पशुपालन (Animal Husbandry)

एचएफ गाय ने 24 घंटे में दिया लगभग 65 किलो दूध, उच्च दुग्ध क्षमता की फिर हुई पुष्टि

10 मार्च 2026, भोपाल: एचएफ गाय ने 24 घंटे में दिया लगभग 65 किलो दूध, उच्च दुग्ध क्षमता की फिर हुई पुष्टि – भारत के डेयरी क्षेत्र में उन्नत नस्लों के कारण दूध उत्पादन क्षमता में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है। विशेष रूप से होल्सटीन फ्रिज़ियन (HF)नस्ल की गायें अपनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता के लिए विश्वभर में जानी जाती हैं। हाल ही में राजस्थान में आयोजित एक डेयरी आयोजन में एचएफ गाय ने 24 घंटे में लगभग 65 किलोग्राम दूध उत्पादन कर इस नस्ल की उत्पादकता क्षमता को एक बार फिर रेखांकित किया।

यह उपलब्धि हरियाणा के हिसार जिले के डेयरी किसान पवन कुमार की एचएफ गाय ने हासिल की, जिसने 24 घंटे में 64.44 किलोग्राम दूध उत्पादन किया। यह प्रदर्शन डेयरी विशेषज्ञों और पशुपालकों के बीच चर्चा का विषय बना, क्योंकि यह वैज्ञानिक प्रबंधन, संतुलित आहार और बेहतर नस्ल सुधार के माध्यम से प्राप्त उच्च उत्पादन क्षमता का उदाहरण है।

होल्सटीन फ्रिज़ियन नस्ल को दुनिया की सबसे अधिक दूध देने वाली नस्लों में माना जाता है। भारत में भी एचएफ और एचएफ क्रॉसब्रीड पशुओं ने दूध उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उचित पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और वैज्ञानिक पशुपालन प्रबंधन के साथ यह नस्ल डेयरी किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

यह रिकॉर्ड उत्पादन 27–28 फरवरी को राजस्थान के श्री करण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर में आयोजित ‘रंगीला’ डेयरी एवं पशुपालन महोत्सव के दौरान दर्ज किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था NDDB डेयरी सर्विसेज (NDS) द्वारा किया गया था।

महोत्सव का प्रमुख आकर्षण दूध दुहाई प्रतियोगिता रही, जिसमें विभिन्न नस्लों के पशुओं की दूध उत्पादन क्षमता का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया गया। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य किसानों को बेहतर पशुपालन पद्धतियों के लिए प्रेरित करना और विभिन्न नस्लों की वास्तविक उत्पादन क्षमता को सामने लाना था।

प्रतियोगिता में एचएफ गाय के अलावा अन्य नस्लों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। गिर नस्ल की गाय ने 24 घंटे में 26.78 किलोग्राम दूध दिया, जबकि अन्य नस्लों का उत्पादन इस प्रकार रहा: साहीवाल – 23 किलोग्राम, थारपारकर – 14 किलोग्राम, राठी – 18 किलोग्राम, जर्सी – 37 किलोग्राम और मुर्रा भैंस – 23 किलोग्राम।

आयोजकों के अनुसार प्रतियोगिता में दूध उत्पादन का रिकॉर्ड तीन चरणों की वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से दर्ज किया गया, जिससे परिणामों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके। इससे पशुपालकों को अपने पशुओं की वास्तविक उत्पादन क्षमता समझने और बेहतर प्रबंधन निर्णय लेने में मदद मिलती है।

महोत्सव के दौरान उन्नत डेयरी तकनीकों के प्रदर्शन, विशेषज्ञों के साथ तकनीकी चर्चाएं और प्रगतिशील पशुपालकों के अनुभव साझा करने के सत्र भी आयोजित किए गए। साथ ही राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति को दर्शाते सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान किया।

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