Ad DesktopAd TabletAd Mobile
पशुपालन (Animal Husbandry)

पशुओं में मुंहपका खुरपका रोग के लक्षण तथा बचाव

पशुओं में मुंहपका – खुरपका रोग विभक्त खुर वाले पशुओं का अत्यन्त संक्रामक एवं घातक विषाणुजनित रोग है। यह गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, सुअर आदि पालतू पशुओं एवं हिरन आदि जंगली पशुओं को होता है।

कारण –

यह रोग पशुओं को एक बहुत ही छोटे आंख से न दिख पाने वाले कीड़े द्वारा होता है। जिसे विषाणु या वायरस कहते हैं। मुंहपका-खुरपका रोग किसी भी उम्र की गायें एवं उनके बच्चों में हो सकता है। इसके लिए कोई भी मौसम निश्चित नहीं है। कहने का मतलब यह है कि यह रोग कभी भी गांव में फैल सकता है। हालांकि गाय में इस रोग से मौत तो नहीं होती फिर भी दुधारू पशु सूख जाते हैं। इस रोग का क्योंकि कोई इलाज नहीं है इसलिए रोग होने से पहले ही उसके टीके लगवा लेना फायदेमन्द है।

संक्रमण विधि –

यह रोग बीमार पशु के सीधे संपर्क में आने, पानी, घास, दाना, बर्तन, दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथों से हवा से तथा लोगों के आवागमन से फैलता है। रोग के विषाणु बीमार पशुओं की लार, मुंह, खुर थनों में पड़े फफोले में बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं। यह खुले में घास चारा तथा फर्श पर चार महीनों तक जीवित रह सकते हैं लेकिन गर्मी के मौसम में यह बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं विषाणु जीवाणु जीभ, मुंह, आंत, खुरों के बीच की जगह थनों तथा घाव आदी के द्वारा स्वस्थ पशु के रक्त में पहुंचते हैं तथा 5 दिनों के अंदर उसने बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

लक्षण –

इस रोग के आने पर पशु को तेज बुखार हो जाता है। बीमार पशु के मुंह, मसूड़े, जीभ के ऊपर नीचे ओंठ के अन्दर का भाग खुरों के बीच की जगह पर छोटे-छोटे दाने से उभर आते हैं, फिर धीरे-धीरे ये दाने आपस में मिलकर बड़ा छाला बनाते हैं। समय पाकर यह छाले फैल जाते हैं और उनमें जख्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में पशु जुगाली करना बंद कर देता है। मुंह से तमाम लार गिरती है। पशु सुस्त पड़ जाते है। कुछ भी नहीं खाता-पीता है। खुर में जख्म होने की वजह से पशु लंगड़ाकर चलता है। पैरों के जख्मों में जब कीचड़ मिट्टी आदि लगती है तो उनमें कीड़े पड़ जाते हैं और उनमें बहुत दर्द होता है। पशु लंगड़ाने लगता है। दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन एकदम गिर जाता है। वे कमजोर होने लगते हैं। समय पाकर व इलाज होने पर यह छाले व जख्म भर जाते हैं परन्तु संकर पशुओं में यह रोग कभी-कभी मौत का कारण भी बन सकता है। यह एक विषाणु जनित बीमारी है जो फटे खुर वाले पशुओं को ग्रसित करती है। इसकी चपेट में सामान्यत: गो जाति, भैंस जाति, भेड़, बकरी एवं सूकर जाति के पशु आते हैं। यह छूत की बीमारी है।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

मुख्य लक्षण –

प्रभावित होने वाले पैर को झाडऩा (पटकना) पैरो में सूजन (खुर के आस-पास) लंगड़ाना अल्प अवधि (एक से दो दिन) का बुखार खुर में घाव होना एवं घावों में कीड़ा हो जाना, कभी-कभी खुर का पैर से अलग हो जाना, मुँह से लार गिरना, जीभ, मसूड़े, ओष्ट आदि पर छाले पड़ जाते हैं, जो बाद में फूटकर मिल जाते हैं उत्पादन क्षमता में अत्यधिक ह्रास बैलों की कार्यक्षमता में कमी प्रभावित, पशु स्वस्थ होने के उपरान्त भी महीनों हांफते रहते हंै।

रोग के बचाव व उपचार –

रोगग्रस्त पशु के पैर को नीम एवं पीपल के छाले का काढ़ा बनाकर दिन में दो से तीन बार धोना चाहिए।

  • प्रभावित पैरों को फिनाइलयुक्त पानी से दिन में दो-तीन बार धोकर मक्खी को दूर रखने वाली मलहम का प्रयोग करना चाहिए।
  • मुँह के छाले को 1 प्रतिशत फिटकरी अर्थात 1 ग्राम फिटकरी 100 मिली लीटर पानी में घोलकर दिन में तीन बार धोना चाहिए। इस दौरान पशुओं को मुलायम एवं सुपाच्य भोजन दिया जाना चाहिए।
  • पशु चिकित्सक के परामर्श पर दवा देें।

सावधानी –

  • प्रभावित पशु को साफ एवं हवादार स्थान पर अन्य स्वस्थ पशुओं से दूर रखें।
  • पशुओं की देखरेख करने वाले व्यक्ति को भी हाथ-पांव अच्छी तरह साफ कर ही दूसरे पशुओं के संपर्क में जाना चाहिए।
  • प्रभावित पशु के मुँह से गिरने वाले लार एवं पैर के घाव के संसर्ग में आने वाले वस्तुओं पुआल, भूसा, घास आदि को जला देना चाहिए या जमीन में गड्ढा खोदकर चूना के साथ गाड़ दिया जाना चाहिए।
  • इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को पोलीवेंट वैक्सीन के वर्ष में दो बार टीके अवश्य लगवाने चाहिए।
  • बीमार हो जाने पर रोगग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए।
  • बीमार पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहना चाहिए बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा देना चाहिए। द्य पशु शाला को साफ – सुथरा रखें
  • इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला नहीं छोड़ कर काट देना चाहिए।

  • नीलू कुमारी
  • सोहन लाल काजलाemail : neelu.kumari7891@gmail.com