पशुपालन: उपचार से बेहतर है, रोगों की रोकथाम

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  • डॉ. आरिफ अंसार,
    डॉ. आर.के. जैन, डॉ. ए.एस. राणे, मो. 9425125811

18  मई 2021, भोपाल ।  उपचार से बेहतर है, रोगों की रोकथाम – जून और जुलाई के महीने में जैसे ही बरसात की शुरुआत होती है, रोगकारी जीवाणु और विषाणुओं को पर्याप्त मात्रा में आद्र्रता एवं तापमान मिलने से वे सक्रिय हो जाते हैं और कई भयानक बीमारियों जैसे कि लंगड़ा बुखार तथा गलघोटू बीमारियों को जन्म देते हैं। जैसा कि हम जानते हंै कि उपचार से बेहतर है रोगों की रोकथाम। बरसात के इन दिनों में जानवरों को रोगों से सुरक्षा प्रदान करने के मूल रुप से दो तरीके हैं। पहला है पर्याप्त पोषण के अभाव में टीकाकरण के बावजूद भी जानवर पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व जैसे कि प्रोटीन, खनिज एवं विटामिन्स आवश्यक होते हैं जो कि जानवरों को संतुलित आहार से प्राप्त होते हंै तथा पर्याप्त रुप से रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं।

दूसरा है टीकाकरण जिसमें हम जानवर को टीका लगाते है, टीका एक जैविक कारक होता है। यह किसी एक विशिष्ठ रोगकारी कारण का ही निष्क्रिय रुप होता है यह टीका जानवरों में रोग तो उत्पन्न नहीं कर पाता परंतु बीमारी के खिलाफ पर्याप्त रुप से रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। इसलिए हम किसी सरकारी पशु चिकित्सालय अथवा प्राइवेट पशु चिकित्सालय से जानवर का टीकाकरण करवा सकते हैं।

प्राय: यह देखा गया है कि गाय व भैंस बरसात के दिनों में ब्याना शुरू करते हैं, इन्ही दिनों पशुओं की विशेष देखभाल आवश्यक है परंतु इसके विपरीत पशुपालक भाई इन्हीं माहों में (गर्भावस्था के अंतिम काल) चूंकि पशु दूध देना बंद कर देता है या दूध निकालना बंद कर देते हैं और इन गर्भस्थ पशुओं को केवल भूसा या सूखा चारा ही प्रदान किया जाता है। जबकि गर्भस्थ पशु को गर्भावस्था के अंतिम काल में ही सबसे अधिक पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि इसी अवस्था में गर्भस्थ बछड़े की 75 प्रतिशत वृद्धि होती है इसी काल में गर्भस्थ पशु आवश्यक तत्वों का संग्रह भी करता है जिनका उपयोग पशु दूध श्रवण काल में करता है। चूंकि गर्भस्थ बछड़े अपना पोषण अपनी मां से ही प्राप्त करते हैं जिसमें गर्भस्थ पशु में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जो अन्य कई समस्याओं को जन्म देती है जैसे कि- – जर रुकना – रक्त युक्त पेशाब

दुग्ध ज्वार – किटोसिस

जर रुकना : बच्चा जन्म लेने के बाद कभी-कभी मादा जर नहीं गिराती जिसका मुख्य कारण आहार में कैल्सियम, फास्फोरस, विटामिन-सी व सेलेनियम इत्यादि की कमी है।

रक्त युक्त पेशाब : सामान्यत: अधिक दूध देने वाले शंकर गायों में ब्याने के उपरांत तथा भैसों में गर्भावस्था के अंतिम काल में देखा गया है। इसका मुख्य कारण आहार में फास्फोरस की कमी है। जिससे रक्त में उपस्थित लाल रक्त कणिकाएं टूटने लगती हैं और हिमोग्लोबिन मूत्र के साथ विर्सजित होने लगती है। जिससे मूत्र भूरा काफी के रंग जैसा हो जाता है। इस अवस्था से बचने के लिए हमें गर्भस्थ पशु को पर्याप्त मात्रा में लगभग दो-तीन किलो दाना देना चाहिए।

दुग्ध ज्वर : यह समस्या मुख्यत: अधिक दूध देने वाली संकर गायों में ब्याने के बाद प्रथम 3-4 दिनों में होता है क्योंकि दूध में कैल्सियम की अधिक मात्रा उत्सर्जित होती है जिससे रक्त में कैल्सियम की कमी हो जाती है। पशु के शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है पशु बेहोश भी हो सकता है कैल्सियम की कमी से पशु जमीन पर बैठ जाता है और सिर को छाती पर टिका देता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि पशु सो रहा है। तथा सही समय पर उचित उपचार नहीं मिलने से पशु मर भी सकता है।

गर्भपात (मृत नवजात का जन्म) : यह समस्या मुख्यत: आहार में प्रोटीन विटामिन-ए, विटामिन-सी, कॉपर व सैलेनियम की कमी से होता है जो भू्रण के पूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं।

गर्भाशय का बाहर निकलना : यह समस्या गाय/भैसों में ब्याने के तुरंत बाद या गर्भावस्था के अंतिम काल में पायी जाती है। इसका मुख्य कारण आहार में कैल्सियम तथा फास्फोरस की कमी है।

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम : इसका मुख्य कारण गर्भस्थ पशु के आहार में कैल्सियम, फास्फोरस व मैग्रेशियम की कमी है। इस रोग में पशु सामान्य प्रतीत होता है, परंतु पशु खड़ा होने में असमर्थ रहता है।

किटोसिस : इस रोग में पशु के रक्त में किटोन बॉडिज बन जाती है जिसका मुख्य कारण गर्भस्थ पशु के आहार में शर्करा की कमी है।
अंत में हम सभी पशु पालकों को यह सुझाव देना चाहेंगे कि गर्भवस्था के अंतिम काल में खनिज एवं विटामिन युक्त संतुलित आहार पशु को अवश्य दें इसके लिए 2-3 किलोग्राम दाना मिश्रण का उपयोग करें।

ताकि पशुओं को उपरोक्त समस्याओं से बचाया जा सके।

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