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राज्य कृषि समाचार (State News)

भूजल बचाने के लिए धान-गेहूं छोड़ा, अब सब्जी नर्सरी से सालाना 8-10 लाख पौधे तैयार कर रहे सिरसा के किसान

06 अक्टूबर 2026, सिरसा: भूजल बचाने के लिए धान-गेहूं छोड़ा, अब सब्जी नर्सरी से सालाना 8-10 लाख पौधे तैयार कर रहे सिरसा के किसान – हरियाणा के सिरसा जिले के झोरड़नाली गांव के किसान मुकेश कंबोज ने गिरते भूजल स्तर को देखते हुए धान-गेहूं की खेती छोड़कर सब्जी नर्सरी का काम शुरू किया, और आज वे सालाना 8 से 10 लाख पौधे तैयार कर रहे हैं।

इलाके में भूजल स्तर 120 से 180 फुट तक नीचे चला गया था, जिससे धान-गेहूं की खेती में सिंचाई का खर्च लगातार बढ़ रहा था। साथ ही मिट्टी की उर्वरता में भी गिरावट देखी जा रही थी। इसी वजह से मुकेश ने पानी की कम जरूरत वाली खेती की तरफ रुख किया।

सिरसा सहित हरियाणा के कई जिलों में धान की खेती हर साल भूजल पर बड़ा दबाव डालती है, क्योंकि एक एकड़ धान में सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। उत्तर भारत के इस हिस्से में भूजल स्तर घटने की समस्या लंबे समय से बनी हुई है, और कई किसान परिवार अब मुकेश जैसे विकल्पों की तरफ देख रहे हैं।

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सब्जी नर्सरी के काम में मेहनत ज्यादा लगती है, क्योंकि पौध की देखभाल रोजाना करनी पड़ती है और बीमारी लगने पर तुरंत ध्यान देना जरूरी होता है। लेकिन इसकी भरपाई इस बात से हो जाती है कि नर्सरी से मिलने वाली आमदनी धान-गेहूं के मुकाबले प्रति एकड़ कहीं ज्यादा होती है।

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नर्सरी से तैयार पौध सीधे खेत में रोपी जा सकती है, जिससे आसपास के किसानों को बीज से अलग से पौध तैयार करने का झंझट नहीं उठाना पड़ता और खेत में रोपाई का समय भी बचता है।

एक-दो एकड़ से शुरुआत, अब बड़ा नेटवर्क

मुकेश ने अक्टूबर 2021 में सिर्फ एक से दो एकड़ जमीन पर सब्जियों की पौध तैयार करना शुरू किया था। धीरे-धीरे काम बढ़ाते हुए उन्होंने नेट हाउस बनवाने पर 4.25 लाख रुपये खर्च किए, जिसमें उन्हें 75 प्रतिशत तक सरकारी अनुदान मिला।

उन्होंने अपनी नर्सरी को आधुनिक बनाने के लिए करीब 20 लाख रुपये की अतिरिक्त निवेश भी किया, जिसमें सिंचाई और बीज प्रबंधन की नई तकनीकों पर खर्च शामिल है। अब उनकी नर्सरी से क्षेत्र के दूसरे किसानों को भी सब्जियों की पौध मिल जाती है।

नर्सरी के काम में पानी की खपत पारंपरिक धान-गेहूं की खेती के मुकाबले बहुत कम होती है, क्योंकि पौधे सीमित जगह और नियंत्रित सिंचाई व्यवस्था में तैयार किए जाते हैं। इससे मुकेश को कम जमीन में भी ज्यादा उत्पादन और आमदनी मिल रही है।

नेट हाउस की वजह से मुकेश साल भर सब्जियों की पौध तैयार कर पाते हैं, चाहे बाहर का मौसम कैसा भी हो। इससे उन्हें बेमौसम बारिश या तेज गर्मी में भी नुकसान का जोखिम कम हो गया है, जो खेत में खुले में की जाने वाली नर्सरी में अक्सर बड़ी समस्या होती है।

झोरड़नाली और आसपास के गांवों में अब कई किसान नर्सरी के लिए पौध खरीदने मुकेश के पास ही आते हैं, जिससे उन्हें बाहर से पौध मंगाने का खर्च और समय दोनों बचता है।

धान-गेहूं की जगह बदलते विकल्प

मुकेश की नर्सरी से तैयार पौधों की मदद से आसपास के किसान भी परंपरागत फसल चक्र से हटकर सब्जी की खेती अपना रहे हैं, जिससे इलाके में पानी की खपत कम होने की उम्मीद है। धान-गेहूं के मुकाबले सब्जी की नर्सरी में सिंचाई की जरूरत काफी कम रहती है।

शुरुआत में सिर्फ एक-दो एकड़ जमीन से शुरू हुआ यह काम अब मुकेश के लिए मुख्य आजीविका बन गया है, और इससे उनके परिवार के साथ गांव के कुछ अन्य लोगों को भी नर्सरी के काम में रोजगार मिल रहा है।

सिरसा जैसे भूजल संकट वाले जिलों में यह मॉडल किसानों के लिए एक व्यावहारिक रास्ता बनकर सामने आया है, जहां एक तरफ आमदनी बढ़ रही है और दूसरी तरफ जमीन के नीचे का पानी भी थोड़ी राहत पा रहा है।

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