हिसार की जैविक प्रयोगशाला: इंजीनियर ने अमरूद के बाग में मुर्गीपालन जोड़कर खड़ा किया नया मॉडल
24 अक्टूबर 2026, हिसार: हिसार की जैविक प्रयोगशाला: इंजीनियर ने अमरूद के बाग में मुर्गीपालन जोड़कर खड़ा किया नया मॉडल – मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले गुरसौरभ ने नौकरी छोड़कर खेती को अपनाया और अमरूद के बाग में ही मुर्गीपालन जोड़कर एक अनोखा एकीकृत कृषि मॉडल खड़ा किया है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (सीसीएसएचएयू) के तकनीकी मार्गदर्शन में शुरू हुआ यह प्रयोग अब आसपास के किसानों के लिए भी मिसाल बन रहा है।
गुरसौरभ ने घने रोपण वाला अमरूद का बाग लगाया और पेड़ों के नीचे खुले में मुर्गियां चरने के लिए छोड़ दीं। उनका कहना है कि इस तरह मुर्गियां स्वाभाविक रूप से बाग में घूमती हैं, जिससे मिट्टी की सेहत में भी सुधार होता है और पौधों को अतिरिक्त खाद अलग से डालने की जरूरत कम पड़ती है।
नस्ल चुनने में बरती खास सावधानी
बाग में खुले में मुर्गियां छोड़ने पर चूहे, नेवले और अन्य छोटे जंगली जानवरों से खतरा बना रहता है, इसलिए नस्ल का चुनाव आसान नहीं था। गुरसौरभ ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस और भारतीय देसी नस्लों की मुर्गियों का परीक्षण किया, ताकि ऐसी नस्ल मिल सके जो खुले वातावरण में खुद को बचा भी सके और अच्छा उत्पादन भी दे सके।
आखिरकार उन्होंने अमेरिकी रोड आइलैंड रेड को भारतीय देसी असील नस्ल के साथ क्रॉस कराया। असील नस्ल से ताकत, अनुकूलन क्षमता और सुरक्षात्मक प्रवृत्ति मिलती है, जबकि रोड आइलैंड रेड से अंडा उत्पादन बेहतर होता है और आक्रामकता भी कम रहती है। उनका लक्ष्य था कि मुर्गा सतर्क हो, मुर्गियां साल में करीब 200 से 250 अंडे दें और नस्ल बीमारियों व मौसम की मार झेलने लायक मजबूत हो।
गुरसौरभ कहते हैं, “मैंने बस अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की।” एक तस्वीर के कैप्शन में वे यह भी कहते हैं कि उनके लिए खेती का मतलब एक ऐसा आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा करना है जो खुद को बनाए रख सके। उनके पिता का मानना रहा है कि बाजार के रुझान को समझना और उसमें पैठ बनाना हर किसान के लिए उतना ही जरूरी है जितना अच्छी उपज लेना।
अमरूद और मुर्गीपालन के अलावा गुरसौरभ नींबू, माल्टा और मौसमी की बागवानी भी करते हैं। साथ ही उनके पास दुधारू गायें हैं और वे मौसमी सब्जियां भी उगाते हैं। बाग और पशुपालन से मिलने वाली उपज वे हिसार की स्थानीय मंडी में बेचते हैं, जबकि कुछ हिस्सा घर के इस्तेमाल के लिए भी रखते हैं।
गुरसौरभ का यह मॉडल दिखाता है कि कम जमीन पर भी बागवानी और पशुपालन को साथ जोड़कर आय के कई स्रोत बनाए जा सकते हैं। कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस तरह के एकीकृत मॉडल आने वाले समय में छोटे किसानों के लिए जोखिम कम करने का एक कारगर तरीका हो सकते हैं, क्योंकि अगर एक फसल या एक उत्पाद का भाव गिरता भी है, तो दूसरे स्रोत से आमदनी बनी रहती है।
इंजीनियरिंग छोड़ खेती की राह पकड़ने वालों के लिए मिसाल
गुरसौरभ जैसे पढ़े-लिखे युवाओं का खेती की ओर लौटना हरियाणा के कई जिलों में अब नया चलन बनता जा रहा है। कृषि विश्वविद्यालयों में इन दिनों ऐसे युवा किसानों की संख्या बढ़ रही है जो परंपरागत खेती के साथ-साथ नई तकनीक और एकीकृत मॉडल भी आजमा रहे हैं।
सीसीएसएचएयू के विशेषज्ञों का कहना है कि गुरसौरभ जैसे किसानों के साथ काम करने का फायदा यह भी होता है कि विश्वविद्यालय को खेत पर ही नई नस्लों और तकनीकों का असली परीक्षण करने का मौका मिलता है। इससे मिली जानकारी आगे चलकर आसपास के अन्य किसानों तक भी पहुंचाई जाती है।
गुरसौरभ का कहना है कि शुरुआती दौर में नस्ल चुनने और बाग में मुर्गियों को सुरक्षित रखने में कई चुनौतियां आईं, लेकिन लगातार परीक्षण और विश्वविद्यालय के मार्गदर्शन से धीरे-धीरे मॉडल स्थिर हो गया। अब वे चाहते हैं कि आसपास के और किसान भी इस तरह के एकीकृत मॉडल को देखने और समझने के लिए उनके खेत का दौरा करें।
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