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राज्य कृषि समाचार (State News)

जैविक कीट एवं रोग नाशक उपयोग : एक पर्यावरण हितैषी उपाय

आधुनिक कृषि में रोगों एवं कीटों के द्वारा फसलों को भारी आर्थिक क्षति (25 प्रतिशत तक) पहुंचाती है। आँकड़ों के अनुसार खरपतवार से 33 प्रतिशत, रोगों से 26 प्रतिशत, कीटों से 20 प्रतिशत, भंडारण के दौरान 7 प्रतिशत, चूहों से 6 प्रतिशत एवं अन्य कारणों से 8 प्रतिशत नुकसान होता है।

कृषक इस नुकसान को रोकने के लिये रसायनिक कीट/रोगनाशकों का उपयोग करते हैं। हालांकि मध्य प्रदेश में कृषि रसायनों की औसत खपत राष्ट्रीय स्तर, (288 ग्राम/हे.) से कम है परंतु कृषि रासायनों के लगातार बढ़ते उपयोग से जहॉँ भूमि की उर्वराशक्ति कम होती जा रही है वहीं ये कृषि रसायन न केवल मनुष्य एवं अन्य स्तनधारियों के लिये हानिकारक हैं बल्कि ये जल, वायु एवं मृदा को प्रदूषित कर रहे हैं तथा कीट एवं रोगजनकों में इनके प्रति प्रतिरोधिता विकसित हो रही है जिससे कीट एवं रोगजनक भविष्य के लिये एक गम्भीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व का प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 26 मिलीग्राम कृषि रासायनों का सेवन प्रतिदिन कर रहा है अत: उपरोक्त समस्याओं के एक मात्र विकल्प के रूप में जैव रोग/कीट नाशक सम्पूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है। जैव कीट एवं रोगनाशक जहां अपना दीर्घकालिक प्रभाव रखते हैं। ये कीटों, फफूंद, विषाणु एवं जीवाणु आधारित होते हैं। जो फसलों को कीट व्याधियों से बचाकर उत्पादन वृद्धि में सहयोग करते हैं तथा मृदा में शीघ्र विघटित हो जाते हैं। जिससे इनका कोई अवशिष्ट अवशेष नहीं रह जाता है। जिसके कारण ये पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित होते हैं। कम लागत वाले एवं स्तनधारियों के लिये भी सुरक्षित होते हैं।

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बीजोपचार हेतु जैव अभिकर्ता का प्रयोग बुवाई के कुछ समय पहले बीजों पर किया जाता है, बीजों को सुविधाजनक बर्तन में रखकर ऊपर से हल्का पानी का छिड़काव करते हैं। उसके बाद जैव अभिकर्ता के पाउडर को छिड़ककर तब तक हिलाते हैं। जब तक जैव अभिकर्ता की परत अच्छी तरह बीज के ऊपर चढ़ न जाय तथा छाया में सुखाकर बीज को बुवाई हेतु उपयोग करते हैं। इसके अतिरितक्त जैव अभिकर्ता का प्रयोग घोल बनाकर भी किया जाता है। इस विधि में जैव अभिकर्ता को पानी में घोलकर बीज एवं पौधों की जड़ों को आधे घंटे तक डुबोकर रखा जाता है। उसके उपरांत बीज अथवा पौधे की बुवाई/रोपाई कर देते हैं।

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जैव कीट एवं रोग नाशक से लाभ

  • जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण ये भूमि में कोई अवशेष अंश नहीं छोड़ते।
  • ये केवल लक्षित कीटों एवं बीमारियों को मारते हैं। मित्र कीटों को कोई हानि नहीं पहुुँचाते।
  • जैविक कीट एवं रोगनाशक के प्रति कीटों एवं रोग जनकों में प्रतिरोधिता नहीं विकसित होती हैं।
  • इनके प्रयोग से कीटों के जैविक स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है जबकि रसायनिक कीट नाशक के प्रयोग से कीटों के जैविक स्वभाव में परिवर्तन होता है।
  • जैव कीट एवं रोग नाशक सुरक्षित, हानिरहित तथा पारिस्थितकीय मित्र होने के कारण इनके प्रयोग से उत्पादित खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, सब्जियों एवं फलों का मूल्य अधिक मिलता है।
  • पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने में सहायक होते हैं।
  • इनका प्रभाव दीर्घकालिक होता है।