तमिलनाडु के केले के बागों में सिगाटोका पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप, कृषि वैज्ञानिकों ने दी यह सलाह
24 अक्टूबर 2026, कोयंबटूर: तमिलनाडु के केले के बागों में सिगाटोका पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप, कृषि वैज्ञानिकों ने दी यह सलाह – तमिलनाडु के केला उत्पादक इलाकों में इस समय सिगाटोका पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (टीएनएयू) की अक्टूबर माह की कीट-रोग पूर्वानुमान रिपोर्ट के अनुसार यह रोग राज्य के लगभग सभी केला उत्पादक क्षेत्रों में मौजूद है।
सिगाटोका रोग में पत्तियों पर गहरे भूरे या काले रंग के धब्बे बनने लगते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़कर पूरी पत्ती को प्रभावित कर देते हैं। इससे पौधे की भोजन बनाने की क्षमता घट जाती है, जिसका सीधा असर फलों के आकार, गुणवत्ता और उपज पर पड़ता है। नमी और बादल भरे मौसम में यह रोग तेजी से फैलता है, इसलिए बारिश के बाद के दिनों में खेत की लगातार निगरानी जरूरी हो जाती है।
पहले प्रभावित पत्तियां हटाएं, फिर करें छिड़काव
टीएनएयू की सलाह के मुताबिक सबसे पहले पौधे की सबसे ज्यादा प्रभावित निचली एक-दो पत्तियों को काटकर खेत से बाहर ले जाकर जला देना चाहिए या जमीन में दबा देना चाहिए, ताकि रोग का फैलाव रुक सके। संक्रमित पत्तियों को खेत में ही छोड़ देने से फफूंद के बीजाणु हवा के जरिए आसपास के स्वस्थ पौधों तक भी पहुंच सकते हैं।
इसके बाद रासायनिक नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत WP की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर या मैंकोजेब 75 प्रतिशत WP की 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा का पत्तियों पर छिड़काव महीने में एक बार करने की सलाह दी गई है।
जिन किसानों के खेत में रोग ज्यादा बढ़ चुका है, उनके लिए टीएनएयू ने एक वैकल्पिक छिड़काव भी सुझाया है। इसमें प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत EC की 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर मात्रा को पेट्रोलियम आधारित मिनरल ऑयल की 10 मिलीलीटर प्रति लीटर मात्रा के साथ मिलाकर छिड़का जाता है। छिड़काव के घोल में बेहतर असर के लिए 10 लीटर पानी में 5 मिलीलीटर चिपकने वाला पदार्थ (वेटिंग एजेंट) मिलाने की भी सलाह दी गई है।
केला तमिलनाडु की प्रमुख बागवानी फसलों में शामिल है और राज्य के कई जिलों के किसानों की आजीविका इसी फसल पर टिकी है। एक बार रोग फैल जाने पर पूरे बाग को बचाना मुश्किल हो जाता है, इसलिए कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि समय रहते प्रभावित पत्तियों को हटाना और सही मात्रा में फफूंदनाशक का छिड़काव करना रोग को नियंत्रण में रखने का सबसे कारगर तरीका है। किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के समय करें, जब धूप की तेज किरणें सीधे पत्तियों पर न पड़ रही हों।
शुरुआती लक्षणों की पहचान जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक सिगाटोका रोग की शुरुआत पत्तियों पर हल्के पीले या हल्के भूरे धारीनुमा धब्बों से होती है, जो देखने में बहुत मामूली लगते हैं। किसान अक्सर शुरुआती अवस्था में इसे नजरअंदाज कर देते हैं, और तब तक रोग पूरे बाग में फैल चुका होता है जब तक धब्बे गहरे और बड़े नहीं हो जाते।
बाग में पौधों के बीच उचित दूरी रखना और खेत में पानी जमा न होने देना भी रोग की रोकथाम में मदद करता है, क्योंकि ज्यादा घनी बागवानी और जलभराव दोनों ही फफूंद को पनपने का मौका देते हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि बाग में हवा का आवागमन बना रहे, इसके लिए जरूरत से ज्यादा घनी पत्तियों की छंटाई समय-समय पर करते रहें।
कृषि विभाग के अधिकारियों का यह भी कहना है कि छिड़काव के दौरान तय मात्रा से ज्यादा दवा का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे न सिर्फ लागत बढ़ती है बल्कि पौधे और मिट्टी पर भी विपरीत असर पड़ सकता है। सही समय पर सही मात्रा में छिड़काव करना ही रोग को काबू में रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है।
किसानों को यह सलाह भी दी गई है कि बाग में नई रोपाई करते समय रोग-प्रतिरोधी या अपेक्षाकृत कम संवेदनशील प्रजातियों को प्राथमिकता दें, जिससे आगे चलकर रोग का खतरा कम किया जा सके। साथ ही हर फसल सीजन के बाद बाग की सफाई और पुरानी सूखी पत्तियों को हटाना भी रोग के बीजाणुओं को अगले सीजन तक बचे रहने से रोकने में मदद करता है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


