राज्य कृषि समाचार (State News)

वैज्ञानिक खेती का कमाल! मेढ़-नाली तकनीक से किसान ने बचाई मक्का की फसल, भारी बारिश भी नहीं बनी बाधा

09 जुलाई 2026, भोपाल: वैज्ञानिक खेती का कमाल! मेढ़-नाली तकनीक से किसान ने बचाई मक्का की फसल, भारी बारिश भी नहीं बनी बाधा – बदलते मौसम और अनियमित बारिश के कारण जलभराव किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। कई क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश से फसलें प्रभावित हो रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक खेती की आधुनिक तकनीकें किसानों के लिए राहत का जरिया भी बन रही हैं। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक किसान ने मेढ़-नाली (रिज एवं फरो) पद्धति अपनाकर यह साबित कर दिया कि सही तकनीक के जरिए भारी बारिश और जलभराव जैसी परिस्थितियों में भी फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।

कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना द्वारा प्रोत्साहित इस तकनीक को अपनाकर जिले के विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम नए गांव उदासी (राजेगांव) निवासी प्रगतिशील किसान घनसू यादव ने खरीफ 2026 में अपने खेत में मक्का की बुवाई की। लगातार हो रही भारी बारिश के बावजूद उनकी फसल पूरी तरह स्वस्थ, हरी-भरी और संतुलित वृद्धि करती नजर आ रही है।

खेत में पानी भरा, लेकिन फसल पर नहीं पड़ा असर

कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसान के खेत का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान देखा गया कि खेत की नालियों में पर्याप्त मात्रा में पानी भरा हुआ था, लेकिन मेढ़ों पर लगी मक्का की फसल पर जलभराव का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। मेढ़-नाली पद्धति में अतिरिक्त पानी नालियों में जमा हो जाता है, जिससे पौधों की जड़ों तक पानी नहीं ठहरता और उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहती है। यही कारण है कि लगातार बारिश के बावजूद फसल सुरक्षित बनी हुई है।

मक्का ही नहीं, कई फसलों के लिए फायदेमंद है यह तकनीक

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मेढ़-नाली (रिज एवं फरो) पद्धति केवल मक्का ही नहीं, बल्कि सोयाबीन, कपास और तुअर जैसी फसलों के लिए भी बेहद उपयोगी है। सामान्य परिस्थितियों में जलभराव होने पर पौधों की जड़ें प्रभावित होती हैं, फसल पीली पड़ने लगती है और किसानों को अतिरिक्त उर्वरकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। लेकिन इस तकनीक के उपयोग से जलभराव की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है, जिससे फसल की वृद्धि बेहतर बनी रहती है।

कम बारिश में भी मिलता है फायदा

विशेषज्ञों का कहना है कि मेढ़-नाली तकनीक केवल अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए ही नहीं, बल्कि कम बारिश की स्थिति में भी लाभकारी है। नालियों में संचित नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सूखे जैसी परिस्थितियों में भी पौधों को आवश्यक नमी मिलती रहती है। इससे उर्वरकों का उपयोग अधिक प्रभावी होता है और फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन दोनों में सुधार होता है।

जिले के 90 प्रतिशत किसान अपना चुके हैं तकनीक

कृषि विभाग के अनुसार, मेढ़-नाली पद्धति के अच्छे परिणामों को देखते हुए छिंदवाड़ा जिले के लगभग 90 प्रतिशत किसान विभिन्न कृषि यंत्रों की सहायता से इस तकनीक को अपना चुके हैं। इससे खेती अधिक वैज्ञानिक, सुरक्षित और लाभकारी बन रही है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में कारगर विकल्प

कृषि विभाग का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम लगातार अनिश्चित हो रहा है। ऐसे में मेढ़-नाली (रिज एवं फरो) पद्धति किसानों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ खेती का प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। यह तकनीक जलभराव और नमी प्रबंधन दोनों में मदद करती है, जिससे विपरीत मौसम में भी फसल को नुकसान का खतरा कम हो जाता है।

फसल निरीक्षण के दौरान उप संचालक कृषि मोरिस नाथ, आत्मा परियोजना के परियोजना संचालक धीरज ठाकुर, अनुविभागीय कृषि अधिकारी नीलकंठ पटवारी, सहायक संचालक दीपक चौरसिया तथा ब्लॉक टेक्नोलॉजी मैनेजर प्रिया कराड़े भी मौजूद रहे।

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