मछली के साथ सिंघाड़े की भी खेती करें

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  • डॉ. माधुरी शर्मा, सह-प्राध्यापक
  • डॉ. प्रीति मिश्रा, सहायक प्राध्यापक
    मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय
    नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर
    Corresponding author – preetimishra_v @yahoo.co.in


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अगस्त 2022, मछली के साथ सिंघाड़े की भी खेती करें –

सिंघाड़ा एक उत्तम खाद्य पदार्थ है। तालाब में सिंघाड़ा बरसात में लगाया जाता है एवं उपज अक्टूबर माह से जनवरी तक ली जा सकती है। इसके लिए छोटे तालाब जिनकी गहराई 1.5 से 2 मीटर तक उपयुक्त है। सिंघाड़ा और मछली पालन से जहां मछलियों को भोजन प्राप्त होता है। वहीं खाद का उपयोग सिंघाड़ा की वृद्धि में सहायक होता है। सिंघाड़े की पत्तियाँ एवं शाखाएँ जो समय-समय पर टूटती हैं, वे मछलियों के भोजन के काम आती है। पौधे का वह भाग जो मछलियाँ नहीं खाती हैं वे तालाब में विघटित होकर तालाब की उत्पादकता बढ़ाती हैं, जिससे प्लवक (प्लेंक्टान) की वृद्धि होती हैं, जो कि मछलियों का प्राकृतिक भोजन है। मछली-सह-सिंघाड़ा की खेती से जहां 1000-1200 किलोग्राम सिंघाड़ा प्राप्त होगा वहीं दूसरी ओर 1500 किलोग्राम मछली का उत्पादन होगा ।

व्यावसायिक तौर पर सिंघाड़े की खेती करने वाले किसान तालाब या कीचडय़ुक्त जलाशय में बीज डाल देते हैं। दो माह के अंदर सिंघाड़े के बेल तैयार हो जाती है। अक्टूबर से लेकर दिसंबर तक सिंघाड़े की बिक्री होती है। सिंघाड़े के बीज किसी नर्सरी में डालकर पौधे तैयार करते हैं। बरसात आने पर जुलाई में सिंघाड़े का पौधा रोपण 3-4 फिट गहरे पानी में तालाब के तल में करें। मछली का निष्कासन सिंघाड़े के फसल के बाद करें। परंपरागत खेती करने वाले किसान सिंघाड़े की खेती की कर अच्छी आय कर सकते हैं। इसमें कम लागत आती है। मछली पालन के साथ सिंघाड़े की खेती से दोहरा लाभ होता है। सिंघाड़ा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन-बी एवं सी, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस जैसे मिनरल्स, रायबोफ्लेबिन जैसे तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। सिंघाड़ा खाने से अस्थमा, बवासीर, फटी एडिय़ां, शरीर दर्द या सूजन, हड्डियां और दांत मजबूत, दस्त, रक्त संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए बहुत फायदेमंद है। सिंघाड़े में प्रोटीन, शर्करा, कैल्शियम, फास्फोरस, मैंगनीज, पोटेशियम, विटामिन सी, जिंक, कॉपर और आयरन उपलब्ध होते हैं।

सिंघाड़ा में कई औषधीय गुण हैं, जिनसे शुगर, अल्सर, हृदय रोग, गठिया जैसे रोगों से बचाव करता है। इसके अलावा थायरॉयड और घेंघा रोग, गले की खरास, टॉन्सिल, बाल झडऩे की समस्या, फटी एडिय़ों, बुखार और घबराहट में फायदेमंद होने के साथ वजन बढ़ाने में भी मददगार है। सिंघाड़ा अपने पोषक तत्वों के कारण बहुत पौष्टिक होता है। इसके बीज को सुखाकर और पीसकर बनाए गए आटे का सेवन किया जाता है। सिंघाड़ा, जिसे पानीफल भी कहते हैं की खेती तालाबों, नहरों पोखरों जैसी जलीय जगहों में होती है। सिंघाड़ा की खेती ऐसी जगह पर की जाती है जहां कम से कम 1-2 फीट पानी जमा हो। सिंघाड़े की खेती मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में होती है। मध्यप्रदेश में इसकी खेती लगभग 6000 हेक्टेयर में होती है।

उपयुक्त जलवायु

सिंघाड़े की खेती के लिए उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले जगह उत्तम होता है। सिंघाड़े की खेती के लिए खेत या तालाब में कम से कम लगभग 1-2 फीट पानी हो। इसकी खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी जिसका पीएच 6-7.5 हो अच्छा मानी जाता है।

किस्में

सिंघाड़े की जल्द पकने वाली जातियां लाल गठुआ, हरीरा गठुआ, लाल चिकनी गुलरी, कटीला किस्मों की पहली तुड़ाई रोपाई के 120-135 दिन में होती है। इसी प्रकार देर से पकने वाली जातियां करिया हरीरा, गुलरा हरीरा, गपाचा में पहली तुड़ाई 150-165 दिनों में होती है। खेती करने के लिए बिना कांटों वाले सिंघाड़े का चुनाव करें, ये ज्यादा उत्पादन देती है और इसकी गोटियों का आकार भी बड़ा होता है। इसकी तुड़ाई भी आसानी से की जा सकती है।

नर्सरी

सिंघाड़े की नर्सरी तैयार करने के लिए पहले की गयी खेती के स्वस्थ पके फलों का बीज जिसकी तुड़ाई दिसंबर में हुई है, उसे जनवरी तक (1 महीने तक) पानी में रखना है। फरवरी के दूसरे सप्ताह में इन बीजों को सुरक्षित जगह पर गहरे पानी में जैसे कि तालाबों, नहरों पोखर में डाल दे। मार्च महीने तक इसमें से बेल निकलने लगती है जो कि 1 महीने में 1.5 से 2 मीटर तक बढ़ जाती है।

फसल रोपाई

अप्रैल से जून के महीने तक इन बेलों में से 1-1 मीटर बेलों को ऐसे तालाब में रोपना है जिसमे खरपतवार न हो। रोपाई को सुरक्षित रखने के लिए तालाब में प्रति हेक्टेयर 300 किलो सुपर फास्फेट, 60 किलो पोटाश और 20 किलो यूरिया दें।

फसल तुड़ाई

जल्दी पकने वाले सिंघाड़े के प्रजातियों की पहली तुड़ाई अक्टूबर के शुरुआत में और अंतिम तुड़ाई दिसम्बर के अंत में होती है। इसी प्रकार देर से पकने वाले सिंघाड़े के प्रजातियों की पहली तुड़ाई नवम्बर के शुरुआत में और अंतिम तुड़ाई जनवरी के अंत में होती है। फसल तुड़ाई के समय यह ध्यान रखें कि सिर्फ पूर्ण रूप से पके फलों की ही तुड़ाई हो।

फलों को सुखाना

सिंघाड़े के फलों की गोटी बनाने के लिए उसे सुखाया जाता है। इसे लगभग 15-20 दिन तक पक्के खलिहान या पॉलीथिन में सुखायें और 2-4 दिन के अंतराल पर उलट-पलट भी कर दें जिससे फल अच्छे से सूख जायें।

कीट और रोग

सिंघाड़े की खेती में ज्यादातर सिंघाड़ा भृंग, नीला भृंग, माहू, घुन और लाल खजूरा नाम के कीट का खतरा होता है, जो फसल को 25-40 प्रतिशत तक कम कर देते है। इसके अलावा लोहिया और दहिया रोग का खतरा होता है। इससे बचाव के लिए हमें समय रहते कीटनाशक का इस्तेमाल कर लें।

मत्स्य बीज संचयन

मत्स्य बीज का संचयन प्रतिशत कतला, रोहू, मृगल 3:2:5 के अनुपात में करें। प्रति हेक्टेयर में 3500 मत्स्य अंगुलिकाएं (50-60 मि.मी. लम्बी) संचयन कर सकते हैं।

कृत्रिम आहार

मछलियों की बाढ़ के लिए कृत्रिम आहार के रूप में सरसों या मूंगफली की खली एवं चावल का कोडा 1:1 के अनुपात में मिलाकर मछलियों के वजन का 2 प्रतिशत दें।

फसल उत्पादन

chestnut

सिंघाड़ा की फसल अक्टूबर से जनवरी-फरवरी तक निकाल लें उसके बाद मछली का निष्कासन कर सकते हैं। सिंघाड़े के साथ मछलीपालन से सिंघाड़े का उत्पादन 1000 से 1200 किलोग्राम एवं 1500 किलोग्राम मत्स्य उत्पादन ले सकते हैं। प्रति हेक्टेयर 4400 सिंघाड़ा सीड्लिंग्स के बंडल (2 से 3 सीड्लिंग्स प्रति बंडल ), 15 से 20 ग्राम शरीर के वजन वाले मछली बीज (7,000-10,000) प्राप्त होते हैं। प्रति हेक्टेयर भूमि से 25-30 टन सिंघाड़े की पैदावार होती है।

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