राज्य कृषि समाचार (State News)

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: मध्यप्रदेश में ब्रांडिंग और सामुदायिक मॉडल पर जोर

29 नवंबर 2024, भोपाल: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: मध्यप्रदेश में ब्रांडिंग और सामुदायिक मॉडल पर जोर – मध्यप्रदेश को प्राकृतिक खेती में अग्रणी राज्य बनाने के लिए उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार कनेक्टिविटी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। महिला किसानों और स्वयं सहायता समूहों को शामिल कर सामुदायिक मॉडल अपनाने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। इस उद्देश्य से मध्यप्रदेश राज्य नीति आयोग ने “जलवायु सहनशीलता और सतत कृषि के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: मार्ग, चुनौतियां और नीति समर्थन” विषय पर संवाद आयोजित किया।

इस संवाद में कृषि, बागवानी और सतत विकास के विशेषज्ञों के साथ-साथ महिला किसान, स्वयंसेवी संगठन और सरकारी अधिकारी शामिल हुए। उन्होंने प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए बेहतर नीतियों और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर विचार साझा किए।

प्राकृतिक खेती के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता जरूरी

राज्य नीति आयोग के सीईओ, श्री ऋषि गर्ग ने कहा कि किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने में तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है।

आंध्रप्रदेश के उप निदेशक हॉर्टिकल्चर, श्रीनिवासुलु ने सामुदायिक प्राकृतिक खेती के अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कम लागत और स्थानीय संसाधनों के उपयोग से यह मॉडल किसानों के लिए अधिक व्यवहारिक बनता है।

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नीतियों और मार्केटिंग पर चर्चा

अतिरिक्त सचिव बागवानी एवं खाद्य प्रसंस्करण, श्रीमती प्रीति मैथिल ने कहा कि प्राकृतिक खेती के उत्पाद उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। हालांकि, इन्हें व्यावसायिक रूप से सफल बनाने के लिए बाजार से जोड़ने और मजबूत नीति समर्थन की आवश्यकता है।

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पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर ने प्राकृतिक और जैविक खेती के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए “शून्य लागत प्राकृतिक खेती” की तकनीकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को अपनाने की प्रक्रिया को सरल बनाकर इसे अधिक किसान-हितैषी बनाया जा सकता है।

महिला किसानों और सामुदायिक मॉडल पर जोर

प्रमुख सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास, श्रीमती दीपाली रस्तोगी ने संवाद के दौरान विशेषज्ञों से सामुदायिक मॉडल अपनाने के तरीकों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि महिला किसानों और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी से इस मॉडल को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती को व्यावसायिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रमाणीकरण प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर जैव विविधता में सुधार और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा की गई।’

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