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राज्य कृषि समाचार (State News)

शहडोल में धान की फसल पर जीवाणु झुलसा रोग का खतरा, वैज्ञानिकों ने बताया बचाव का तरीका

17 सितंबर 2026, शहडोल: शहडोल में धान की फसल पर जीवाणु झुलसा रोग का खतरा, वैज्ञानिकों ने बताया बचाव का तरीका – आदिवासी बहुल शहडोल जिले में धान की खड़ी फसल पर जीवाणु झुलसा रोग यानी बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का खतरा मंडरा रहा है। हाल की भारी बारिश और बढ़ी हुई नमी के चलते यह रोग तेजी से फैल सकता है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. नितिन सिंघई के अनुसार, इस रोग में धान के पत्तों के किनारों पर पीले धब्बे बनने लगते हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को झुलसा देते हैं। समय पर उपचार न किया जाए तो यह रोग फसल को 20 से 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा सकता है, जो किसानों के लिए बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है।

बारिश और नमी बनी बीमारी की वजह

शहडोल जिले में खरीफ सीजन में धान मुख्य फसल है और यह इलाका आदिवासी बहुल क्षेत्र माना जाता है, जहां ज्यादातर किसान छोटी जोत पर खेती करते हैं। हाल के दिनों में हुई तेज बारिश और लगातार बनी नमी ने जीवाणु के पनपने और फैलने के लिए अनुकूल हालात बना दिए हैं। खड़ी फसल में पत्तियों का पीला पड़ना इसी बीमारी का शुरुआती लक्षण है, जिसे किसान अक्सर सामान्य पीलापन या पोषक तत्वों की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

डॉ. सिंघई ने किसानों को सलाह दी है कि वे नियमित रूप से अपने खेतों का निरीक्षण करें और पत्तियों पर पीले धब्बे या झुलसे निशान दिखते ही तुरंत उपचार शुरू करें। देरी करने पर रोग हवा और बारिश के पानी के जरिए पूरे खेत और आसपास के खेतों में भी तेजी से फैल सकता है।

शहडोल जिले में ज्यादातर किसान बारिश पर निर्भर धान की खेती करते हैं और उनके पास कीट-रोग की पहचान के लिए ज्यादा तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में गांव स्तर पर समय-समय पर दी जाने वाली इस तरह की सलाह किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित होती है, क्योंकि शुरुआती अवस्था में ही बीमारी पकड़ में आने पर इलाज आसान और सस्ता पड़ता है।

छिड़काव के लिए दवा और सटीक मात्रा

रोग की रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी दवा के छिड़काव की सलाह दी है। इसे 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोलकर पूरे खेत में अच्छी तरह छिड़कना चाहिए। छिड़काव सुबह या शाम के समय करना बेहतर रहता है, जब धूप की तीव्रता कम हो और दवा पत्तियों पर लंबे समय तक टिकी रहे।

किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि खेत में अनावश्यक जलभराव न होने दें और संतुलित मात्रा में ही नाइट्रोजन उर्वरक का इस्तेमाल करें, क्योंकि ज्यादा नाइट्रोजन से पौधों के ऊतक कोमल हो जाते हैं और यह रोग तेजी से फैलता है। खेत की मेड़ों और नालियों की सफाई रखने से भी पानी का बहाव बेहतर रहता है और जलभराव की आशंका कम होती है।

आने वाले सीजन के लिए वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया है कि किसान रोग-रोधी धान किस्मों का चुनाव करें और बुवाई से पहले बीज को उपचारित जरूर करें, क्योंकि संक्रमित बीज से भी यह जीवाणु अगली फसल में पहुंच सकता है। खेत की मेड़ों पर उगी खरपतवार और पिछली फसल के अवशेषों को समय पर हटाने से भी रोग के जीवाणु को पनपने का मौका कम मिलता है।

जीवाणु झुलसा रोग अगर समय पर नहीं रोका गया तो शहडोल जैसे आदिवासी बहुल इलाके में धान उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है, जहां ज्यादातर किसान छोटी जोत पर निर्भर हैं। कॉपर आधारित फफूंदनाशकों की सही मात्रा में और सही समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना स्थानीय कृषि-इनपुट विक्रेताओं के लिए भी जरूरी हो जाता है, ताकि किसानों को समय पर दवा मिल सके और बड़ा नुकसान टाला जा सके।

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