राज्य कृषि समाचार (State News)फसल की खेती (Crop Cultivation)

दलहनी फसलें भूमि में नत्रजन वृद्धि में भी सहायक 

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भारतीय दलहन फसलें : अनुसंधान एवं विकास – 2

  • डॉ. संदीप शर्मा                 
    बी-9, कम्फर्ट गार्डन, चूना भट्टी, भोपाल
    मो.: 9303133157

20 नवम्बर 2022, भोपालदलहनी फसलें भूमि में नत्रजन वृद्धि में भी सहायक  – एक सामान्य शाकाहारी भारतीय भोजन थाली दालों के बिना अधूरी मानी जाती है। सदियों से हमारे फसल तंत्र में विभिन्न दलहनी फसलों को सम्मिलित किया जाता रहा है। दलहनी फसलें प्रोटीन का सस्ता एवं सुलभ स्त्रोत हैं। दलहनी फसलों में प्रोटीन की मात्रा अनाज वाली फसलों की अपेक्षा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त खाद्यान्न फसलों में उपलब्ध प्रोटीन तत्व उनके दानों के छिलकों (एल्यूरान परत) में पाया जाता है जो कि प्रसंस्करण के दौरान नष्ट हो जाता है, जबकि दलहनी फसलों में उपलब्ध प्रोटीन तत्व उनके दानों के बीजदलों में पाया जाता है तथा प्रसंस्करण उपरांत भी विद्यमान रहता है। पौष्टिक सुरक्षा के अतिरिक्त दलहनी फसलें मृदा में नत्रजन उपलब्धता वृद्धि में भी सहायक होती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार चना, अरहर, मूंग, मसूर और मटर की फसलें मृदा में क्रमश: 41 से 134, 31 से 97, 30 से 74, 60 से 147 तथा 30 से 125 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर नत्रजन का स्थिरीकरण करती हैं।

सन् 1981 से 1990 तक

इस दशक के दौरान वर्ष 1984 में कानपुर (उत्तरप्रदेश) स्थित परियोजना संचालनालय (दलहन) को दलहन अनुसंधान संचालनालय का दर्जा दिया गया जिससे सम्पूर्ण देश में संचालित दलहन अनुसंधान परियोजनाओं का नियंत्रण एवं मार्गदर्शन का दायित्व इस संचालनालय के अधीन हो गया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय दलहन अनुसंधान कार्य में तीव्रता तथा विविधता आई। अखिल भारतीय समन्वित दलहन अनुसंधान परियोजना के विभिन्न केंद्रों के मध्य समन्वय के दायित्व के साथ-साथ कानपुर में भी दलहनी फसलों पर मूलभूत, व्यवहारिक एवं योजनाबद्ध अनुसंधान कार्य प्रारम्भ किये गये। इस दशक में दलहनी फसलों के वांछित गुणों से युक्त पौधों के विभिन्न प्रकारों का चयन कर किस्म विकास का कार्य प्रमुखता से किया गया। जैसे मटर के कम ऊँचाई वाले पौधे, चने के सीधे (इरेक्ट) पौधे आदि। इसी दशक में शीतकाल के लिये उपयुक्त राजमा की किस्म ‘पीडीआर 14’, उत्तर पूर्व के मैदानी क्षेत्रों के लिये वर्षा उपरांत बुवाई के लिये उपयुक्त अरहर की किस्म ‘बहार’, दक्षिण भारत के लिये उपयुक्त धान कटाई उपरांत उड़द की किस्म एलबीजी 17, मूँग की पंत 1, 2 तथा पंत मूँग 3, चने की उकठा निरोधी किस्में जैसे जेजी 315, जेजी 74, पूसा 413, फूले जी 5 आदि और उत्तर भारत के लिये एस्कोकाइटा झुलसन प्रतिरोधी किस्में जैसे गौरव, जीएनजी 146 विकसित की गई। इसी दशक में विभिन्न क्षेत्रों के लिये उपयुक्त एवं प्रभावी अंतरवर्तीय फसल पद्धतियों का विकास तथा पर्णीय पोषण और जल अवशोषक पॉलिमर (जल शक्ति) सम्बंधी अनुसंधान किये गये। इसी अवधि में दलहनी फसलों में जीवाणु कल्चर द्वारा बीजोपचार के अनुकूल प्रभावों को प्रोत्साहित कर विस्तार किया गया। शस्य वैज्ञानिकों द्वारा इस दशक में चने और मटर की फसलों मे शाखा निकलने तथा फली बनने की अवस्थाओं में सिंचाई देने की अनुशंसा की गई। दलहन फसल विकास हेतु वर्ष 1988-89 में ‘राष्ट्रीय दलहन विकास योजना’ के पूरक के रूप  में विशेष अनाज उत्पादन कार्यक्रम (एसएफपीपी) आरम्भ किया गया जिसमें दलहन फसलों को भी सम्मिलित कर लिया गया। उक्त योजना शत-प्रतिशत केन्द्रीय सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना थी।

सन् 1991 से 2000 तक

आलोच्य पाँच दशकों (1971 से 2020 तक) में यह दशक (1991 से 2000) एकमात्र दशक है जिसमें कुल दलहन उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर नकारात्मक रही। वर्ष 1993 में अखिल भारतीय समन्वित दलहन अनुसंधान परियोजना को तीन परियोजनाओं यथा चना, अरहर तथा मुलार्प (मूंग, उड़द, मसूर, तिवड़ा, राजमा और मटर) में विभाजित किया गया। विभिन्न पादप रोगों की प्रभावी रोकथाम के लिये एक ही किस्म में एक से अधिक रोगों के विरूद्ध प्रतिरोधकता विकसित करने सम्बंधी अनुसंधान कार्यों पर इसी दशक में ध्यान दिया गया, परिणामस्वरूप चने में उकठा एवं जड़ सडऩ प्रतिरोधी किस्में जैसे भारती, पूसा 372, बीजी 391 तथा उकठा एवं एस्कोकाइटा झुलसन प्रतिरोधी किस्में जीएनजी 469, डीसीपी 92-3 आदि विकसित की गई। अकोला केन्द्र से काबुली चने की लोकप्रिय किस्म कॉक 2 भी इसी दशक में विकसित की गई। देश के प्रमुख चना उत्पादक राज्य मध्यप्रदेश में फुटाने बनाने के लिये उपयुक्त गुलाबी चने की किस्म जेजी 1 तथा दक्षिण भारत विशेषत: आन्ध्रप्रदेश में चना क्रांति लाने वाली लोकप्रिय किस्म जेजी 11 भी इसी अवधि में विकसित हुई। इसी दशक के दौरान सिंचित तथा असिंचित क्षेत्रों के लिये देरी से बोने के लिये उपयुक्त किस्में जैसे भारती, पूसा 372, विजय आदि किस्मों का विकास भी किया गया। इसी प्रकार अरहर की उकठा एवं बांझपन विषाणु रोग निरोधी किस्म आईसीपीएल 87119 (आशा) मध्य तथा दक्षिण भारत के लिये विकसित की गई। मसूर की उकठा निरोधक एवं बड़े दाने वाली किस्म जेएल 3 भी इसी अवधि में विकसित की गई। इसके अतिरिक्त मसूर की पंत लेंटिल 4, पूसा वैभव, शेरी आदि किस्में भी दलहन उत्पादकों को उपलब्ध हुईं। विभिन्न दलहनी फसलों में समन्वित पोषण प्रबंधन की आवश्यकता के सुझाव के साथ-साथ गंधक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता पर वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसायें की गई। दलहनी फसलों पर फूल-फली अवस्था पर 2 प्रतिशत यूरिया के छिडक़ाव की अनुशंसा भी इसी दशक में की गई। इसी अवधि में दलहनी फसलों की बोनी मेढ़ पट्टी विधि से करने की सलाह दी गई।

दलहन विकास के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा वर्ष 1990-91 से ‘टेक्नालॉजी मिशन ऑन ऑईल सीड्स एंड पल्सेस (टीएमओपी)’ कार्यक्रम लागू किया गया। कार्यक्रम में घटते दलहन उत्पादन में वृद्धि के विभिन्न उपायों जैसे पौध संरक्षण, कटाई उपरांत तकनीकी, कृषि आदानों की सहज उपलब्धता, उचित समर्थन मूल्य तथा विपणन पर विशेष ध्यान देकर दलहनी फसल उत्पादकों को प्रोत्साहित किया गया।

सन् 2001 से 2010 तक

इक्कीसवीं शताब्दी के इस प्रथम दशक को भारतीय दलहन अनुसंधान और विकास का स्वर्णिम काल माना जा सकता है। इस दशक के दौरान प्रमुख दलहनी फसल चने की जेजी 16, जेजी 130, जाकी 9218, राजविजय चना 201 जैसी देसी चने की किस्में तथा जेजीके 1, जेजीके 2, राजविजय काबुली चना 101, पूसा चमत्कार, पूसा शुभ्रा जैसी काबुली चने की किस्में, दाल बनाने के लिये उत्तम जेजी 14, जेजी 226 तथा फुटाने बनाने के लिये उपयुक्त जेजी 412 किस्में अनुमोदित की गई। रबी की अन्य महत्वपूर्ण दलहन मसूर की उन्नत किस्में जो कि इस दशक के दौरान विकसित की गई, उनमें वीएल 507, आईपीएल 406, पंत लेंटिल 7 प्रमुख हैं। इस अवधि में विकसित अरहर की उन्नत किस्मों में पंत अरहर 291, बीआरजी 1 आदि उल्लेखनीय हैं। मूंग में सत्या, केकेएम 3, आईपीएम 02-3 लोकप्रिय रहीं जबकि उड़द की आईपीयू 02-43, यूपीयू 00-31, पंत उड़द 31, एकेयू 15 आदि उन्नत किस्में अनुमोदित की गई। दलहनी फसलों की उन्नत किस्मों के विकास के साथ ही इस दशक में विभिन्न फसल चक्रों में कृषि आदानों के प्रभावी प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके अतिरिक्त दलहनी फसलों की संरक्षित खेती, धान उपरांत खाली खेतों में दलहन उत्पादन तकनीक, पादप वृद्धिकारक जीवाणुओं के प्रयोग, स्प्रिंकलर तथा टपक सिंचाई पर आधारित वैज्ञानिक अनुशंसायें की गई। दलहनी फसलों पर मौसम परिवर्तन के प्रभावों तथा उनके निदान सम्बंधी प्रयोग भी इसी दशक के दौरान प्रारम्भ किये गये।

आलोच्य दशक में भारत सरकार द्वारा प्रायोजित दलहन विकास कार्यक्रमों में आईसोपॉम तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान प्रमुख रहे। राष्ट्रीय योजना आयोग की अनुशंसा पर अप्रैल 2005 से मार्च 2010 तक तिलहन, दलहन, ऑईलपॉम तथा मक्का की फसलों पर समन्वित विकास योजना लागू की गई। इस योजना को ‘इंटीग्रेटेड स्कीम्स ऑफ ऑईलसीड्स, पल्सेस, ऑईलपॉम एंड मेज (आईसोपॉम)’ के नाम से देश के चयनित राज्यों में क्रियान्वित किया गया। इस योजना में चयनित फसलों के समन्वित विकास, इनके विपणन तथा मूल्य नीतियों पर विशेष ध्यान दिया गया जिससे उत्पादन वृद्धि तथा उत्पादकों को प्रोत्साहन मिल सके। वर्ष 2007-08 रबी मौसम से देश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान (एनएफएसएम- दलहन) प्रारम्भ किया गया जिसमें वर्ष 2012 के अंत तक दलहन उत्पादन में 2 मिलियन टन की वृद्धि का लक्ष्य रखा गया।

सन् 2011 से 2020 तक

इस दशक में देश में कुल दलहन का औसत उत्पादन 20.74 मिलियन टन रहा जोकि सर्वाधिक 5.46 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ा। इस कालखण्ड में चने की देसी किस्मों (आरव्हीजी 201, जीएनजी 2144 आदि), काबुली किस्मों (आरव्हीकेजी 101, आरव्हीकेजी 203, एल 555, पूसा पार्वती आदि) के अतिरिक्त मशीन द्वारा कटाई के लिये उपयुक्त उन्नत किस्में विकसित की गई जैसे एनबीईजी 47 (धीरा), फूले विक्रम, बीजी 3062 तथा आरव्हीजी 204। उल्लेखनीय है कि मशीन कटाई के लिये उपयुक्त चने की किस्में अपेक्षाकृत ऊँची होती हैं और इनमें फलियाँ भी अधिक ऊँचाई पर लगती हैं। इसके अतिरिक्त रसोई के लिये उपयुक्त एवं आकर्षक हरे चने की किस्म पीकेव्ही हरिता भी अनुमोदित की गई। इसी दौरान आधुनिक पादप प्रजनन विधि (मार्कर अस्सिटेड बैकक्रॉस ब्रीडिंग) द्वारा विकसित देश की प्रथम किस्म पूसा चिकपी 10216 भी दलहन उत्पादकों को उपलब्ध कराई गई। यह किस्म असिंचित क्षेत्रों में समय पर बोने के लिये उपयुक्त है तथा आंशिक रूप से सूखे के प्रति सहनशील है। आलोच्य दशक के दौरान मसूर की रोग प्रतिरोधी  किस्में जैसे व्हीएल मसूर 133 (उकठा), एलएल 931 (गेरूआ) आरव्हीएल 11-6, कोटा मसूर 1, एल 4729 आदि विकसित हुईं। अरहर में टीएस-3आर, एजीटी 2, बीडीएन 711, भीमा आदि उन्नत किस्में अनुमोदित की गई। मूँग में पीला मोजेक रोग के प्रति अवरोधी किस्म बसंती विकसित की गई जो कि खरीफ तथा ग्रीष्मकाल दोनों मौसम में बोई जा सकती है। मूंग की अन्य उन्नत किस्मों में स्वाती, आईपीएम 02-14, पीकेव्हीएकेएम 4 उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार ग्रीष्मकाल में बोने के लिये उड़द की सीओ 6, माश 391 किस्में जो कि रोग अवरोधक हैं, विकसित की गई।  इस दशक में भारत सरकार के दलहन विकास कार्यक्रमों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान की प्रमुख भूमिका रही। वर्ष 2007-08 से जारी एनएफएसएम- दलहन कार्यक्रम को और अधिक गति देने के उद्देश्य से वर्ष 2010-11 से 2013-14 की अवधि में एक अन्य विकास कार्यक्रम इसमें जोड़ा गया। इस कार्यक्रम को ‘एक्सीलरेटेड पल्स प्रोडक्शन प्रोग्राम’ या संक्षेप में ए3पी के नाम से जाना जाता है। इस कार्यक्रम में देश के असिंचित क्षेत्रों के 6000 गांवों को दलहन ग्राम के रूप में चयनित किया गया और इन दलहन ग्रामों में दलहन विकास के समन्वित कार्यक्रम पर विशेष ध्यान दिया गया। इस कार्यक्रम के कारण ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के समापन वर्ष (2011-12) में राष्ट्रीय दलहन उत्पादन में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2014-15 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान- दलहन को देश के 24 राज्यों में क्रियान्वित कर कुल दलहन उत्पादन में 4 मिलियन टन की वृद्धि का लक्ष्य रखा गया। इस कार्यक्रम में उन्नत किस्मों के बीज उपलब्ध कराना, जिसके लिये सम्पूर्ण देश में 150 बीज उत्पादन केन्द्र स्थापित किये गये हैं जो दलहन उत्पादकों को नवीन उन्नत किस्मों के बीज उपलब्ध कराने के कार्य में प्रयासरत हैं।

भावी चुनौतियाँ

उपर्युक्त सफलताओं के उपरांत भी दलहन अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं जैसे उत्तर और मध्य भारत के लिये उड़द की लम्बी अवधि की तथा अरहर की कम अवधि की उन्नत किस्मों का विकास, मटर की उच्च उपज देने वाली रोग निरोधक किस्में, चने की कम अवधि की किस्में, बड़े दाने वाली उकठा निरोधी मसूर की किस्में, ग्रीष्मकालीन मूँग और उड़द की कम अवधि में पकने वाली किस्में, एवं अनुकूल उत्पादन कृषि कार्यमाला का विकास, उन्नत किस्मों के शुद्ध बीजों की सुगम उपलब्धता, बदलते मौसम के विपरीत प्रभावों को कम करने के लिये वांछित उपाय आदि। फसल उन्नयन हेतु जैव प्रौद्योगिकी की ‘जीन सम्पादन’ विधि पर आवश्यक ध्यान देना भी वर्तमान की आवश्यकता है। भारतीय वैज्ञानिक, उद्योग जगत, शासकीय नीतियाँ और मेहनती तथा जुझारू दलहन उत्पादक पर्याप्त रूप से ‘दलहन क्रांति’ लाने में पूर्णत: सक्षम हैं।                                                                          

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