की फसल होने पर में फसल से खरपतवार निकाल देना चाहिए। मजदूरों द्वारा हाथ से निंदाई करवाने के परिणाम अच्छे मिले हैं। परन्तु मजदूरों की कमी, वर्षा का अंतराल एवं जमीन की स्थिति से हाथ की निंदाई खरीफ मौसम में कभी कभी कठिन हो जाती है अत: यांत्रिक विधियों में सीआईएई भोपाल द्वारा निर्मित उन्नत हैन्ड हो या बैलों से चलने वाला कुल्पा या डोरा से भी नींदा नियंत्रण कर सकते हैं। आवश्यकतानुसार रसायनिक नींदानाशकों का उपयोग भी करना चाहिए।

इन नींदानाशकों को तीन समूहों में बांटा गया है:
बोनी से पूर्व :

फ्लूक्लोरालिन 45 ई.सी. की 1-1.5 कि. ग्रा. क्रियाशील अवयव या ट्राईफ्लूरालिन 1 कि.ग्रा. प्रति हे. बोनी से पूर्व नम मिट्टी में छिड़क मिला कर दें।

बोनी से बाद अंकुरण से पूर्व :

डायक्लोसुलम 84 डब्ल्यू.जी. 22 ग्रा. क्रियाशील अवयव प्रति हे. या पेंडीमिथालिन 38.7 प्रतिशत सी. एस. 580.5 – 677.25 ग्राम प्रति हे. या एसिटाक्लोर 90 ई.सी. 2 कि.ग्रा. क्रियाशील अवयव या मेटलाक्लोर 50 ई.सी. 1 कि.ग्रा. क्रियाशील अवयव या क्लोमेजोन 50 ई.सी. 1 कि.ग्रा. क्रियाशील अवयव प्रति हे. के हिसाब से बोनी के बाद एवं अंकुरण के पूर्व छिड़काव करने से खरपतवार नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है ।

बोनी के बाद:

सोयाबीन की बोनी के 15-20 दिन के बीच खड़ी फसल में इमेजाथाइपर नामक दवा का 100 ग्राम क्रियाशील अवयव प्रति हे. छिड़कने से सभी प्रकार के खरपतवार का नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है। जहां पर केवल संकरी पत्ती के नींदा हों वहां क्विजालोफाप इथाइल 5 प्रतिशत ई.सी. 50 ग्राम क्रियाशील अवयव या क्विजालोफाप-पी टेफुरिल 44.1 ग्रा. या फेनोक्साप्राप पी. इथाइल 10 ई.सी. 70 ग्राम या क्लोरीम्यूरान इथाइल 9 ग्रा. क्रियाशील अवयव या फ्युजीफाप-पी.ब्यूटाइल 13.4: ई.सी. 125-250 ग्राम क्रियाशील अवयव प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें । इन दवाओं को 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव स्प्रेयर में फ्लड जेट नॉजल या फ्लैट पेन नॉजल लगाकर करना चाहिये। भूमि में नमी रहने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।

सोयाबीन की कटाई, गहाई एवं भंडारण:

सोयाबीन की कटाई हँसिया या मशीन से की जाती है। फसल की कटाई तब करना चाहिए जब 95 प्रतिशत फलियां भूरी पड़ जायें और पत्तियॉँ झड़ जायें। अधिक देरी से कटाई करने पर चटकने की संभावना रहती है। बीज वाली फसल की कटाई कम्बाईन से न करें। यदि कटाई के समय वर्षा की संभावना हो तो कटाई रोक दें। फसल दो तीन दिन तक खेत में सूखने के बाद खलिहान में ले जायें। गहाई थ्रेसर मशीन से करने के लिये सूखी हुई फसल की गड्डियाँ ना लें।

थ्रेसर की गति 300-500 आर.पी.एम. एवं पंखे की गति 1400-1500 आर.पी.एम. रखनी चाहिए। ट्रैक्टर से गहाई के लिए खलिहान में फसल की मोटी परत बिछा देना चाहिए और सूखने के लिए छोड़ दें। जब फल्लियां चटकने लगें तब नये टायर वाले ट्रैक्टर से धीमी गति गहाई करें। गहाई हो जाने पर तेज हवा में या पंखों से उड़ावनी कर बीजों को डंठल एवं भूसा से अलग करें।

सोयाबीन बीज को पुन:

धूप में 2 से 3 दिनों तक सुखाकर एवं छानकर भंडारण सूखे एवं ठंडे स्थानों में कोठियों एवं बोरों में करें। भण्डारण के लिए बीज में 9 प्रतिषत के आस पास नमी सर्वथा उपयुक्त है । बीजों को साफ सुथरी बोरियों में भरना चाहिए। बोरियों की सिलाई के बाद उन्हें 6 बोरियों तक की छल्ली लगायें । भण्डार गृह मेें ताप और नमी का प्रभाव न पड़े ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए । भण्डार में अन्य जाति के बीज पास में न हों ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए । भंडार गृह में बीज की सुरक्षा चूहों से करना चाहिये। यदि किसान भाई बीज के लिए सोयाबीन लगा रहें तो बुवाई से भंडारण तक सावधानी वरतना चाहिए ।

सोयाबीन की उन्नत कृषि कार्यमाला हेतु महत्वपूर्ण सुझाव

  • सोयाबीन खेती उपयुक्त जमीन में ही करें।
  • ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें।
  • मृदा परीक्षण कर सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा का पता लगायेंं।
  • 5 टन प्रति हे. के हिसाब से गोबर खाद या कम्पोस्ट या 5 टन बारीक कचरा और 5 टन कम्पोस्ट का उपयोग करें। गंधक एवं जस्ते की कमी को पूरा करें।
  • खेत में जल निकास एवं सिंचाई की समुचित व्यवस्था करें।
  • बुवाई 25 जून से 7 जुलाई के मध्य करें।
  • हल्की से मध्यम भूमि में कम अवधि की तथा मध्यम से भारी भूमि में मध्यम अवधि की किस्में लगायें।
  • एक से अधिक किस्मों को लगायें ।
  • बोनी हेतु स्वस्थ, सुडौल, साफ एवं 70त्न से अधिक अंकुरण क्षमता वाला बीज प्रयोग करें।
  • बीज दर 60-80 किलोग्राम प्रति हे. उपयोग करें।
  • आवश्यक पौध संख्या 4-6 लाख प्रति हे. के मध्य रखें।
  • नींदा, रोग एवं कीट व्याधियों का सही समय पर, सही दवा तथा सही विधि द्वारा नियंत्रण करें।
  • फसल कटाई समय से करें।
  • सोयाबीन के साथ अरहर, मक्का, ज्वार, कोदो, कुटकी की अंतरवर्तीय फसल लें।
  • उचित फसल चक्र अपनायें।
  • कृषक स्वयं अपना उन्नत बीज उत्पादित करें।

www.krishakjagat.org

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