हिमाचल में गेहूं-चने की बिजाई से पहले बीज उपचार जरूरी, माहू के लिए भी एडवाइजरी जारी
06 अक्टूबर 2026, पालमपुर: हिमाचल में गेहूं-चने की बिजाई से पहले बीज उपचार जरूरी, माहू के लिए भी एडवाइजरी जारी – हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने रबी फसलों की बिजाई से पहले किसानों के लिए बीज उपचार और कीट नियंत्रण से जुड़ी विस्तृत सलाह जारी की है। विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. जनार्दन सिंह के मुताबिक ऊंचे इलाकों में गेहूं की अगेती किस्मों की बिजाई अक्तूबर के पहले पखवाड़े से शुरू की जा सकती है, जबकि चने की बिजाई के लिए अक्तूबर का मध्य समय बेहतर रहेगा।
यह सलाह प्रदेश के उन सभी जिलों के किसानों के लिए जारी की गई है जहां रबी सीजन में गेहूं, चना, मटर और तिलहनी फसलें उगाई जाती हैं। विश्वविद्यालय हर साल रबी और खरीफ सीजन की शुरुआत में इस तरह की फसलवार सलाह जारी करता है, ताकि किसान समय पर सही फैसला ले सकें।
बिजाई से पहले बीज उपचार को लेकर विश्वविद्यालय ने साफ मात्रा बताई है, जिससे फसल को शुरुआती दौर में ही बीमारियों से बचाया जा सके।
बीज उपचार की सही मात्रा
गेहूं के बीज को बोने से पहले बैविस्टिन 2.5 ग्राम, वीटावैक्स 2.5 ग्राम या रैक्सिल 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। चने के बीज के लिए बैविस्टिन 1.5 ग्राम और थीरम 1.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज मिलाकर उपचार करने की सलाह दी गई है।
मटर की बिजाई करने वाले किसानों को बैविस्टिन या वीटावैक्स 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करने को कहा गया है। बीज उपचार से बीज और मिट्टी के जरिए फैलने वाली फफूंद जनित बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाता है।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक बीज उपचार में की गई यह छोटी सी मेहनत आगे चलकर पूरी फसल को बचाने में मदद करती है, क्योंकि एक बार बीमारी जड़ पकड़ लेने पर बाद में छिड़काव से भी उतना फायदा नहीं मिलता।
माहू कीट से ऐसे करें बचाव
तिलहनी और अन्य संवेदनशील फसलों में माहू (एफिड) कीट का प्रकोप होने पर साइपरमेथ्रिन, मिथाइल डेमेटॉन या डाइमिथोएट में से किसी एक दवा का एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
माहू कीट पौधे की कोमल पत्तियों और नई शाखाओं का रस चूसता है, जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है और उपज पर सीधा असर पड़ता है। सरसों और अन्य तिलहनी फसलों में ठंड बढ़ने के साथ ही इस कीट का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है, इसलिए समय पर निगरानी जरूरी है।
विश्वविद्यालय ने सब्जियों के लिए भी सलाह जारी की है। नीचे के इलाकों में किसान पालक, मूली, गाजर और लहसुन की बिजाई कर सकते हैं, जबकि मध्यवर्ती ऊंचाई वाले इलाकों में फूलगोभी, बंदगोभी, गांठगोभी और ब्रॉकली की पौध खेत में लगाने का सही समय है।
इसके अलावा पशुधन की देखभाल को लेकर भी किसानों को मौसम बदलने के साथ सावधानी बरतने की सलाह दी गई है, क्योंकि ठंड की शुरुआत में पशुओं में बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
समय पर बीज उपचार और कीट नियंत्रण से किसानों को रबी सीजन की शुरुआत में ही फसल सुरक्षित रखने में मदद मिलती है, और बाद में महंगे छिड़काव पर खर्च भी कम हो जाता है। कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों को अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या विस्तार केंद्र से संपर्क कर स्थानीय मिट्टी-मौसम के हिसाब से सलाह लेने की भी अपील की है।
पहाड़ी राज्य होने के कारण हिमाचल प्रदेश में एक ही समय में अलग-अलग ऊंचाई वाले इलाकों के लिए अलग-अलग बिजाई सलाह देनी पड़ती है, क्योंकि निचले और ऊंचे इलाकों का तापमान व मौसम काफी अलग रहता है। इसी वजह से कृषि विश्वविद्यालय हर सीजन में इलाकेवार विस्तृत सलाह जारी करता है, जिसे किसान अपने गांव की ऊंचाई और मौसम के हिसाब से अपनाते हैं।
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