गेहूं उत्पादन की नवीनतम तकनीकियां

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गेहूं उत्पादन की नवीनतम तकनीकियां – गेहूं मध्यप्रदेश की रबी की सबसे प्रमुख फसल है तथा इसके क्षेत्र, उत्पादन तथा उत्पादकता में पिछले कुछ वर्षों में काफी वृद्धि देखी गई है। प्रदेश की मिट्टी, जलवायु, नवीन प्रजातियों तथा तकनीकियों को देखते हुए गेहूं की उत्पादकता में और अधिक बढऩे की अभी भी काफी संभावनाएं हैं। उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए अच्छी किस्म की बुवाई तथा संस्तुत की गई तकनीकियों का इस्तेमाल करना अति आवश्यक है।

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खेत की तैयारी : गेहूं को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है, लेकिन बलुई दोमट भूमि इसके लिए उत्तम रहती है। खेत की तैयारी के लिए खरीफ की फसल की कटाई के तुरन्त बाद ही एक गहरी जुताई कर जमीन को कुछ दिन खुली रहने दें। यदि ढेले कड़े हों तो एक बार रोटावेटर चला दें अथवा दो से तीन बार तवे वाले हैरो को चलाकर पाटा लगा दें। यदि उपलब्ध हो तो 10-20 टन गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट खाद अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें।

बीज एवं बुवाई : अच्छी किस्म तथा उच्च गुणवत्ता के बीज का ही प्रयोग करें एवं सिंचाई जल की उपलब्धता एवं बुवाई के समय के अनुसार गेहूं की किस्म का चयन करें। भरोसेमंद संस्था से ही बीज खरीदें। अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए समय पर बुवाई अति आवश्यक है। जल्दी बुवाई वाली प्रजातियां प्रजातियों की बुवाई 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक, समय से बुवाई 10 से 25 नवम्बर तक तथा पिछेती बुवाई 31 दिसम्बर तक अवश्य कर दें। बुवाई हेतु लाईन से लाईन की दूरी 20-23 सेमी. (8 से 9 इंच) रखें। यदि खेत में दीमक लगने की संभावना हो तो बीज को क्लोरोपाइरीफॉस की 5 मिलीलीटर मात्रा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बोयें। बुवाई हेतु छोटे दाने वाली किस्मों की 100 किलो प्रति हेक्टेयर तथा बड़े दाने वाली प्रजातियों की 125 किलो प्रति हेक्टेयर की बीज दर रखें। उचित होगा कि 1000 दानों के वजन के आधार पर बीज की दर निर्धारित करें। 1000 दानों का वजन जितने ग्राम आये, उतना ही किलोग्राम बीज प्रति एकड़ उपयोग में लायें। उदाहरण- यदि किसी किस्म के 1000 दानों का वजन 40 ग्राम है, तो उसके बीज की 40 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ या 100 किलोग्राम मात्रा तथा फसल का उठाव अच्छा होता है। खाद व बीज मिलाकर न बोयें। खाद तीन इंच की गहराई पर व बीज एक से डेढ़ इंच की गहराई पर बोयें।

पोषक तत्व : तालिका के अनुसार खाद दें। असिंचित फसलों में खाद की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही दे देनी चाहिए। सीमित सिंचाई में आधी नत्रजन तथा पूरी फॉस्फोरस व पोटाश बुवाई के समय दें तथा शेष नत्रजन प्रथम सिंचाई पर दें। सिंचित खेती में नत्रजन की शेष मात्रा आधी-आधी प्रथम एवं द्वितीय सिंचाई पर देनी चाहिए। पछेती बुवाई में खाद की मात्रा 20 से 25 प्रतिशत कम तथा बीज की मात्रा 20 से 25 प्रतिशत अधिक रखनी चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग मृदा जांच अथवा विशेषज्ञ की सलाह पर ही करें। यह भी ध्यान दें कि यदि गेहूं की फसल मक्का, ज्वार, बाजरा, धान के बाद ली जा रही है तो विशेष रूप से नत्रजन की मात्रा 20-25 प्रतिशत यानी 25 से 30 किलो प्रति हेक्टेयर तक बढ़ा दें।

खरपतवार प्रबंधन : गेहूं की बुवाई के बाद कम से कम 35 दिन बाद तक खेत को खरपतवार विहीन रखना अति आवश्यक है। खेत व सिंचाई की नालियों तथा मेड़ों में कोई भी खरपतवार दिखे तो तुरंत उखाड़ कर फेंक दें। मानव श्रम की कमी हो तो विशेषज्ञ की सलाह से रसायन का इस्तेमाल खरपतवार नियंत्रण के लिए किया जा सकता है। बुवाई के तुरंत बाद पेन्डीमिथिलीन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव किया जा सकता है। खड़ी फसल में यदि चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार हों तो 4 हफ्ते की फसल पर 2,4-डी की 0.6, 0.75 दिन बाद व दूसरी 60-75 दिन बाद दें। तीन सिंचाई देनी है तो पहली 20-25 दिन बाद, दूसरी 50-55 दिन बाद तथा तीसरी 80-90 दिन बाद दें। इससे अधिक सिंचाई देने के लिए बुवाई के बाद 20-22 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। पथरीली जमीन पर होने पर हल्की सिंचाई जल्दी-जल्दी एवं अधिक संख्या में करनी पड़ती है। लम्बी क्यारी (सरी) के स्थान पर 15 मीटर & 20 मीटर की क्यारी बना कर सिंचाई देना लाभप्रद होता है।

फसल सुरक्षा : गेहूं की नई उन्नत प्रजातियों पर प्राय: किसी बीमारी या कीट का प्रकोप नहीं होता है। फिर भी यदि किसी बीमारी या कीट का प्रकोप हो तो विशेषज्ञ की सलाह से तुरन्त उसके नियंत्रण की व्यवस्था करनी चाहिए।

कटाई एवं मड़ाई : गेहूं की फसल पकते ही यानि जब बाली में दाना कड़क हो जाये तो कटाई कर लें। कटाई के बाद पूलों को 3-4 दिन अच्छी धूप लगने के लिएखेत में ही छोड़ दें तथा इसके बाद अच्छे थ्रेसर से इसकी मड़ाई करें।

भण्डारण : यदि दाने को बीज के लिये या बाद में बेचने के लिए रखना है तो कोठी या टंकी में भरकर उसमें सल्फॉस की गोली सूती कपड़े में बांधकर/ई.डी.बी. डालकर रख दें। चिकनी मिट्टी व भूसा का लेप-ढक्कन के सिरे पर लगाकर कोठी/टंकी को पूरी तरह एयर टाईट कर दें जिससे कि नम हवा का उसमें प्रवेश न हो सके व इस्तेमाल की गई गोलियों की गैस बाहर न निकल सके।

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