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राज्य कृषि समाचार (State News)

हिमाचल के सेब बागानों पर मंडराया फ्लाई स्पेक और सूटी ब्लॉच रोग का खतरा, जानें बचाव का तरीका

29 सितंबर 2026, रोहड़ू (शिमला, हिमाचल प्रदेश): हिमाचल के सेब बागानों पर मंडराया फ्लाई स्पेक और सूटी ब्लॉच रोग का खतरा, जानें बचाव का तरीका – सेब पट्टी के रोहड़ू और रामपुर बुशहर क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश और समय से पहले पत्ते गिरने की वजह से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। बागवानी विभाग ने चेतावनी दी है कि इन हालात में सेब के बगीचों में फ्लाई स्पेक और सूटी ब्लॉच रोग फैलने का खतरा काफी बढ़ गया है, जो सीधे तौर पर फल की गुणवत्ता और बाजार भाव को प्रभावित करता है।

बागवानी विभाग के विषय वस्तु विशेषज्ञ संजय कुमार ने बताया कि यह दोनों फफूंद जनित रोग सेब के छिलके की बाहरी सतह पर काले धब्बे और परत जैसी संरचना बना देते हैं। इससे फल देखने में खराब लगता है और मंडी में उसकी मांग व दाम दोनों घट जाते हैं, भले ही फल के अंदर का गूदा प्रभावित न हुआ हो।

कैप्टान और जीरम से मिलेगा बचाव

बागवानी विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे समय रहते फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करें। इसके लिए कैप्टान दवा की 600 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है। इसके विकल्प के तौर पर जीरम दवा की भी 600 ग्राम मात्रा 200 लीटर पानी में मिलाकर इस्तेमाल की जा सकती है। विशेषज्ञों ने साफ किया है कि दोनों में से किसी एक ही दवा का इस्तेमाल एक समय पर करना चाहिए, दोनों को आपस में मिलाना नहीं चाहिए।

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विभाग ने यह भी सलाह दी है कि छिड़काव से पहले बगीचे में जलभराव की स्थिति न बनने दें, क्योंकि नमी बढ़ने से फफूंद के फैलने का खतरा और बढ़ जाता है। पेड़ों के बीच उचित दूरी बनाए रखना और घनी शाखाओं की छंटाई करना भी हवा के आवागमन को बेहतर बनाकर रोग के प्रकोप को कम करने में मदद करता है।

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तुड़ान के बाद भी सतर्कता जरूरी

बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि सितंबर से लेकर पत्ते झड़ने तक का समय बगीचों की देखभाल के लिहाज से बेहद अहम होता है, क्योंकि इसी दौरान अगले साल की फसल की नींव तैयार होती है। तुड़ान के बाद सिंचाई करना, संतुलित मात्रा में गोबर खाद डालना और नाइट्रोजन उर्वरक की अधिकता से बचना भी जरूरी बताया गया है, ताकि पेड़ स्वस्थ रहें और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे।

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सेब की खेती का बड़ा योगदान है और शिमला, कुल्लू व किन्नौर जैसे जिलों में लाखों परिवार सीधे तौर पर इस पर निर्भर हैं। पिछले कुछ वर्षों में मौसम में असामान्य बदलाव, कभी अत्यधिक बारिश तो कभी लंबे सूखे के दौर ने बागवानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। ऐसे में समय पर सही सलाह और दवा का इस्तेमाल बागवानों के लिए फसल बचाने का सबसे भरोसेमंद तरीका बन जाता है।

बाजार में अच्छी कीमत पाने के लिए सेब का बाहरी रूप-रंग साफ और आकर्षक होना बेहद जरूरी है, खासकर जब फल को बड़े शहरों की मंडियों या निर्यात के लिए भेजा जाता है। फ्लाई स्पेक और सूटी ब्लॉच जैसी बीमारियां भले ही फल के स्वाद पर सीधा असर न डालें, लेकिन इनकी वजह से सेब की ग्रेडिंग और कीमत दोनों में भारी गिरावट आ जाती है। यही वजह है कि बागवानी विभाग हर साल बारिश के मौसम में समय पर छिड़काव की सलाह देकर बागवानों को आर्थिक नुकसान से बचाने की कोशिश करता है।

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