फसल की खेती (Crop Cultivation)

धान में सिर्फ यूरिया डालने से नहीं बढ़ेगी पैदावार, जानिए वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन का पूरा फॉर्मूला

20 जून 2026, नई दिल्ली: धान में सिर्फ यूरिया डालने से नहीं बढ़ेगी पैदावार, जानिए वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन का पूरा फॉर्मूला – हर सीजन में धान उत्पादक किसानों के सामने एक ही सवाल होता है—अधिक उत्पादन कैसे प्राप्त किया जाए? अधिकांश किसान इसका जवाब अधिक यूरिया के उपयोग में तलाशते हैं। खेत में फसल का रंग गहरा हरा दिखाई देने लगता है, पौधे तेजी से बढ़ते हैं और किसान को लगता है कि फसल शानदार होगी। लेकिन जब कटाई का समय आता है तो अक्सर उम्मीद के अनुसार उत्पादन नहीं मिलता। इसका सबसे बड़ा कारण असंतुलित उर्वरक प्रबंधन है। धान की फसल केवल नाइट्रोजन पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि उसे फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक तथा अन्य पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है। यदि इनमें से किसी एक तत्व की कमी हो जाए तो उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है, चाहे खेत में कितना भी यूरिया क्यों न डाला गया हो। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य की लाभकारी खेती का आधार संतुलित पोषण प्रबंधन और मृदा आधारित उर्वरक चयन ही होगा।

भारत में धान देश की सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसलों में से एक है। बढ़ती आबादी और खाद्यान्न मांग के बीच प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उत्पादन प्राप्त करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। ऐसे में उर्वरकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उर्वरक न केवल पौधों की वृद्धि को गति देते हैं, बल्कि दानों की संख्या, भराव, गुणवत्ता और अंततः कुल उत्पादन को भी प्रभावित करते हैं। हालांकि यह समझना आवश्यक है कि सभी खेतों और सभी किसानों के लिए एक जैसी उर्वरक सिफारिश उपयुक्त नहीं होती। मिट्टी की प्रकृति, उसमें उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, जैविक कार्बन स्तर, पीएच तथा सिंचाई की व्यवस्था के आधार पर उर्वरक प्रबंधन में बदलाव करना पड़ता है।

धान की फसल को मुख्य रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में धान के लिए 100 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक माना जाता है। किसान प्रायः नाइट्रोजन पर अधिक ध्यान देते हैं क्योंकि इसका प्रभाव तुरंत दिखाई देता है। फसल हरी-भरी हो जाती है और वृद्धि तेज हो जाती है। लेकिन फास्फोरस जड़ों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जबकि पोटाश पौधों को मजबूत बनाकर रोगों एवं प्रतिकूल मौसम के प्रति सहनशीलता प्रदान करता है। यदि इन दोनों तत्वों की उपेक्षा की जाए तो फसल का समग्र विकास प्रभावित हो सकता है।

धान की फसल में खाद देने का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी कि उसकी मात्रा। लंबे समय से यह परंपरा रही है कि किसान बुवाई या रोपाई के समय आधी खाद देते हैं और शेष खाद बाद में डालते हैं। आधुनिक कृषि अनुसंधानों ने भी यह साबित किया है कि नाइट्रोजन को विभाजित मात्रा में देना सबसे अधिक प्रभावी होता है। रोपाई के समय कुल नाइट्रोजन की लगभग आधी मात्रा, पूरी फास्फोरस तथा पूरी पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। इसके बाद जब फसल में कल्ले निकलने लगें तब नाइट्रोजन की दूसरी खुराक दी जानी चाहिए। तीसरी और अंतिम खुराक बालियां बनने से पहले देना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस प्रकार पौधे को उसकी आवश्यकता के अनुसार पोषण मिलता रहता है और पोषक तत्वों का नुकसान भी कम होता है।

धान उत्पादन में जिंक का महत्व पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। देश के अनेक धान उत्पादक क्षेत्रों में जिंक की कमी एक सामान्य समस्या बन चुकी है। जिंक की कमी होने पर पौधों की नई पत्तियों पर पीले या सफेद धब्बे दिखाई देते हैं, वृद्धि रुक जाती है और खेत में पौधों का विकास असमान दिखने लगता है। कई बार किसान इसे रोग समझकर अनावश्यक दवाओं का छिड़काव कर देते हैं, जबकि वास्तविक समस्या पोषक तत्व की कमी होती है। ऐसी स्थिति में जिंक सल्फेट का उपयोग प्रभावी समाधान माना जाता है। मिट्टी में जिंक सल्फेट के प्रयोग से फसल की वृद्धि में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है।

धान की खेती में पोटाश की भूमिका को भी अक्सर कम आंका जाता है। पोटाश पौधों की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है, जिससे पौधे गिरने की समस्या से बचते हैं। इसके अलावा यह जल प्रबंधन, दाने भराव और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करता है। जिन क्षेत्रों में किसान केवल यूरिया और डीएपी पर निर्भर रहते हैं, वहां अक्सर पोटाश की कमी के कारण अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता। यही कारण है कि संतुलित उर्वरक प्रबंधन में पोटाश को शामिल करना आवश्यक माना जाता है।

मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन आज की आवश्यकता बन चुका है। बिना मिट्टी जांच के उर्वरक डालना वैसा ही है जैसे बिना जांच के दवा लेना। कई बार किसान उन पोषक तत्वों पर पैसा खर्च कर देते हैं जो पहले से ही मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं, जबकि जिन तत्वों की वास्तविक कमी होती है उनकी पूर्ति नहीं हो पाती। मृदा परीक्षण से खेत की पोषण स्थिति का सटीक आकलन किया जा सकता है और उसी के आधार पर उर्वरक की मात्रा निर्धारित की जा सकती है। इससे उत्पादन लागत कम होती है और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है।

रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खादों का उपयोग भी धान उत्पादन के लिए लाभकारी माना जाता है। गोबर की सड़ी हुई खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाते हैं। इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है। लंबे समय तक केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, इसलिए कृषि वैज्ञानिक रासायनिक और जैविक स्रोतों के समन्वित उपयोग की सलाह देते हैं।

आज जब उर्वरकों की लागत लगातार बढ़ रही है और पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने हैं, तब संतुलित एवं वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन ही किसानों की आय बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका बनकर उभर रहा है। धान की फसल में केवल अधिक खाद डालना समाधान नहीं है, बल्कि सही खाद को सही मात्रा में और सही समय पर देना ही वास्तविक सफलता की कुंजी है। जो किसान मृदा परीक्षण, संतुलित NPK उपयोग, सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति और जैविक खादों के समावेश जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाते हैं, वे न केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करते हैं बल्कि अपनी मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता भी बनाए रखते हैं। यही टिकाऊ और लाभकारी धान उत्पादन का आधार है।


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