सब्जियों की पौध तैयार करने हेतु

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प्रो – ट्रे तकनीक

सब्जियों के विपुल उत्पादन हेतु पहले उनकी पौध तैयार की जाती है। उत्पादित पौध की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह रोग रहित और सही समय पर तैयार कर ली गई है। बढिय़ा किस्म की पौध प्राप्त करने एवं जगह की बचत हेतु प्रो-ट्रे का प्रयोग काफी प्रचलन में है। इस तकनीक द्वारा सब्जियों की पौध को तैयार करने के लिए प्लास्टिक की खानेदार ट्रे का प्रयोग करते हैं। ट्रे के खाने शंकू आकार के होते हैं जिससे की जड़ों का समुचित विकास होता है।
संकर बीजों के महंगा होने के कारण स्वस्थ रोग व कीट रहित पौध प्राप्त करने हेतु पौध की प्रो-ट्रे तथा कीट अवरोधी नेट हाऊस या पॉली हाऊस या ग्रीन हाऊस में पौध तैयार करना चाहिए। टमाटर, बैंगन व समस्त बेल वाली सब्जियों के लिये 1.5-2.0 वर्ग इंच आकार के खाने वाली ट्रे का प्रयोग होता है जबकि शिमला मिर्च, मिर्च, फूलगोभी वर्ग की सभी फसलों को 1.0-1.5 वर्ग इंच आकार के खाने वाली ट्रे उपयुक्त रहती है।
इस विधि में पौध को भू रहित माध्यम में उगाया जाता है। यह माध्यम कोकोपीट, वर्मीकुलाइट व परलाइट को 3:1:1 के अनुपात में मिलाकर बनाया जाता है। भू-रहित माध्यम को पानी मिलाकर गीला करने के बाद ट्रे के खानों में भरा जाता है तथा बाद में ऊंगली से हल्के गड्ढे बनाकर प्रत्येक खाने में एक बीज बोया जाता है। बीज बोने के बाद वर्मीकुलाईट की पतली परत से ढक दिया जाता है ताकि बीजों को अंकुरण के समय समुचित नमी मिलती रहे। वर्मीकुलाईट में नमी को अधिक समय तक बनाए रखने की क्षमता होती है।
अंकुरण के एक सप्ताह बाद सिंचाई जल के साथ 5 ग्राम प्रति लीटर की मात्रा से 20:20:20 या 19:19:19 का घोल पौध पर छिड़काव करें। यह पौध में पोषक तत्वों की पूर्ति के लिये अति आवश्यक है। इसका प्रयोग हम 15 दिन के अंतराल पर दुबारा कर सकते हैं। प्रो – ट्रे में पर्याप्त नमी बनाए रखना अति आवश्यक है।
पौधों को तैयार होने पर ट्रे में बने खानों से बाहर निकाला जाता है। इसमें माध्यम के गुच्छे के चारों और जड़ों का सघन फैलाव सफेद धागों जैसा साफ दिखाई देता है। रोपाई से दो-तीन पूर्व पौध पर फफूंदनाशक एक कीटनाशक का छिड़काव अवश्य करें। सामान्य तापक्रम होने पर रोपाई का कार्य सुबह या दोपहर में किसी भी समय किया जा सकता है। परंतु अधिक तापमान होने पर रोपाई का कार्य सायंकाल में ही किया जाना चाहिए।
रस चूसक कीट प्रबंधन –
सामान्यत: सब्जियों की पौध में रस चूसक कीटों का प्रकोप पौधशाला में अधिक होता है एवं यहीं से पौध विषाणु – जन्य चूरडा रोग का संक्रमण लेकर मुख्य खेतों में स्थानांतरित होती है। पौधशाला में प्रो – ट्रे को यदि पॉलीहाऊस में रखें तो प्रारंभिक संक्रमण से बचा जा सकता है? पॉलीहाऊस की उपलब्धता नहीं होने पर 3 मी. लंबाई, 1 मी. चौड़ाई एवं 1 मी. ऊंचाई में सामान्य मच्छरदानी को सिलवाकर अस्थाई रूप से पॉलीहाऊस के रूप में उपयोग में लाकर, रस चूसक कीटों के प्रारंभिक प्रकोप को रोककर, चूरडा रोग से बचा जा सकता है।
पौधशाला में पौध उपचार –
तैयार पौध को रोपणी से उखाड़कर मुख्य खेत में स्थानांतरित करने से पहले दैहिक कीटनाशक इमिडाक्लोप्रिड (0.5 मि.ली./ लीटर पानी) के साथ स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (1 ग्राम/3 लीटर पानी) के घोल से सघन छिड़काव एवं सिंचन पौध स्थानांतरण के 1-2 दिन पूर्व करें। तत्पश्चात पौध को नियत स्थान पर लगाएं।

 

 

 

 

प्रो – ट्रे तकनीक द्वारा पौध तैयार करने के लाभ –

  • इस प्रकार पौध को कम समय में तैयार किया जा सकता है।
  • बीज की मात्रा काफी कम लगती है क्योंकि इस विधि द्वारा प्रत्येक बीज को अलग-अलग खाने में बोया जाता है जिससे प्रत्येक बीज स्वस्थ पौध देता है।
  • पौध को समस्त प्रकार के भू-जनित रोगों व कीटाणुओं से बचाया जा सकता है।
  • जब पौध क्यारियों में तैयार की जाती है तो उखाड़ते समय जड़ आदि टूटने से पौधों की मरण क्षमता लगभग 10-15 प्रतिशत रहती है। लेकिन इस तकनीक से पौधे मरने की संभावना नहीं रहती है।
  • इस प्रकार तैयार पौध मुख्य खेत में रोपाई के बाद बहुत कम समय में स्थापित हो जाती है।
  • इस तकनीक के साथ संरक्षित संरचनाओं का प्रयोग करके किसी भी सब्जी फसल की पौध कभी भी तैयार किया जा सकता है।
  • इस प्रकार तैयार पौध को सही प्रकार से पैकिंग के बाद काफी दूर तक भेजा जा सकता है।
  • इस विधि में कम खाद व पानी की आवश्यकता होती है।
  • इस विधि में पौध की बढ़वार एक समान होती है ताकि मुख्य खेत में रोपाई के बाद भी फसल की बढ़वार एक समान हो।
  • इस तकनीक से महंगे संकर बीज का अधिक कुशल उपयोग किया जा सकता है।
  • रिया ठाकुर
  • डॉ. विजय कुमार वर्मा
  • आर.डी. बारपेटे
    ईमेल : kvkbetul@rediffmail.com 
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