Ad DesktopAd TabletAd Mobile
राज्य कृषि समाचार (State News)

क्या इथेनॉल से बदलेगी किसानों की आर्थिक दशा

10 सितम्बर 2024, भोपाल: क्या इथेनॉल से बदलेगी किसानों की आर्थिक दशा – केंद्र सरकार ने गन्ने से इथेनॉल बनाने के लिए 15 दिसंबर 2023 को इथेनॉल बनाने वाली डिस्टलरीजों पर लगाई गई रोक हटाकर रास्ता साफ कर दिया है। सरकार ने चीनी मिलों और डिस्टलरीजों को गने के रस, शीरा और गन्ने के अन्य उत्पादों से इथेनॉल बनाने की अनुमति दे दी है। यह अनुमति वर्ष 2024-25 के लिए ही है। इससे गन्ना उत्पादक किसानों को गन्ने का उचित मूल्य मिलने की संभावना है। सरकार ने चीनी उत्पादन में कमी की आशंका के मद्देनजर गने के उत्पादों से इथेनॉल बनाने पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2023-24 में चीनी का उत्पादन करीब 330 लाख टन होने का अनुमान लगाया गया है जो घरेलु आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त है। इससे गन्ने के उत्पादों का इथेनॉल बनाने के लिए उपयोग करने से चीनी की घरेलू बाजार में कोई कमी नहीं आएगी। केंद्र सरकार का यह फैसला गन्ना उत्पादक किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

केंद्रीय उपभोक्ता मामलों और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार इथेनॉल का उत्पादन करने वाली डिस्टलरीजों को भारतीय खाद्य निगम से इथेनॉल बनाने के लिए 23 लाख टन चावल खरीदने की भी अनुमति दे दी गई है। इस समय धान भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक मूल्य पर बिक रही है इसलिए सरकार का यह फैसला किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है। सरकार ने मक्का से भी इथेनॉल बनाने के लिए इथेनॉल उद्योगी के जलग्रहण क्षेत्र में मक्का उत्पादन बढ़ोतरी’ नामक परियोजना शुरू की है। मक्का का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने ‘भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान’ को जिम्मेदारी सौंपी है। भारत में पूरी दुनिया का मात्र दो फीसदी मक्का का उत्पादन होता है जिसमें से करीब आधा मक्के का उपयोग मुर्गी मुर्गियों के लिए खाद्य पदार्थ (पोल्ट्री फूड बनाने में हो जाता है। हाल ही में केंद्रीय पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री हरदीप पूरी ने बताया कि डीजल और पैट्रोल में वर्तमान में 15 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जा रहा है। इससे करीब 99 हजार करोड़ रुपए की बचत हुई है। पिछले एक दशक में इथेनॉल बनाने वाले डिस्टलरीज को 1.45 ट्रिलियन रुपए और किसानों को 87558 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। उन्होंने बताया कि अगले 1 वर्ष के भीतर पैट्रोल और डीजल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस लक्ष्य को समय सीमा में ही हासिल कर लिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अधिक इथेनॉल की आवश्यकता होगी इसलिये इथेनॉल के उत्पादन के लिये उपयोग में लाये जाने वाले कच्चे माल यानी मन्त्रा, वाचल और मक्का की भी अधिक माग होगी और इनकी आपूर्ति किसानों से ही सम्भव है।

गन्ने के उत्पादों और चावल व मक्ला से इथेनॉल बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लिए ये महत्वपूर्ण फैसले गन्ना, धान और मक्का उत्पादक किसानों के हित में है। इस साल खरीफ 2024 के मौसम में धान के रकबे में भी 15 लाख हेक्टेयर से अधिक की वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष 2023 में 393.57 लाख हेक्टेयर में धान की बोवनी की गई थी जबकि इस वर्ष 2024 में अभी तक 408.72 लाख हेक्टेयर में बोवनी हो चुकी है। इससे उम्मीद है कि धान का उत्पादन भी बढ़ेगा जिससे घरेलू खपत और इथेनॉल के उत्पादन के लिए कभी नहीं आयेगी। इससे किसानों को निश्चित ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम नहीं मिलेंगे। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों में बताया गया है कि इस वर्ष गन्ने के रकबे में भी आंशिक वृद्धि हुई है। जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि चीनी के साथ इथेनॉल के उत्पादन के लिए गना की कमी नहीं होगी और गन्ना उत्पादक किसानों को भी लाभ मिलेगा। इसी तरह मक्का के रकबे में भी करीब 6 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इथेनॉल बनाने के काम में आने वाली फसलों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम नहीं होने दे। इसके साथ ही पेट्रोल डीजल के आयात पर होने वाले खर्च की बचत का कुछ भाग किसानों को भी लाभांश के रूप में वितरित करें तो मक्का, धान और गन्ना उत्पादक किसान इन फसलों की और खेती करने के लिए प्रेरित होंगे। लेकिन इसका एक बड़ा यह भी खतरा है कि कहीं मक्का, धान और गत्रा का रकथा बढ़ाने के चक्कर में अन्य जरूरी खाद्यात्र की फसलों का रकबा कम न हो जाये। इसलिये सरकार, डिस्टलरीज और किसान संगठनों के प्रतिनिधि मिलकर एक ऐसी नीति तैयार करें जिससे इथेनॉल के उत्पादन में काम आने वाली और खाद्यात्र की फसलों का संतुलन बना रहे ताकि देश में खाद्यात्र की कमी न हो और किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो। एक बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि अधिक उत्पादन होने पर आमतौर पर कीमतें कम हो जाती हैं। इस बात को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। डिस्टलरीज अपने ताभ का कुछ हिस्सा किसानों को लाभांश के रूप में वितरित कर दे तो यह एक समझदारी भरा कदम होगा। इससे किसानों में असंतोष जैसी स्थिति निर्मित नहीं होगी और पैट्रोलियम पदार्थों के आयात पर होने वाले खर्व को काफी कम किया जा सकेगा जिससे अंततः देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

(नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़,  टेलीग्राम, व्हाट्सएप्प)

(कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें)

कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

www.krishakjagat.org/kj_epaper/

कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

www.global-agriculture.com