पांढुर्ना जिले में कपास फसल पर रोग और कीट का प्रकोप
जिला स्तरीय संयुक्त दल ने सौसर ब्लॉक में किया निरीक्षण
18 सितंबर 2026, (उमेश खोड़े , कृषक जगत , पांढुर्ना): पांढुर्ना जिले में कपास फसल पर रोग और कीट का प्रकोप – एक तो दुबले, दूसरे दो आषाढ़ ‘ वाली उक्ति इन दिनों पांढुर्ना जिले के किसानों पर सटीक बैठ रही है। अल्प वर्षा के साथ ही कपास फसल पर रोग और कीट का प्रकोप होने से कई किसानों की फसल खराब हो गई है । फसल चक्र नहीं अपनाने से भी समस्या बढ़ी है। सर्वे रिपोर्ट में यदि नुकसानी का प्रतिशत 25 % से अधिक रहेगा तो किसानों को फसल बीमा के तहत कुछ मुआवजा मिल सकता है, अन्यथा आरबीसी 6 – 4 में फसल में रोग लगने पर मुआवजे का प्रावधान नहीं होने से किसानों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकेगी। ऐसे में कपास का उत्पादन कम होने और नुकसान बढ़ने से किसान चिंतित हैं।
उल्लेखनीय है कि विकासखंड सौसर में कपास फसल की वर्तमान स्थिति एवं रोग प्रकोप की जानकारी प्राप्त करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों के संयुक्त दल द्वारा कपास प्रक्षेत्रों का निरीक्षण किया गया। जिला स्तरीय गठित दल में अनुविभागीय कृषि अधिकारी सौंसर सुश्री अर्चना डोंगरे, अनुविभागीय कृषि अधिकारी छिंदवाड़ा श्री दीपक चौरसिया, डॉ. शिखा शर्मा, सहायक प्राध्यापक पौध व्याधि, डॉ. चंचल भार्गव, वरिष्ठ तकनीकी सहायक पौध प्रजनन एवं आनुवंशिकी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी सौसर श्री योगेश भलावी तथा क्षेत्रीय कृषि विस्तार अधिकारी श्री कैलाश धुर्वे एवं श्री अंकित शर्मा शामिल रहे। दल ने ग्राम पंधराखेड़ी , घोघरी खापा, छत्रापुर एवं अंबाखापा में किसानों के खेतों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों को कपास फसल में फफूंद जनित एवं जीवाणु जनित रोगों का प्रकोप पाया गया।
किसानों का कथन – ग्राम पंधराखेड़ी के किसान श्री गौरव गणेश किनकर ने कृषक जगत को बताया कि कपास की फसल दस साल से लगा रहे हैं। इस साल 50 % फसल खराब हो गई है। अधिकारियों ने फसल चक्र बदलने की सलाह दी है। पंचनामा बनाया है । फसल बीमा नहीं कराया है , क्योंकि प्रीमियम 4 -5 हज़ार जमा करते हैं , लेकिन मुआवजा 7 -8 रु मिलता है। आरबीसी 6 -4 के तहत फसल नुकसानी का मुआवजा मिलने की जानकारी नहीं है। वहीं इसी गांव के श्री शुभम पंवार ने कहा कि पौने दो एकड़ में लगाई कपास की फसल 50 % खत्म हो गई है। जबकि पड़ोस में और अन्य खेत में फसल अच्छी है। अधिकारियों ने कहा कि फसल के नमूने कपास अनुसंधान केंद्र भेजेंगे। पटवारी ने पंचनामा बनाया है। मुआवजा मिलना चाहिए।
वैज्ञानिक और अधिकारियों का अभिमत – डॉ. शिखा शर्मा, सहायक प्राध्यापक (पौध व्याधि ) ने कृषक जगत को बताया कि निरीक्षण दल के साथ सौंसर ब्लॉक के चार गांवों के खेतों की कपास फसल का निरीक्षण किया था। जहां मुख्यतः मृदा जनित रोगों का संक्रमण अधिक पाया गया। मृदा में विषकारक तत्व लम्बे समय से मौजूद मिले। इसके अलावा विषाणु जनित रोग के लक्षण भी दिखे। उकठा रोग (विल्ट ) और जड़ सड़न (रुट रॉट ) के लक्षण पाए गए। समतल भूमि की बजाय ढलान वाले क्षेत्र में यह समस्या ज़्यादा पाई गई। पानी की कमी से अस्वस्थ पौधों की ऊंचाई भी नहीं बढ़ी। हालांकि यह स्थिति सब खेतों में नहीं पाई गई। किसानों को बुवाई से पहले गहरी जुताई , नीम खली और ट्राइकोडर्मा का उपयोग , स्वस्थ बीज , बीजोपचार , फसल परिवर्तन और संतुलित उर्वरक का प्रयोग करने की सलाह दी गई।
डॉ चंचल भार्गव , वरिष्ठ तकनीकी सहायक ( पौध प्रजनन एवं आनुवंशिकी ) ने कृषक जगत को बताया कि कपास फसल को प्रभावित करने के कई कारण पाए गए। फंगल और वायरस का इंफेक्शन भी दिखा। ढलान वाले खेतों या जहां पानी का संग्रह अधिक था वहां और जो किसान फसल चक्र नहीं अपना रहे हैं उनके यहां यह समस्या ज़्यादा दिखी। फफूंद / विषाणु , सफ़ेद मक्खी , बढ़ती आर्द्रता , तेज़ वर्षा का अभाव जैसे कारणों से कपास फसल में रोग / कीट का प्रकोप दिखाई दिया। किसानों को खरीफ में बुवाई पूर्व गहरी जुताई , भूमि उपचार करने और एक वर्ष कपास की फसल को नहीं लगाने की सलाह दी गई।
श्री दीपक चौरसिया,अनुविभागीय कृषि अधिकारी, छिंदवाड़ा ने बताया कि लगातार एक ही जगह कपास फसल लगाने से कुछ क्षेत्रों में फसल प्रभावित हो रही है। जहां जल भराव है वहां की फसल में फंगस और बैक्टीरिया के कारण विल्ट / रुट रॉट पाया गया है। बादलों का मौसम कीटों के अनुकूल रहता है। प्रकाश संश्लेषण नहीं होने से पौधों की वृद्धि रुक गई है। किसानों को फसल चक्र अपनाना पड़ेगा।
छत्रापुर की पटवारी रुपाली पाटिल ने कहा कि सर्वे में कृषि अधिकारी और वैज्ञानिक भी शामिल थे। पूरे गांव का सर्वे हो रहा है। फसल क्षति की गणना अभी नहीं हुई है। जल्द ही रिपोर्ट नायब तहसीलदार को दूंगी। कपास फसल में रोग भी लगा है। आरबीसी 6 -4 में फसल में रोग लगने पर मुआवजे देने का प्रावधान नहीं है। पंचनामे की प्रति किसानों को देने का नियम नहीं है। ज़रूरत पड़ने पर नायब तहसीलदार के न्यायालय में आवेदन देकर इसे प्राप्त किया जा सकता है।
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