जैविक सोयाबीन उत्पादन ‘ विषय  पर ऑनलाइन कृषक संगोष्ठी आयोजित

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23 अप्रैल 2022, इंदौर ।  जैविक सोयाबीन उत्पादन ‘ विषय  पर ऑनलाइन कृषक संगोष्ठी आयोजित भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान , इंदौर ,सोलिडेरीडेड एवं आई टी सी लिमिटेड   के संयुक्त प्रयास से आजआजादी का अमृत महोत्सव एवं अन्नदाता देवो भव: अभियान  के अंतर्गत ‘जैविक सोयाबीन उत्पादन” विषय पर ज़ूम एप्प तथा संस्थान के यू ट्यूब  चैनल पर ऑनलाइन कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।  जिसमें लगभग 750 सोया कृषक/महिलाओं ने भाग लिया।

इस संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता संस्थान के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक डॉ ओम प्रकाश जोशी ने कहा कि भारत देश हमेशा से जैविक खेती के लिए अग्रसर रहा है. ऐतिहासिक दस्तावेजों  का हवाला देते हुए  उन्होंने बताया कि आजादी के पहले इंदौर में इंस्टीट्यूट ऑफ़ प्लांट इंडस्ट्री नाम का एक अनुसन्धान संस्थान था जहाँ से अल्बर्ट हॉवर्ड नामक विदेशी वैज्ञानिक ने भारत में परंपरागत रूप से की जा रही जैविक खेती के तरीके सीखकर दूसरे  देशो में इसका प्रचार प्रसार किया। उनके अनुसार जैविक खेती के लिए प्रारंभिक 3 वर्षो का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जिसमें  किसी भी प्रकार के रसायनों का प्रयोगवर्जित है । अत: इस कालावधि में सोयाबीन का उत्पादन कम होने से कृषक हतोत्साहित हो जाते हैं. देश के प्रथम जैविक खेती करने वाले राज्य सिक्किम के उत्पादन आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्ष 2003 से सिक्किम जविक बोर्ड के गठन के बाद 12 वर्षो में सम्पूर्ण जैविक राज्य का दर्जा प्राप्त किया है।  लेकिन इस दौरान फसलो की उत्पादकता में गिरावट देखी जा रही हैं. अतः अनुकूल क्षेत्रों में जैविक खेती के साथ-साथ समेकित खेती/न्यूनतम रसायनों के उपयोग की खेती का भी चलन होना चाहिए, जिससेदेश की जनसंख्या  के लिए खाद्यान्न सुरक्षा निरंतर सुनिश्चित की जा सके।

डॉ अमर नाथ शर्मा  ने सोयाबीन के जैविक उत्पादन में सबसे महत्वपूर्ण कीट एवं रोग नियंत्रण के तरीकों के बारे  में बताया कि वर्तमान में किसानों द्वारा अनावश्यक तथा मनमाने तरीके से कीटनाशकों  का प्रयोग किया जा रहा है।  इसके स्थान पर कीट नियंत्रण के अन्य उपाय जैसे जैविक कीटनाशक, वानस्पतिक अर्क जैसे बबूल, धतूरा  एवं सीताफल का अर्क का छिडकाव प्रभावी पाया गया है।  इसी प्रकार कीट नियंत्रण के अन्य उपाय जैसे ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, संतुलित पोषण, उचित बीज दर जैसे तरीकों को अपनाना चाहिए। डॉ शर्मा ने कहा कि  किसान अपने खेतों  में जगह-जगह पर पक्षियों के बैठने की व्यवस्था करें एवं लाइट ट्रैप या कीट-विशेष फिरोमोन ट्रैप लगा कर काफी हद तक कीटों का नियंत्रण कर सकते हैं . एक अन्य तरीके “ट्रैप फसल”के बारे में  जानकारी दी। उन्होंने बताया कि निश्चित अंतराल पर अंतरवर्ती फसल के रूप में लगाने से अधिकतर कीट सुवा पर आकर्षित होते हैं एवं सोयाबीन की फसल में नुकसान कम होता है। संस्थान की कार्यवाह निदेशक डॉ नीता खांडेकर ने कहा कि संस्थान, सोयाबीन की फसल के लिए अधिक से अधिक कृषकों को नवीनतम तरीकों बाबत जागरूक कर उत्पादन वृद्धि की दिशा में अग्रसर है।  संस्थान आने वाले मौसम के लिए मिनीकिट के रूप में सोयाबीन बीज उपलब्ध करने के लिए प्रयासरत है, जिससे कि अधिक से अधिक क्षेत्रों में उन्नत प्रजातियों के बीज का फैलाव हो सके ।

इसके पूर्व संगोष्ठी के प्रारंभ में प्रधान वैज्ञानिक डॉ बी.यु. दुपारे  द्वारा आई टी सी एवं सोलिडेरीडेड जैसे  स्वयंसेवी गैर-सरकारी संगठनों  का एवं संस्थान  के डॉ राकेश कुमार वर्मा उपस्थितों का स्वागत किया और  सोयाबीन के उत्पादन में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन से फसल में होने वाले नुकसान को कम करने के उपाय और जैविक सोयाबीन उत्पादन बाबत किये जा रहे अनुसन्धान प्रयोगों पर अपने विचार व्यक्त किए।  सोलिडेरीडेड, भोपाल के डॉ सुरेश मोटवानी ने कहा कि  भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान के  संयुक्त प्रयासों से विगत वर्ष सोयाबीन की अद्यतन जानकारी के प्रचार-प्रसार से विपरीत मौसम के बावजूद सोयाबीन के उत्पादन में वृद्धि हुई है। आईटीसी लिमिटेड के श्री निलेश पाटकर ने भी संस्थान  द्वारा विगत वर्षो में तकनीकी -प्रचार-प्रसार की दिशा में अपनाए  गए डिजिटल मीडिया की भूमिका की सराहना की। कार्यक्रम का संचालन प्रधान वैज्ञानिक डॉ बी.यू. दुपारे ने किया  तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ राघवेन्द्र मदर द्वारा किया गया।

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