नगदी फसल अदरक लगायें

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भूमि की तैयारी– अदरक की खेती सभी प्रकार की जीवांश युक्त एवं उचित जल निकास वाली भूमियों में की जा सकती है, किन्तु हल्की रेतीली अथवा दोमट जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है। भारी भूमियों में गांठे (पंजा) की तथा फैलाव ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है। जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसकी खेती के लिए भूमि की 4-5 जुताई करके भुरभुरी एवं समतल बना लेना चाहिए, जहां जल निकास की सुविधा न हो वहां 1-2 मीटर चौड़ी, 2-3 इंच ऊंची उठी हुई तथा 3-4 मी. लम्बी क्यारियां बनाकर बोनी करें।
किस्में- रियो-डि-जनेरियो, चाइना, मारन, नाडिया, सुप्रभा, सुरुचि, सुरभि, हिमगिरि, वरदा।
खाद की मात्रा- अदरक को बहुत ही अधिक मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी खेती अन्य कम पोषक तत्व चाहने वाली फसलों के फसल-चक्र में होना चाहिए। अदरक को चूना एवं फास्फोरस की आवश्यकता होती है। बुवाई के पूर्व जमीन तैयार करते समय 80-100 गाड़ी (40 टन) प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी कम्पोस्ट खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला लेना चाहिए, इसके अलावा बोने के पहले 100 से 120 किलो नत्रजन 50 किलो फास्फोरस तथा 50 किलो पोटाश प्रति प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बोनी के समय दें। शेष नत्रजन की आधी मात्रा 2-3 बार में बुवाई के दो माह बाद डालें।

अदरक का हमारे दैनिक आहार एवं स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है। अदरक का उपयोग मसालों, दवाइयों, चटनी, अचार, मुरब्बा, सब्जी एवं जल जीरा आदि रूपों में किया जाता है। यह कई प्रकार के खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने में उपयोग किया जाता है। इसमें जिन्जरोल नामक तीखा गंधयुक्त पदार्थ होता है, जो कि गर्म, पाचक, उत्तेजक, रुचिकर, क्षुधावर्धक, कृमिनाशक होता है। इसके 100 ग्राम खाने योग्य भाग में निम्नलिखित पोषक तत्व पाये जाते हैं, जो इस प्रकार है। नमी 80.9 ग्राम, खनिज- लवण 1.2 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 12.3 ग्राम, प्रोटीन 2.3 ग्राम, कैल्शियम 20.0 मिलीग्राम, लोहा 3.5 मिग्रा. रिवोफ्लेविन 0.03 मिलीग्राम, विटामिन 6.0 मिलीग्राम, ऊर्जा 67.0 कि. कैलोरी, फास्फोरस 60.0 मिलीग्राम, केरोटीन 40.0 माइक्रोग्राम, नियॉसिन 9.6 ग्राम पाया जाता है। सूखी अदरक सोंठ के रूप में प्रयुक्त की जाती है। इसके अलावा अदरक के रस एवं तेल का उपयोग आयुर्वेदिक औषधि के रूप में ग्रामीण अंचलों में सर्वविदित है। अदरक किसानों के लिए आय का एक अच्छा स्त्रोत है।

बोने का समय- पहाड़ी क्षेत्रों में जुलाई के प्रथम एवं द्वितीय सप्ताह तक की जाती है। बुवाई का समय इस प्रकार चुनना चाहिए। ताकि वर्षा शुरू होने के पहले अदरक के पौधे दो सप्ताह के हो जायें।
बीज का चुनाव – अदरक बोने के लिए स्वस्थ फसल के बीज लेकर ही बोनी करनी चाहिए, अदरक की स्थानीय जातियों में कुछ आकार प्रकार एवं उपज में अंतर देखा गया है। चाइना और रियो-डि-जनेरियो ने केरल में दो तीन गुना अधिक उपज दी। अदरक की अच्छी किस्म की पहचान उसकी गंध, तीखापन एवं रेशों की मात्रा द्वारा की जाती है।
बीज की मात्रा- अदरक बोने के लिए अदरक की पिछली फसल के कंद उपयोग में लाये जाते हैं। बड़े-बड़े अदरक के पंजों को इस तरह तोड़ लेते हैं, कि उसमें कम से कम 2-3 अंकुर रहें। एक हेक्टेयर बोनी करने के लिए लगभग 12-15 क्विंटल कंद बीज की आवश्यकता पड़ती है, अंतरवर्तीय फसलों में बीज की मात्रा कम लगती है।

खुदाई एवं उपज
अदरक की फसल लगभग 8-9 माह में परिपक्व हो जाती है। पकने की अवस्था में पौधे की बाढ़ रुक जाती है। पौधे पीले पड़ कर सूखने लगते हैं, और पानी देने के बाद भी उनकी वृद्धि नहीं होती। ऐसी फसल खोदने लायक मानी जाती है। खुदाई के बाद कंदों की मिट्टी झड़ाकर पानी से अच्छी तरह धो लिया जाता है और हवा में थोड़ी देर सुखाकर बाजार भेजा जाता है। अदरक से सोंठ बनाने के लिए सामान्य खुदाई से 15-20 दिन पूर्व खुदाई की जाती है। खुदाई देरी से करने पर रेशों की मात्रा बढ़ जाती है, यदि अदरक के भाव कम हों तो एक वर्ष तक अदरक खेत में ही छोड़ी जा सकती है। अदरक की औसत पैदावार 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेर होती है, इससे 30 से 40 क्विंटल सोंठ बनाई जाती है।

बीज उपचार एवं बोने का तरीका- बीज के लिए अदरक का रोग मुक्त कंद का चयन करें। बोने के पूर्व कंदों को बाविस्टीन 3 ग्राम प्रति लीटर अथवा डायथेन एम-45, 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर कंद को कम से कम 30 मिनिट तक डुबाकर उपचारित करें। उपचारित बीज की बोनी कतारों में करना चाहिए। इसके लिए 30-40 से.मी. कतार से कतार एवं 20-25 से.मी. पौधे से पौधे की दूरी रखी जाती है। बीज कंदों को लगभग 4-5 से.मी. गहराई में बोने के पश्चात हल्की मिट्टी या गोबर की खाद की पर्त से ढक दें।
निंदाई, गुड़ाई एवं सिंचाई- अदरक का अंकुरण बोने के लगभग 15-20 दिन के बाद होता है, क्योंकि अदरक की फसल में खाद की मात्रा काफी दी जाती है। इसलिए खरपतवार (नींदा) भी बहुत होता है। किन्तु पत्तियों से ढंके रहने के कारण लगभग 1 माह तक फसल नींदा मुक्त रहती है। इसके बाद नींदा आते हैं। अत: अदरक की बोनी के लगभग 40-50 दिन के बाद की अवस्था में हर माह फसल की निंदाई-गुड़ाई करके मिट्टी चढ़ाना चाहिए। बरसात के बाद शीतकाल आने पर प्रति 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना चाहिए।

  • डॉ. विशाल मेश्राम
  • डॉ. के.के. सिंह
  • सुभाष रावत
  • डॉ. उत्तम कुमार बिसेन
  • विजय सिंह सूर्यवंशी
email : kvkmandla@rediffmail.com
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