राज्य कृषि समाचार (State News)

भिंडी की खेती: कम लागत में अच्छी कमाई

लेखक: संजय हिंगवे (एसोसिएट ब्रीडर-ओकरा), ईगल सीड्स एंड बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड इंदौर (MP) 452010.

10 फरवरी 2026, भोपाल: भिंडी की खेती: कम लागत में अच्छी कमाई – भिंडी/लेडीज़ फिंगर (Abelmoschus esculentus): भारत की एक प्रमुख सब्ज़ी फसल है, जिसकी मांग साल भर बनी रहती है। यह पोषक तत्वों से भरपूर होती है और किसानों के लिए कम समय में अच्छा मुनाफ़ा देने वाली फसल मानी जाती है। सही तकनीक और देखभाल से भिंडी की खेती बेहद लाभकारी साबित हो सकती है।

1. भिंडी का महत्व

भिंडी में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विटामिन A और C प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह पाचन के लिए लाभकारी होती है तथा मधुमेह रोगियों के लिए भी उपयोगी मानी जाती है। यह किसानों को शीघ्र लाभ प्रदान करती है।

2. जलवायु और भूमि

भिंडी की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिए 25–35°C तापमान अनुकूल माना जाता है। यह फसल हल्की दोमट से लेकर बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी उपज देती है। भूमि का जल निकास अच्छा होना चाहिए तथा मिट्टी का pH मान 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए।

3. उन्नत किस्में

भारत में भिंडी की कई उन्नत संकर किस्में उपलब्ध हैं, किसानों को अच्छी पैदावार के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना बहुत ज़रूरी है।

संकर/Hybrid किस्म चयन के फायदे

  • अधिक उपज
  • गहरा हरा रंग
  • एकसार फल (uniform size)
  • जल्दी और आसान तुड़ाई
  • रोगों के प्रति सहनशीलता

जिनमें प्रमुख संकर/Hybrid किस्में हैं:

क्र.सं.भिंडी की संकर किस्में किस्में प्रकार
1.Eagle-3801F1 Hybrid
2.Eagle 11 PlusF1 Hybrid
3.Eagle GreenOP Variety
4.ReetaF1 Hybrid
5.RaadhikaF1 Hybrid
6.NavyaF1 Hybrid
7.अर्का अनामिकाOP Variety
8.परभनी क्रांतिOP Variety
9.पंजाब पद्मिनीOP Variety
10.वर्षा उपहारOP Variety
11.अर्का अभयOP Variety

ये किस्में अधिक उत्पादन देने वाली तथा कुछ रोगों के प्रति सहनशील होती हैं।

4. बुवाई का समय और विधि:

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए फरवरी–मार्च तथा खरीफ फसल के लिए जून–जुलाई का समय उपयुक्त होता है। बीजों की बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 45–60 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी रखें। प्रति हेक्टेयर 8–10 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।

भिंडी की बुवाई में Ridge & Furrow और Flat Bed (Plan) विधि दोनों इस्तेमाल की जाती हैं, लेकिन चुनाव मिट्टी, पानी और मौसम पर निर्भर करता है।

  1. Ridge & Furrow (उभार-खाईं) विधि कब इस्तेमाल करें: भारी मिट्टी, जो पानी रोक लेती है, मॉनसून/खरीफ में जब बारिश अधिक होती है।

तरीके: Ridge (उभार): 30–40 cm ऊँचा, 60 cm चौड़ा और Furrow (खाईं): 15–20 cm गहरी, बीज ridge पर डालें ।

फायदा: जलभराव से बचाव, जड़ों में हवा और नमी का संतुलन और बीमारियों का कम खतरा।

  • Flat Bed / Plan (समतल) विधि कब इस्तेमाल करें: हल्की या दोमट मिट्टी, सिंचाई आसानी से उपलब्ध हो और पानी जमा होने का डर कम हो ।

तरीके: जमीन को समतल करके बुवाई, पंक्ति दूरी: 45–60 cm, पौधे की दूरी: 25–30 cm, सिंचाई: नियमित, पर जलभराव नहीं ।

फायदा: बीज बोना और तुड़ाई आसान, सिंचाई कम मेहनत वाली, बड़े पैमाने पर खेती में आसान ।

संक्षेप में सुझाव:

मिट्टी / हालातसबसे अच्छा तरीका
भारी मिट्टी / बारिश ज़्यादाRidge & Furrow
हल्की / दोमट मिट्टीFlat Bed / Plan

5. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन:

अच्छी उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 20–25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद भूमि तैयारी के समय डालनी चाहिए। इसके अतिरिक्त 100 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फॉस्फोरस और 50 किग्रा पोटाश की सिफारिश की जाती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय तथा शेष दो भागों में टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें।

6. सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण:

गर्मी में 5–7 दिन के अंतराल पर तथा बरसात में आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें। खेत को खरपतवार-मुक्त रखने के लिए 2–3 निराई-गुड़ाई आवश्यक होती है। इससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है।

7. कीट एवं रोग प्रबंधन:

भिंडी में प्रमुख कीट तना एवं फल छेदक, सफेद मक्खी और माहू हैं। रोगों में Enation Leaf Curl Virus, पीला मोज़ेक वायरस (Yellow Vein Mosaic Virus) और पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) तथा Fusarium Wilt प्रमुख हैं। समय पर कीटनाशक व रोगनाशक का छिड़काव कर इनका नियंत्रण किया जा सकता है। रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन भी लाभकारी होता है।

8. तुड़ाई और उपज:

भिंडी के फल कोमल अवस्था में तोड़ना चाहिए। पहली तुड़ाई बुवाई के 45–50 दिन बाद प्रारंभ हो जाती है। प्रति हेक्टेयर औसतन 100–150 क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती है।

निष्कर्ष:

भिंडी एक ऐसी सब्ज़ी फसल है जो कम लागत में अधिक लाभ देने की क्षमता रखती है। वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर किसान इसकी अच्छी उपज और बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यह फसल पोषण और व्यापार—दोनों दृष्टियों से अत्यंत उपयोगी है।

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