राज्य कृषि समाचार (State News)

गेहूं कटाई के बाद पराली जलाना पड़ेगा महंगा? सरकार ने बनाई नई नीति

06 अप्रैल 2025, भोपाल: गेहूं कटाई के बाद पराली जलाना पड़ेगा महंगा? सरकार ने बनाई नई नीति – मध्यप्रदेश में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस ली है। बुधवार को भोपाल में प्रमुख सचिव (पर्यावरण) डॉ. नवनीत मोहन कोठारी की अध्यक्षता में एक अहम बैठक हुई, जिसमें राज्य और जिला स्तर पर समेकित कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा हुई। इस बैठक में कृषि, उद्योग, शिक्षा, राजस्व, उद्यानिकी जैसे कई विभागों के साथ मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी शामिल रहे।

बैठक का मकसद धान और गेहूं की कटाई के बाद पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण और इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों को कम करना था। डॉ. कोठारी ने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं को रोकने और वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कृषि विभाग को निर्देश दिया कि गेहूं की कटाई में इस्तेमाल होने वाली मशीनों में रिपर या बेलर लगाना अनिवार्य किया जाए। साथ ही, पराली के वैकल्पिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए ताप विद्युत संयंत्रों के अधिकारियों के साथ बैठक करने की बात कही गई, ताकि कृषि अवशेषों को जलाने की बजाय दूसरी जगह उपयोग किया जा सके।

डॉ. कोठारी ने यह भी पूछा कि पिछले सालों में कितने कृषि अवशेषों का निपटारा हुआ और इस साल के लिए क्या योजना है। इसके अलावा, उन्होंने सभी विभागों से कहा कि किसानों को पराली जलाने के नुकसान, इसके विकल्प और सरकार की ओर से दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि की जानकारी सोशल मीडिया, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और स्थानीय केबल नेटवर्क के जरिए गांवों तक पहुंचाई जाए।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव ने बताया कि बोर्ड ने नासा के FIRMS पोर्टल के जरिए सैटेलाइट डेटा से आग लगने की घटनाओं का ब्योरा तैयार किया है। इसमें प्रदेश के प्रमुख जिलों में आग की घटनाओं की संख्या और उनके लोकेशन की जानकारी शामिल है। यह डेटा रोजाना जिला कलेक्टरों और संबंधित अधिकारियों को व्हाट्सऐप पर भेजा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए 4 मोबाइल मॉनिटरिंग वैन तैयार हैं। साथ ही, जिन शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 100 से ज्यादा है, वहां 39 नए सतत मापन केंद्र लगाने का प्रस्ताव है।

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हालांकि, बैठक में ठोस समयसीमा या पराली जलाने की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के लिए कोई सख्त कदमों का ऐलान नहीं हुआ। अब देखना यह है कि ये कार्ययोजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर कितनी कारगर साबित होती हैं।

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