फसल की खेती (Crop Cultivation)

खेत में केवल यूरिया डाल रहे हैं? समझिए क्यों कमजोर हो रही है सोयाबीन की फसल

29 मई 2026, नई दिल्ली: खेत में केवल यूरिया डाल रहे हैं? समझिए क्यों कमजोर हो रही है सोयाबीन की फसल – सोयाबीन की खेती में आज सबसे बड़ी समस्या यह बनती जा रही है कि किसान संतुलित पोषण की बजाय केवल यूरिया पर निर्भर हो गए हैं। खेत में जैसे ही फसल हल्की पीली दिखाई देती है, तुरंत यूरिया डाल दिया जाता है। शुरुआत में पौधे हरे जरूर दिखते हैं, लेकिन बाद में फलियाँ कम बनती हैं, पौधे गिरते हैं और उत्पादन घट जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार सोयाबीन गेहूँ या धान जैसी फसल नहीं है। यह दलहनी फसल है, जो वातावरण से नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखती है। इसलिए इसमें बहुत अधिक यूरिया की आवश्यकता नहीं होती। इसके बावजूद कई किसान 2–3 बोरी तक यूरिया डाल देते हैं, जिससे फसल केवल पत्तेदार बनती है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर की सलाह के अनुसार मध्य भारत में सोयाबीन के लिए 25:60:40:20 किलो प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की आवश्यकता होती है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कई संतुलित विकल्प सुझाए हैं। 

पहला विकल्प है 56 किलो यूरिया + 375 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) + 67 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP)।

दूसरा विकल्प है 125 किलो DAP + 67 किलो MOP + 25 किलो बेंटोनाइट सल्फर।

तीसरा विकल्प है 200 किलो मिश्रित उर्वरक 12:32:16 + 25 किलो बेंटोनाइट सल्फर। 

विशेषज्ञों का कहना है कि किसान अक्सर सल्फर को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि सोयाबीन में तेल निर्माण के लिए सल्फर बेहद जरूरी तत्व है। सल्फर की कमी होने पर दाने हल्के रह जाते हैं और तेल प्रतिशत कम हो जाता है।

इसी तरह पोटाश पौधों को मजबूत बनाता है और सूखे तथा रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है। लेकिन कई खेतों में किसान केवल DAP और यूरिया डालकर पोटाश को पूरी तरह छोड़ देते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब “ज्यादा खाद = ज्यादा उत्पादन” वाली सोच बदलनी होगी। सही मात्रा, सही तत्व और सही समय पर खाद देना ही उत्पादन बढ़ाने का असली रास्ता है।

जैविक खाद को भी उतना ही जरूरी माना गया है। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने प्रति हेक्टेयर 5–10 टन गोबर की सड़ी खाद या 2.5 टन पोल्ट्री खाद उपयोग करने की सलाह दी है। जिन किसानों के पास सिंचाई उपलब्ध है, वे ढैंचा की हरी खाद को मिट्टी में मिलाकर जैविक कार्बन बढ़ा सकते हैं। 

विशेषज्ञों के अनुसार लगातार केवल रासायनिक खादों पर निर्भर रहने से मिट्टी की ताकत घटती जाती है। इसलिए संतुलित रासायनिक खाद के साथ जैविक खाद का उपयोग भविष्य की सोयाबीन खेती के लिए बेहद जरूरी हो गया है।

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