राज्य कृषि समाचार (State News)

वैज्ञानिकों की सलाह, ध्यान दें इन दो फसलों के उत्पादक किसान

14 फ़रवरी 2025, भोपाल: वैज्ञानिकों की सलाह, ध्यान दें इन दो फसलों के उत्पादक किसान – देश के अधिकांश किसानों द्वारा सरसों के साथ ही गेहूं की भी फसलों का उत्पादन किया जाता है लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने इन दोनों फसलों की पैदावर पर बड़ा खतरा भी बताया है, लिहाजा किसानों के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा के वैज्ञानिकों ने सलाह जारी की है। यदि आप इन दोनों फसलों का उत्पादन करते है तो इस सलाह को जरूर अपनाए।

कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि मौसम को ध्यान में रखते हुए गेहूं की फसल में रोगों, विशेषकर रतुआ की निगरानी करते रहें। काला, भूरा अथवा पीला रतुआ आने पर फसल में डाइथेन एम-45 (2.5 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें। पीला रतुआ के लिये 10-20 डिग्री सेल्सियस तापमान उप्युक्त है। 25 डिग्री सेल्सियस तापमान से ऊपर रोग का  फैलाव नहीं होता। भूरा रतुआ के लिये 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ नमीयुक्त जलवायु आवश्यक है। काला रतुआ के लिये 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान और नमी रहित जलवायु आवश्यक है। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि वर्तमान तापमान को ध्यान में रखते हुए किसान सभी सब्जियों तथा सरसों की फसल में चेपा के आक्रमण की निगरानी करें। अगर हल्की सी लापरवाही हुई तो किसानों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। पैदावार घटने के साथ-साथ सरसों में तेल की मात्रा भी घट सकती है। यह कीट शिशु और प्रौढ़ पीलापन लिए हुए हरे रंग के होते हैं जो पौधों के तनों, पत्तियों फूलों और नए फलियों के रस को चूसकर कमजोर कर देते हैं।

सरसों में चेपा, मोयला या एफिड कीट लगता है। यह कीट पौधों का रस चूसकर उन्हें कमज़ोर करता है, जिससे फसल की पैदावार में कमी आती है। यह कीट ठंडे और बादल वाले मौसम में तेजी से फैलता है। कृषि विभाग के अनुसार माहू मधुस्राव करते हैं जिस पर काली फफूंद उग आती है, जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) प्रक्रिया में रुकावट आती है। जिससे पौधे खराब होने लगते हैं। इससे पौधे की उपज और तेल की मात्रा पर नकारात्मक पर प्रभाव पड़ता है। यह समस्या खास तौर पर आसमान में बादल छाए रहने और ठंडे मौसम में ज्यादा होती है, क्योंकि ऐसा मौसम कीट की वंश वृद्धि के लिए ज्यादा अच्छा होता है। 

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