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राज्य कृषि समाचार (State News)

गुजरात में कपास पर गुलाबी सुंडी, मूंगफली पर पत्ती धब्बा रोग का खतरा, जानें दवा और मात्रा

02 अक्टूबर 2026, अहमदाबाद: गुजरात में कपास पर गुलाबी सुंडी, मूंगफली पर पत्ती धब्बा रोग का खतरा, जानें दवा और मात्रा – गुजरात के बनासकांठा, गांधीनगर और मेहसाणा जिलों में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) का प्रकोप बढ़ने की चेतावनी दी गई है। इसी के साथ मूंगफली में पत्ती धब्बा रोग और गन्ने में सफेद मक्खी का खतरा भी सामने आया है।

यह सलाह भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अहमदाबाद स्थित एग्रोमेट फील्ड यूनिट (AMFU) की ओर से जारी कृषि-मौसम बुलेटिन संख्या 76/2026 में दी गई है, जो 30 सितंबर 2026 को जारी हुआ। गुलाबी सुंडी से संक्रमित कपास के पौधों की कलियों और फलों में छेद दिखने लगते हैं और उनके भीतर सूत जैसा जाल बन जाता है, जिससे कपास की गुणवत्ता और वजन दोनों घट जाते हैं।

अक्टूबर के महीने में कपास, मूंगफली और गन्ना तीनों ही फसलें अहम अवस्था में होती हैं, इसलिए इस दौरान कीट-रोग का हमला फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। यही वजह है कि बुलेटिन में किसानों को समय पर कार्रवाई की सलाह दी गई है।

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कपास में गुलाबी सुंडी से बचाव कैसे करें

बुलेटिन के मुताबिक गुलाबी सुंडी के नियंत्रण के लिए डेल्टामेथ्रिन या ट्राइज़ोफॉस की 10 मिलीलीटर मात्रा 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। ज्यादा प्रकोप होने पर ब्यूवेरिया पाउडर 100 ग्राम के साथ प्रोफेनोफॉस 20 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी के घोल का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

बुलेटिन में निगरानी के लिए खेत में प्रति हेक्टेयर पांच फेरोमोन ट्रैप लगाने की भी सलाह दी गई है, जिससे कीट की मौजूदगी का समय रहते पता चल सके और छिड़काव सही समय पर किया जा सके। किसानों को नियमित रूप से खेत का भ्रमण करके कलियों और फलों की जांच करने की सलाह भी दी गई है।

मूंगफली और गन्ने के लिए भी सलाह

बनासकांठा और गांधीनगर में मूंगफली की फसल पर पत्ती धब्बा रोग फैल रहा है, जिसमें पत्तियों पर गोल-भूरे धब्बे दिखाई देते हैं और समय रहते नियंत्रण न होने पर पत्तियां समय से पहले सूखकर गिर जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए टेबुकोनाज़ोल 18.3% SC की 10 मिलीलीटर मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

नवसारी, वलसाड, सूरत और भरूच जिलों में गन्ने की फसल पर सफेद मक्खी का असर देखा जा रहा है, जिससे पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और उन पर चिपचिपा स्राव जमने लगता है। इसके लिए एज़ाडिरेक्टिन 10,000 पीपीएम की 20 मिलीलीटर मात्रा 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें, और दूसरा छिड़काव 10 दिन बाद दोहराएं।

इसके अलावा बुलेटिन में एक जैविक विकल्प का भी सुझाव दिया गया है, जिसमें नीम तेल 0.5 प्रतिशत यानी 50 मिलीलीटर नीम तेल और 10 ग्राम डिटर्जेंट प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। यह विकल्प उन किसानों के लिए उपयोगी है जो कम रासायनिक इनपुट से खेती करना चाहते हैं।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए दवाओं को बदल-बदल कर इस्तेमाल करना और बुलेटिन में दी गई सलाह के अनुसार ही मात्रा रखना ज्यादा असरदार माना जाता है। छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के वक्त करने की सलाह दी जाती है, जब तेज धूप नहीं होती, ताकि दवा का असर पूरा मिल सके और मजदूरों व किसानों को भी गर्मी से परेशानी न हो।

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