उत्तराखंड: बंजर पहाड़ी जमीन पर सेब-कीवी बागवानी से शिक्षक को मिल रही अच्छी अतिरिक्त आमदनी
22 अक्टूबर 2026, पौड़ी गढ़वाल, (उत्तराखंड): उत्तराखंड: बंजर पहाड़ी जमीन पर सेब-कीवी बागवानी से शिक्षक को मिल रही अच्छी अतिरिक्त आमदनी – जिले के थलीसैंण ब्लॉक के सुकई (बंज्वाड़) गांव में रहने वाले रसायन विज्ञान प्रवक्ता दीनदयाल बिष्ट ने कोरोना काल के दौरान अपने गांव की बंजर पड़ी जमीन पर वैज्ञानिक तरीके से सेब और कीवी की बागवानी शुरू की थी। आज यह बाग उनके परिवार के लिए खेती से होने वाली अतिरिक्त आमदनी का एक भरोसेमंद जरिया बन गया है।
दीनदयाल राइंका बैजरो में पढ़ाते हैं। लॉकडाउन के दौरान जब वे गांव में थे, तो उन्होंने तय किया कि खाली पड़ी पहाड़ी जमीन का इस्तेमाल बागवानी के लिए किया जाए। इसके लिए उन्होंने मनरेगा योजना के साथ-साथ उद्यान और कृषि विभाग की मदद ली। खेत की घेरबाड़ की गई, पानी जमा करने के लिए जियोटैंक बनाया गया और बाग तक पानी पहुंचाने के लिए हाइड्रो पाइपलाइन बिछाई गई।
पहाड़ी इलाकों में अक्सर बंजर या ढलान वाली जमीन को खेती लायक बनाना महंगा और मुश्किल काम माना जाता है, क्योंकि न तो वहां नियमित सिंचाई का कोई साधन होता है और न ही जंगली जानवरों से बचाव आसान होता है। दीनदयाल ने इन्हीं बाधाओं को मनरेगा के तहत मिली मजदूरी सहायता और विभागीय तकनीकी मार्गदर्शन से दूर करने की कोशिश की। उन्होंने शुरुआत में सीमित संख्या में सेब और कीवी के पौधे लगाए और धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर बाग का विस्तार किया।
हर सीजन अतिरिक्त आमदनी का दावा
दीनदयाल के मुताबिक, इस बागवानी से उन्हें हर सीजन करीब ₹3 से ₹4 लाख की अतिरिक्त आमदनी हो रही है। खेती उनका मुख्य पेशा नहीं है, इसलिए यह आय परिवार के लिए एक अतिरिक्त सहारा बन गई है। उनका कहना है कि सही तकनीक और विभागीय मदद मिलने से पहाड़ की सीमित जमीन पर भी अच्छी बागवानी संभव है।
जिला उद्यान अधिकारी मनोरंजन भंडारी ने इस मॉडल को लेकर कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु सेब और कीवी जैसी फसलों के लिए अत्यंत अनुकूल है, और किसान वैज्ञानिक तकनीकों से कम जगह पर भी बेहतर उत्पादन कर सकते हैं। विभाग का कहना है कि दीनदयाल जैसे किसानों के अनुभव को देखकर आसपास के गांवों के कई लोग भी अपनी बंजर या कम इस्तेमाल में आने वाली जमीन पर बागवानी शुरू करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
पहाड़ी इलाकों में पलायन की समस्या के बीच इस तरह के प्रयोग इस बात का संकेत हैं कि वैज्ञानिक तरीके से की गई बागवानी गांव में रहते हुए भी अतिरिक्त कमाई का जरिया बन सकती है, बशर्ते शुरुआती ढांचागत मदद और तकनीकी मार्गदर्शन मिलता रहे।
उद्यान विभाग के मुताबिक कीवी और सेब जैसी फसलें पौड़ी गढ़वाल की मध्य पहाड़ी जलवायु में अच्छी तरह पनप सकती हैं, लेकिन ज्यादातर किसान अब तक परंपरागत अनाज या सब्जियों की खेती तक ही सीमित रहे हैं। दीनदयाल बिष्ट का उदाहरण विभाग अब अपने जागरूकता कार्यक्रमों में भी इस्तेमाल कर रहा है, ताकि नौकरी या अन्य पेशे में लगे लोग भी अपनी पैतृक जमीन को बंजर छोड़ने के बजाय बागवानी के लिए इस्तेमाल करने पर विचार करें।
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बंदर और जंगली सुअर जैसे जानवरों से फसल को होने वाला नुकसान भी किसानों के लिए एक बड़ी समस्या रहा है, जिसके चलते कई किसान परंपरागत खेती छोड़ चुके हैं। दीनदयाल के बाग की मजबूत घेरबाड़ इस समस्या से निपटने में काफी कारगर साबित हुई है, और उनका कहना है कि फलदार पेड़ों में इस तरह के नुकसान की आशंका खेत की फसलों से कम रहती है। विभाग का मानना है कि आने वाले वर्षों में जिले में ऐसे और बाग खड़े होने से स्थानीय स्तर पर सेब और कीवी की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे किसानों को बाहर से फल खरीदने वाले व्यापारियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
दीनदयाल का कहना है कि नौकरी के साथ खेती को संतुलित करना शुरुआत में चुनौतीपूर्ण था, लेकिन परिवार के सहयोग और विभाग से मिले तकनीकी सहयोग से यह संभव हो पाया। वे चाहते हैं कि आने वाले समय में गांव के और लोग भी इस मॉडल को अपनाएं, ताकि पूरे इलाके में पलायन की रफ्तार कुछ कम हो सके और खाली पड़ी जमीन पर फिर से हरियाली लौट सके।
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