बटेर पालन अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत

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  • 1 फरवरी 2021, भोपाल, अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत- आाज भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर पर मुर्गी पालन से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। साथ ही मुर्गी पालन आज दुनिया में आय प्राप्ति का एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है। इसके साथ ही भारत में बटेर की खेती अच्छी आय और रोजगार के अवसर का एक बड़ा स्रोत हो सकती है। बटेर सबसे छोटे आकार के पोल्ट्री पक्षियों की एक प्रजाति है जिसकी पालन-पोषण प्रणाली बहुत आसान और सरल है। जंगली बटेरों को घरेलू पक्षियों के रूप में पालने के तरीकों का पता जापानी वैज्ञानिकों ने पहले लगाया। बटेर की खेती जापान और दुनिया भर में काफी फैल गई है। अब दुनिया भर में बटेर की खेती का व्यवसाय लोग मांस और अंडे दोनों के व्यावसायिक उत्पादन के लिए करते हैं। यह व्यवसाय अन्य पोल्ट्री व्यवसाय की तुलना में अधिक लाभदायक है। जापानी बटेर पालन में भारत का मांस उत्पादन में पाँचवां तथा अण्डा उत्पादन में सातवां स्थान है। सभी प्रकार की वायु और पर्यावरण के साथ बटेर खुद को ढाल सकते हैं और बटेरों के लिए भारतीय जलवायु बहुत उपयुक्त है । आजकल भारतवर्ष में ज्यादा लोग जापानी बटेर का व्यावसायिक पालन कर रहे हंै। बटेर के मांस और अंडे अन्य पोल्ट्री अंडे की तुलना में बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं क्योंकि इसमें तुलनात्मक रूप से प्रोटीन, फास्फोरस, लोहा, विटामिन ए बी 1 और बी 2 अधिक होता है। बटेर को लावा तितर ऐसे विविध नाम से जाना जाता है। बटेर पक्षी अपनी स्वादिष्ट मांस, अंडे और अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। कुछ वर्षों में बटेर की जापानी नस्लों को विकसित किया गया है। इसलिए बटेर पालन आसान हो गया है। बटेर पालन आजकल के परिवेश में ग्रामीण व्यवस्था में श्रेष्ठतम व्यावसायिक पालन की श्रेणी में आता है। कुक्कुट पालकों को जापानी बटेर की फार्मिंग के लिये एक लाइसेंस की आवश्यकता होती है। लाइसेंस चार प्रकार के होते है। बटेर बिक्री के लिए बटेर पालने के लिए मांस बिक्री के लिए बटेर का उत्पादन के लिए। जो आसानी से क्षेत्र के पशुधन अधिकारी से मिल सकता है।
    आवास प्रबंधन
    बटेर चूजों का पालन दो तरीके से किया जा सकता है, डीप लीटर पद्धति और बैटरी ब्रूडर इसके लिए बैटरी ब्रूडर काफी उपयुक्त होता है ।
    डीप लीटर पद्धति
    इस पद्धति में कम जगह लगती है। दो सप्ताह तक डीप लीटर विधि में 200 से 250 वर्ग से.मी. प्रति चूजा जगह होनी चाहिए। उसके बाद चूजों को बैटरी ब्रूडर में रखा जाता है।
    बैटरी ब्रूडर पद्धति
    पहले दो सप्ताह तक 3&2.5&1.5 फीट जगह में लगभग 100 बटेर रख सकते और तीन से छह सप्ताह तक 4&2.5&1.5 फीट जगह में लगभग 50 बटेर रखे जा सकते हैं।
    6 से 7 सप्ताह की आयु वाले बटेर से अंडे मिलने लगते हैं । प्रजनन के लिए तीन मादा पर एक नर की व्यवस्था करें।
     एक मुर्गी के लिए र्निधारित स्थान पर 8-10 बटेर रख सकते हैं । छोटे आकार के होने के कारण इनका पालन आसानी से किया जा सकता है। इसके साथ ही इनपे दाने की खपत कम होती है ।
    बटेर पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए उनके विविध नस्लों के बारे में जानना जरूरी है ।
    केंद्रीय अनुसंधान संस्थान के द्वारा जो नस्लें विकसित की गई हैं।
    ब्रॉयलर बटेर की नस्लें : कैरी उत्तम (सफेद छाती वाले) कैरी श्वेता (सफेद पंख वाले) और कैरी पर्ल (सफेद अंडे देने वाले) ।
    अंडा देने वाली बटेर की नस्लें : इंग्लिश सफेद ब्रिटिश रेंज और मांचुरियन गोल्ड।
  • आहार प्रबंधन
  •  बटेर आहार के लिए कोई खास व्यवस्था नही करनी पड़ती है। बटेर की सही शारीरिक बढ़वार के लिए संतुलित आहार की जरुरत होती है।
  •  बटेर की शारीरिक बढ़वार 10-12 सप्ताह कि उम्र में पूरी हो जाती है। शुरू के 3 सप्ताह में अधिक बढ़वार होती है ।
  • एक वयस्क बटेर को प्रतिदिन 14 कि.ग्रा. आहार की आवश्यकता होती है ।
  •  अंडा उत्पादन करने वाली एक बटेर को एक दिन में 18 से 20 ग्राम दाना जब कि मांस उत्पादन करने वाली एक बटेर को 25 से 28 ग्राम दाना लगता है।
  • पाँच सप्ताह की उम्र तक एक किलो ग्राम मांस पैदा करने के लिये 2.5 किलो ग्राम दाने की आवश्यकता पड़ती है।
  • बटेर की सही शारिरीक बढ़वार के लिए संतुलित आहार की जरुरत होती है।
  • रोग प्रबंधन
  • मुर्गियों की तुलना में बटेर में रोग कम होते है । रोज की सफाई एंव रखरखाव स्वच्छ पानी की व्यवस्था और उचित वेंटिलेशन यह पर्यावरण को रोग मुक्तरखने में मदत करता है। बटेर में होने वाली प्रमुख बिमारियों में अलसरेटिव इटेराइटीस यह जीवाणु जनीत बीमारी है। इसमें इंटेस्टाईन में अल्सर हो जाते है। इसके रोकथाम के लिए लीटर की सफाई पर ध्यान दें कॉक्सीडियोसिस यह बीमारी खराब रखरखाव के कारण फैलती है और हिसटोमोनियसिस इसके बचाव के लिए समय-समय पे डीवर्मींग करवायें।
    बटेर की बिक्री
    बटेर को बाजार में बेचने की उम्र लगभग पांच सप्ताह की होती है ।
    सावधानियां
  • चूजे मान्यता प्राप्त हैचरी से ही लें।
  •  चूजों को संतुलित आहार दे।
  •  दाना-पानी वाले बरत्नों को दिन में कम से कम एक बार साफ करें ।
  • बीमार और कमजोर पक्षियों को अलग रखे।
  • बटेर पालन के लाभ
    कुक्कुट पालन में नये विकल्प के तौर पर कम खर्चे मे अधिक आय पाने का जरिया बना है बटेर पालन। व्यवसाय में आमदनी के लिये मुर्गी की तुलना में जापानी बटेर की विशेषत: पर ध्यान देंं।
  •  बटेर पालने के लिए कम जगह लगती है।
  • कम खर्चे में बटेर पालन शुरू किया जा सकता है।
  • बटेर की प्रजाति प्रति वर्ष तीन से चार पीढ़ी को जन्म दे सकती है।
  •  मादा बटेर अनुकूल वातावरण में लम्बे समय तक अंडे देती है।द्य व्यावसायिक बटेर पालन में टीकाकरण की आवश्यकता नहीं होती है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने के कारण इसमें बीमारियाँ न के बराबर होती हैं।
  • जापानी बटेर के अंडों की पौष्टिकता मुर्गी के अंडों से कम नहीं होती है।
  • बटेर का अंडा मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयुक्त है।
  •  बटेर का मांस बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। उनके मांस में वसा बहुत कम होता है। इसलिए बटेर का मांस रक्तचाप के रोगियों के लिए बहुत उपयुक्त है।
    चूजों की देखभाल
    चूजों की देखभाल
    चूजों की देखभाल ?
  • बटेर के बच्चे का वजन लगभग 7 ग्राम होता है। इसलिए उसकी देखभाल काफी सावधानीपूर्वक करनी पड़ती है। शुुरुआती दिनों में बटेर के चूजों पर विषेश ध्यान देना होता है। क्योंकि पहले सप्ताह में चूजों का मृत्यु दर अधिक देखा जाता है ।
  •  चूजों का पालन जमीन पर डीप लीटर पद्धति या बैटरी ब्रूडर में किया जाता है ।द्य चूजों को 3-4 सप्ताह के बाद तापक्रम की आवश्यकता नहीं रहती है। इसलिए उन्हें ग्रोवर घर में रख दें।
  •  चूजों को कैनिबालिस्म नाम के रोग से बचाने के लिए चार सप्ताह की उम्र में चूजों के ऊपर के चोच को थोड़ा काट दें।
  • बटेर मादा 75 प्रतिशत अंडे शाम के समय (दोपहर 3-6) देती है ।

 

  • अंडों की देखभाल
    अंडों की देखभाल
    अंडों की देखभाल
  • एक अंडे का वजन लगभग 7-15 ग्राम होता है।
  • अंडे काले डॉट्स के साथ सफेद होते हैं।
  • बटेर के अंडे का स्फुटन (हॅचिंग) कृत्रिम तरीके से इनक्यूबेटर में आसानी से किया जा सकता है।द्य अंडों को सेने के लिए तापमान और नमी पर विशेष रुप से ध्यान देना होता है ।
  • अंडा सेने के समय 0-14 दिनों तक तापमान 99.50 फारेनहाइट और नमी 87 प्रतिशत होनी चाहिए। इसके बाद 15-17 दिनों तक तापमान 98.50 फारेनहाइट एवम नमी 90 प्रतिशत हो।
  • 14 दिनों तक एक निश्चित समय पर अंडों का उलटना-पलटना जरुरी होता है। उसके बाद अंडों को इनक्यूबेटर से हॅचिंग मशीन में रख दिया जाता है। तब 18वे दिन से अंडों से चूजे निकलना शुरु होते है।
  • मुर्गी अंडे की तुलना में बटेर के अंडे में 2.47 कम वसा होता है।
  • 5 सप्ताह के आयु के बाद बटेर के चूजों को जमीन पर या पिंजड़ो में रखा जा सकता है।
  •  जमीन पर लीटर को फैलाकर रखा जा सकता है। उसकी मोटाई 10 से.मी. तक पर्याप्त है।
  • 8 से 12 बटेर को 2.5 से 3 वर्ग फीट स्थान में रखा जा सकता है ।
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