संतुलित पशु आहार एवं इसकी उपयोगिता

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  • डॉ. अशोक कुमार पाटिल , डॉ. लक्ष्मी चौहान
    पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, महू
    ashokdrpatil@gmail.com

 

15 फरवरी 2022,  संतुलित पशु आहार एवं इसकी उपयोगिता – हमारे प्राचीन काल से एक कहावत चली आ रही है की जैसा खाए अन्न वैसा होय तन ओर मन, अर्थात हमारे शरीर की वृद्धि व बनावट में खान पान का विशेष महत्त्व है। यही सिद्धांत पशुओ पर भी लागू होता है परन्तु हम जानते है की पशुओं का जीवन अधिकतर वनस्पति जगत पर ही निर्भर करता हैं। ओर हम यह भी जानते है की वनस्पतियों से प्राप्त भोजन में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों की कमी होती है जिसके कारण पशुओ की शारीरिक वृद्धि तथा उत्पादन घटता है, इसलिए पशुओं को उनकी अवश्यकताओ की पूर्ति करते हुए खिलाना एक महत्वपूर्ण कला हैं। जो कि पशुपालकों के प्रयोगात्मक अनुभवनों के साथ-साथ विकसित होती आई है। वैज्ञानिक ढंग से पशुओं को खिलाने का तरीका बहुत समय से चला आ रहा है। पशु का आहार ऐसे पौष्टिक तत्वों से बना होना चाहिए जिससे उसकी अवश्यकतानुसार सभी पौष्टिक तत्व मिल सकें। चूंकि यह सभी तत्व उसे एक ही चारे में नहीं मिल सकते है। अत: पशु को विभिन्न प्रकार के आहारों पर निर्भर रहना पड़ता है।

पशु को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 24 घंटे में जितना चारा व दाना दिया जाता है, वह मात्रा राशन (आहार) कहलाती है। पशु को उसके शरीर भार के अनुसार, उसके जीवित रहने के लिए जीवन निर्वाह आहार, वृद्धि, उत्पादन व कार्य के लिए वर्धक आहार की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार उस भोजन सामग्री को कहते हैं जो किसी विशेष पशु की 24 घंटे की निर्धारित पौषाणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। संतुलित राशन में कार्बन, वसा और प्रोटीन के आपसी विशेष अनुपात के लिए कहा गया है। संतुलित आहार चारे व दाने का ऐसा मिश्रण होता हैं जिसमें पशु को स्वस्थ रखने, वृद्धि, उत्पादन या कार्य करने के लिये विभिन्न पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, वसा कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण एवं विटामिन आदि एक निश्चित मात्रा एवं निश्चित अनुपात में उपलब्ध होते हैं। संतुलित आहार में निम्न लिखित विशेष लक्षण होना चाहिये।

  • आहार स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो।
  • आहार स्वच्छ, पौष्टिक एवं सस्ता हो। यह विषैला, सड़ा-गला, दुर्गंध युक्त व अखाद्य पदार्थो से मुक्त हो।
  • आहार आसानी से उपलब्ध, स्थानीय आहार अवयवों के उपयोग से बनाया जाना चाहिए ताकि सस्ता भी हो।
  • चारा भली-भांति तैयार किया जाये। जिससे वह आसानी से पचने व रूचिकर बन सके। सख्त दाने जैसे-जौ, मक्का इत्यादि को चक्की से दलिया के रूप में दलवा लें।
  • चारे व दाने का प्रकार अचानक बदलना नहीं चाहिये। चारे में धीरे-धीरे बदलाव लाना चाहिए, ताकि पशु की भोजन प्रणाली पर कुप्रभाव न पड़े।
  • गाय एवं भैंसों में शुष्क पदार्थ की खपत प्रतिदिन 2.5 से 3.0 किलोग्राम प्रति 100 किलोग्राम शरीर भार के अनुसार होती है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 400 किलोग्राम वजन की गाय एवं भैंस को रोजाना 10-12 किलोग्राम शुष्क पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है। इस शुष्क पदार्थ को हम चारे और दाने में विभाजित करें तो शुष्क पदार्थ का लगभग एक तिहाई हिस्सा दाने के रूप में खिलायें।
  • पशुओं में आहार की मात्रा उसकी उत्पादकता तथा प्रजनन की अवस्था पर निर्भर करती है। पशु को कुल आहार का 2/3 भाग मोटे चारे से तथा 1/3 भाग दाने के मिश्रण द्वारा मिलायें। मोटे चारे में दलहनी तथा गैर दलहनी चारे का मिश्रण दिया जा सकता है। दलहनी चारे की मात्रा आहार में बढऩे से काफी हद तक दाने की मात्रा को कम किया जा सकता है।
  • खाने में सूखा चारा, हरा चारा, और पशु आहार को शामिल करें ताकि सभी पोषक तत्व सही मात्रा में मिल सके। हरा चारे की पाचनशीलता सूखे चारे से अच्छी होती है एवं पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। हरा चारा दूध का उत्पादन बढ़ाता है। इसमें सूडान घास, बाजरा, ज्वार, मकचरी, जई और बरसीम आदि शामिल हैं। पशुपालकों को चाहिए कि वो हरे चारे में दलिया या दलहनी दोनों तरह के चारे शामिल करें। इससे पशुओं में प्रोटीन की कमी बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है।
  • यदि पशु आहार में हरा चारा शामिल है तो पौष्टिक मिश्रण में 10-12 प्रतिशत पाचक प्रोटीन हो। इसके विपरीत यदि हरा चारा नहीं है तो दाने में इसकी मात्रा कम से कम 18 प्रतिशत हो।
  • पशुओं को प्रति 100 कि.ग्रा. शरीर भार पर 8-10 ग्राम खाने का नमक प्रतिदिन दें। इसके अतिरिक्त 2 प्रतिशत खनिज मिश्रण आहार में मिला कर दें।
  • चारा खिलाने की नांद पूर्णत: स्वच्छ हो। उसमें नया चारा व दाना डालने से पूर्व बची हुई जूठन को बाहर निकाल दें।
  • संतुलित आहार न खिलाने पर पशुओं को होने वाली हानियां
  • बछड़े व बछियों की वृद्धि दर कम हो जाती है, जिसके उनकी परिपक्वता में देरी होती है।
  • कार्य हेतु जाने वाले पशुओं की कार्यक्षमता कम हो जाती है।
  • संतुलित आहार के अभाव में पशुओं में कमजोरी आने से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
  • सांडों में कम उत्तेजना, शुक्राणुओं में निष्क्रियता, गायों में गर्मी में न आना व गर्भधारण में देरी संतुलित आहार के आभाव में उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे पशुओं के गर्भधारण करने पर बछड़ा अस्वस्थ व कमजोर होता हैं तथा कभी-कभी गर्भपात की संभावना भी प्रबल रहती है। संतुलित आहार के आभाव में पशुओं में दुग्ध उत्पादन दिन प्रतिदिन कम होता जाता है जो आर्थिक दृष्टि से अति आवश्यक महत्वपूर्ण है।
  • पशुओं के आहार में संतुलित दाना कितना खिलायें
  • वैसे तो पशु के आहार की मात्रा का निर्धारण उसके शरीर की आवश्यकता व कार्य के अनुरूप तथा उपलब्ध भोज्य पदार्थों में पाए जाने वाले पोषक तत्वों के आधार पर गणना करके किया जाता है लेकिन पशुपालकों को गणना कार्य की कठिनाई से बचाने के लिए थम्ब रुल को अपनाना अधिक सुविधा जनक है। इसके अनुसार हम मोटे तौर पर व्यस्क दुधारू पशु के आहार को निम्न वर्गों में बांट सकते हैं-
  • जीवन निर्वाह के लिए – यह आहार की वह मात्रा है जो पशु को अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दिया जाता है। इसे पशु अपने शरीर के तापमान को उचित सीमा में बनाए रखने, शरीर की आवश्यक क्रियायें जैसे पाचन क्रिया, रक्त परिवाहन, श्वसन, उत्सर्जन, चयापचय आदि के लिए काम में लाता है। इससे उसके शरीर का वजन भी एक सीमा में स्थिर बना रहता है। चाहे पशु किसी भी अवस्था में हो उसे यह आहार की उचित मात्रा देना ही पड़ता है इसके आभाव में पशु कमजोर होने लगता है जिसका असर उसकी उत्पादकता तथा प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। गाय के लिए इसकी मात्रा 1.5 किलो प्रतिदिन व भैंस के लिए 2 किलो प्रतिदिन होती है।
  • उत्पादन के लिए आहार- उत्पादन आहार पशु की वह मात्रा है जिसे कि पशु को जीवन निर्वाह के लिए दिए जाने वाले आहार के अतिरिक्त उसके दूध उत्पादन के लिए दिया जाता है। जीवन निर्वाह के अतिरिक्त गाय को प्रत्येक 2.5 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना तथा भैंस को प्रत्येक 2 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना दें। यदि हर चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है तो हर 10 किलो अच्छे किस्म के हरे चारे को देकर 1 किलो दाना कम किया जा सकता है। इससे पशु आहार की कीमत कुछ कम हो जाएगी और उत्पादन भी ठीक बना रहेगा। पशु को दुग्ध उत्पादन तथा आजीवन निर्वाह के लिए साफ पानी दिन में कम से कम तीन बार जरूर पिलायें।
  • गर्भवस्था के लिए आहार-पशु की गर्भवस्था में उसे 5वें महीने से अतिरिक्त आहार दिया जाता है क्योंकि इस अवधि के बाद गर्भ में पल रहे बच्चे की वृद्धि बहुत तेजी के साथ होने लगती है। अत: गर्भ में पल रहे बच्चे की उचित वृद्धि व विकास के लिए तथा गाय/भैंस के अगले ब्यांत में सही दुग्ध उत्पादन के लिए इस आहार का देना नितान्त आवश्यक है। 5 महीने से ऊपर की गाभिन गाय या भैंस को 1 से 1.5 किलो दाना प्रतिदिन जीवन निर्वाह के अतिरिक्त दें।\
  • बछड़े या बछडिय़ों के लिए- 1 किलो से 2.5 किलो तक दाना प्रतिदिन उनकी उम्र या वजन के अनुसार दें।
    द्य बैलों के लिए: खेतों में काम करने वाले बैलों के लिए 2 से 2.5 किलो प्रतिदिन, बिना काम करने वाले बैलों के लिए 1 किलो प्रतिदिन।
  • गाय या भैंस का संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें
  • पशुओं के दाना मिश्रण में काम आने वाले पदार्थों का नाम जान लेना ही काफी नही है। क्योंकि यह ज्ञान पशुओं का राशन परिकलन करने के लिए काफी नही है। एक पशुपालक को इस से प्राप्त होने वाले पाचक तत्वों जैसे कच्ची प्रोटीन, कुल पाचक तत्व और चयापचयी उर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी भोज्य में पाये जाने वाले तत्वों के आधार पर संतुलित दाना मिश्रण बनाने में सहसयता मिल सकेगी। नीचे लिखे गये किसी भी एक तरीके से यह दाना मिश्रण बनाया जा सकता है, परन्तु यह इस पर भी निर्भर करता है कि कौन सी चीज सस्ती व आसानी से उपलब्ध है।

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