मृदा स्वास्थ्य संवर्धन एवं वैकल्पिक उर्वरक उपयोग
लेखक – डॉ. एस.के.सिंह, प्रधानाचार्य, कोआपरेटिव रूरल डेवेलोपमेंट ट्रस्ट , इफको आंवला, बरेली, उ.प्र., डा इंदिरा राठौर , नैनो वैज्ञानिक, इफको आंवला, बरेली, उ.प्र.
27 जनवरी 2026, भोपाल: मृदा स्वास्थ्य संवर्धन एवं वैकल्पिक उर्वरक उपयोग – मृदा जीवन का आधार है जिस पर कृषि एवं वातावरण की निर्भरता होती है l मृदा स्वास्थ्य एक ऐसी अवस्था है , जिसमें मिट्टी अपने पर्यावरण के अनुरूप पारिस्थिकी तंत्र के कार्यों को पूरा करती हैl अधिक बोलचाल की भाषा में मिट्टी का स्वास्थ्य मिट्टी के सभी घटकों जैसे माइक्रोबायोटा,पौधों और जानवरों की अनुकूल बातचीत से उत्पन्न होता है एक स्वस्थ मृदा निम्न आवश्यक कार्यों को स्थिरता प्रदान करती हैl
- जल को एकत्र करने एवं उसके बहाव को नियंत्रित करती है l
- सूक्ष्म जीवो में जैव विविधता एवं उत्पादकता में सहयोग करती है l
- खनिज एवं मृदा जीवाणु, ग्राउंडवाटर के प्रदूषकों को फिल्टर करने का कार्य करता है l
- मृदा जीवाणु कुछ तत्व जैसे फास्फोरस, नाइट्रोजन, एवं कार्बन के एकत्रीकरण एवं चक्र में भाग लेते हैं l
- पौधों के वृद्धि को एक आवश्यक माध्यम प्रदान करना एवं मानव द्वारा किए जा रहे निर्माण को सपोर्ट करने का कार्य मृदा द्वारा किया जाता है l
मृदा स्वास्थ्य का निर्धारण इसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों के आधार पर किया जाता है l एक स्वस्थ मृदा फसलों के अच्छे वानस्पतिक वृद्धि उपज वृद्धि खाद्य उत्पादन एवं वायु सुरक्षा में सहयोग करती है l स्वस्थ मृदा वातावरण से कार्बन स्थिरिकरण कर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने का कार्य करता है l दुर्भाग्यवश कई कारणों जैसे सघन खेती, वनों की कटाई, छरण, प्रदूषण, एवं अनुपयुक्त उर्वरक एवं इसके उपयोग के कारण मृदा का स्वास्थ्य खतरे में है l
एक ताजे अध्ययन में पता चला हैl कि यूरोपीय यूनियन में लगभग 61.1 प्रतिशत जमीन भूमि छरण से प्रभावित है F.A.O के एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 33.1 प्रतिशत भूमि का छरण हो चुका है एवं सन 2050 तक लगभग 90.1 प्रतिशत भूमियों के छरण की संभावना हैl
आधुनिक खेती मुख्य रूप से उर्वरकों के उपयोग पर निर्भर है जिसके कारण वैश्विक जनसंख्या का भरण पोषण हो पा रहा है परंतु यदि उर्वरको के उपयोग पर ठीक तरह से प्रबंध नहीं किया गया तो मृदा की उर्वरता एवं उत्पादकता निश्चित रूप से प्रभावित होगी l जब संश्लेषित उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है तो सूक्ष्म जीवाणु जो मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं एवं पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं , नष्ट हो जाते हैंl इसलिए यह अच्छा है कि जितना आवश्यक हो उतना ही दिया जाए जिसका निर्धारण मिट्टी परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिएl यह गलत अवधारणा है कि मृदा विटामिन रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के साथ बढ़ते हैं जबकि इसके विपरीत रासायनिक उर्वरकों एवं पेस्टिसाइड के अत्यधिक प्रयोग से मृदा उर्वरकता घटती हैl
सामान्य भाषा में उर्वरक वे पदार्थ है जिनको पौधों के उत्पादकता एवं उपज वृद्धि के लिए पौधों के ऊपर सीधे अथवा मिट्टी में मिलाकर उपयोग किया जाता हैl उर्वरक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं 1. कार्बनिक एवं 2. संश्लेषित अथवा रासायनिक l
कार्बनिक खाद या प्राकृतिक खाद को वनस्पति या जीव अवशेषों से प्राप्त किया जाता है जबकि अकार्बनिक अथवा रासायनिक उर्वरकों को रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किया जाता है l कार्बनिक अथवा प्राकृतिक खादों का उपयोग कर मृदा स्वास्थ्य को संरक्षित एवं फसलों से अच्छा एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है l रासायनिक अथवा संश्लेषित उर्वरकों की मात्रा को कम कर निम्न वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग कर मृदा उर्वरता को संरक्षित अथवा उसमें सुधार किया जाता है l
1. गोबर की खाद और कंपोस्ट:
गोबर की खाद को जानवरों के गोबर से तैयार किया जाता है जबकि कंपोस्ट को खाद्य पदार्थो के अवशेष एवं अन्य वानस्पतिक अवशेषों से सड़ाकर बनाया जाता हैl
2. मृदा सुधारक:
यह एक प्रकार के ऐसे पदार्थ होते हैं जिनको मिट्टी में मिलाने से उसकी भौतिक संरचना एवं पोषकता में सुधार होता हैl
3.जैव उत्प्रेरक:
जैव उत्प्रेरक जैविक स्रोतों से तैयार किया गया पदार्थ है जिसको बीज, पौधों अथवामिट्टीमें मिलाया जाता है समुद्री घास से तैयार किया गया जाता है जैव उत्प्रेरक किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है जो किसानों की फसलों को व्यापक पोषण प्रदान करता हैl
4.जैव उर्वरक:
जैव उर्वरक को सूक्ष्म जीवाणुओं के माध्यम से तैयार किया जाता हैl जो कि मृदा उर्वरता में वृद्धि करते हैं इसका उपयोग कर लंबे समय तक मृदा उर्वरता बनाए रखने में
सहायता मिलती हैl
5. बायो-पेस्टिसाइड:
मृदा में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति से कार्बन को एकत्र करने में मदद मिलती हैl जब हम विभिन्न प्रकार के कीड़ों एवं बीमारियों से पौधों को बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों या फंफूदनाशको का प्रयोग करते है तो मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणु नष्ट होने लगते हैं रासायनिक, कीटनाशक अथवा फफूंदनाशकों के स्थान पर जैविक पेस्टिसाइड का उपयोग करके हम मिट्टी में इन सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बनाए रख सकते हैंl
6.स्लोरिलीज फर्टिलाइजरर्स:
स्लोरिलीज फर्टिलाइजर मिट्टी में तत्वों को धीरे-धीरे लंबे समय तक उपलब्ध कराता है जिससे सूक्ष्म जीवाणुओ की संख्या में वृद्धि के कारण मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता हैl
7.नैनो उर्वरक:
नैनो उर्वरक आधुनिक युग का उर्वरक है जिसमें नैनो आकार के तत्व होते हैं जिसके कारण इसकी उपयोग क्षमता अधिक होती है इफको द्वारा विभिन्न प्रकार के नैनों उर्वरक जैसे नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, नैनो जिंक, नैनो कॉपर का निर्माण तरल रूप में किया गया है जो की पूर्ण रूप से वातावरण के अनुकूल एवं मिट्टी, जल एवं वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करता हैl
शस्य क्रियायों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण
निम्न शस्य क्रियायों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण किया जा सकता है l
(अ ) मिश्रित खेती:
एक ही खेत में कई प्रकार के फसलों को उगाकर मृदा उत्पादकता एवं उर्वरता को बढ़ाया जा सकता हैl इससे मृदा का छरण एवं मृदा जनित रोगों की रोकथाम होती है दलहनी फसलों के उगाने से मृदा में नत्रजन का स्थिरीकरण होता है एवं अधिक गहरी जड़ो वाली फसलों से भूमि की उर्वराशक्ति में सुधार होता हैl
(ब) कम जुताई एवं सीधी बुआई:
बार-बार जुताई करने के कारण भूमि का छरण होता है एवं नमी का तेजी से छरण होता है बिना जुताई किये सीधी बुवाई से उपलब्ध अवशेषों को सड़ा कर मिट्टी में मिलाने से भूमि की उर्वराशक्ति में सुधार होता हैl
(स) हरी खाद का उपयोग:
हरी खाद कृषि में मृदा की उर्वरता बढ़ाने का एक प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। इसमें कुछ विशेष फसलों को खेत में उगाकर उन्हें फूल आने की अवस्था में जुताई द्वारा मिट्टी में मिला दिया जाता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है।
इस प्रकार वैकल्पिक उर्वरक उपयोग एवं विभिन्न शस्य क्रियायों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण किया जा सकता है। कृषकों में जागरूकता लाकर एवं इसे क्रियांवित कराने वाली संस्थाओं के सक्रिय भागीदारीसे वृहत पैमाने पर परिणाम प्राप्त करने के लिये यहाँ कार्य निश्चित रूप से किया जा सकता है ।
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