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फसल की खेती (Crop Cultivation)

जुलाई में किसान बाजरे की इन उन्नत किस्मों की करें बुवाई, 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलेगा उत्पादन

18 जुलाई 2026, नई दिल्ली: जुलाई में किसान बाजरे की इन उन्नत किस्मों की करें बुवाई, 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलेगा उत्पादन – खरीफ सीजन में बाजरा कम वर्षा वाले क्षेत्रों की प्रमुख फसल मानी जाती है। यह फसल कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने के साथ पोषक तत्वों से भरपूर होती है। ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) ने किसानों के लिए बाजरे की कई उन्नत और क्षेत्रवार किस्मों की जानकारी साझा की है। इन किस्मों के चयन और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन के साथ अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए पूसा कम्पोजिट-443

राजस्थान, गुजरात और हरियाणा जैसे उन क्षेत्रों के लिए, जहां वार्षिक वर्षा 400 मिलीमीटर से कम होती है, पूसा कम्पोजिट-443 किस्म की सिफारिश की गई है। यह किस्म 75 से 76 दिनों में तैयार हो जाती है और 22 से 23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है। साथ ही यह डाउनी फफूंद, ब्लास्ट, रस्ट, एर्गोट और स्मट जैसी प्रमुख बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है।

मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए पूसा कम्पोजिट-701

हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब सहित मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए पूसा कम्पोजिट-701 उपयुक्त मानी गई है। यह किस्म 78 से 79 दिनों में पक जाती है और 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। यह भी कई प्रमुख रोगों के प्रति प्रतिरोधी है।

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अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए पूसा कम्पोजिट-612

महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे अधिक वर्षा वाले राज्यों के लिए पूसा कम्पोजिट-612 की अनुशंसा की गई है। यह किस्म 27 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम है और रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता रखती है।

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34 क्विंटल तक उत्पादन देने वाली बायोफोर्टिफाइड किस्म

पूसा संस्थान ने वर्ष 2024 में पूसा-1801 नामक बायोफोर्टिफाइड किस्म विकसित की है। इसमें 70 पीपीएम आयरन और 57 पीपीएम जिंक पाया जाता है, जिससे यह पोषण की दृष्टि से भी बेहतर मानी जाती है। यह किस्म लगभग 84 दिनों में तैयार होती है और 33 से 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। कुपोषण प्रभावित क्षेत्रों के लिए इसे विशेष रूप से उपयोगी माना गया है।

लाइन में करें बुवाई, मिलेगा बेहतर उत्पादन

विशेषज्ञों के अनुसार बाजरे की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक है। इसके लिए 1.5 से 2 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होता है। किसानों को छिटकवा विधि की बजाय लाइन में बुवाई करने की सलाह दी गई है। लाइन से लाइन की दूरी 50 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखने से अंकुरण बेहतर होता है, खेत की देखभाल आसान रहती है और उत्पादन बढ़ता है। बुवाई से पहले बीजों को मेटालैक्सिल (6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित करने की सलाह दी गई है, ताकि डाउनी फफूंद जैसी बीमारी से बचाव किया जा सके।

शुरुआती 30 दिन खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान

पूसा संस्थान के अनुसार बाजरे की फसल के शुरुआती 30 दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बुवाई के तुरंत बाद एट्राजीन (1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) को 400 से 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इसके बाद लगभग 15 दिन बाद निराई-गुड़ाई करने से फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है।

मिट्टी परीक्षण के अनुसार करें उर्वरकों का प्रयोग

विशेषज्ञों का कहना है कि बाजरे की अच्छी पैदावार के लिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग आवश्यक है। सामान्य रूप से 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। हालांकि किसानों को मिट्टी परीक्षण कराने के बाद ही उर्वरकों की मात्रा तय करनी चाहिए, ताकि फसल को आवश्यक पोषक तत्व मिल सकें और अनावश्यक खर्च से भी बचा जा सके।

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