उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय में जैविक खेती पर राष्ट्रीय जागरूकता दिवस

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23 अगस्त 2022, उदयपुर: उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय में जैविक खेती पर राष्ट्रीय जागरूकता दिवस – अनुसंधान निदेशालय महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा जैविक खेती पर नेटवर्क परियोजना के तहत  22 अगस्त, 2020 को ‘‘जैविक खेती पर राष्ट्रीय जागरूकता दिवस‘‘ मनाया गया।

डॉ. नरेन्द्र सिंह राठौड़ कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए बताया कि जैविक कृषि की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैकल्पिक कृषि के रूप में वृद्धि हो रही है तथा लगभग 190 देश में जैविक खेती की जा रही है। भारत के लिए जैविक खेती सबसे ज्यादा महत्व है क्योंकि जैविक खेती करने वाले किसानों की संख्या भारत में विश्व में सबसे ज्यादा है। मिट्टी में कार्बन बढ़ाने, सूक्ष्मजीव बढ़ाने, मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए जैविक खेती का स्कोप काफी है। लेकिन अनुसंधान के साथ-साथ जैविक खेती में सही तकनीकों का किसानों तक प्रसार आवश्यक है। उन्होंने ब्लॉक चेन तकनीकी का जैविक कृषि में उपयोग बढ़ाने पर बल दिया है।

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डॉ. ए. एस. पंवार, निर्देशक भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, उत्तर प्रदेश ने कहा कि जैविक खेती की दृष्टि से राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है। जैविक मुर्गीपालन की आज विशेष आवश्यकता है क्योंकि मुर्गी पालन में एंटीबायोटिक का उपयोग बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि स्वयं की बीमारियों से बचने के लिए पेस्टिसाइड रहित खेती करने की आवश्यकता है। विषयुक्त खाना खाने से अपने परिवार एवं प्रदेश को बचाइए, राष्ट्र एवं स्वयं को सुरक्षित हो जाएंगे उन्होंने किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती से कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अधिक लाभ प्राप्त करने की तरफ ध्यान आकर्षित किया। साथ ही उन्होंने बताया कि राजस्थान में मिट्टी में जीवांश की मात्रा काफी कम है। जो किसान जीरो 0.1 प्रतिशत या इससे ज्यादा जैविक कार्बन मिट्टी में बढ़ाते हैं उन किसानों को आर्थिक लाभ मिलना चाहिए।

डॉ. एन. रविशंकर, प्रधान वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय परियोजना प्रभारी, अखिल भारतीय जैविक खेती नेटवर्क परियोजना, मोदीपुरम ने कहा कि भारत में जैविक कृषि में कुल बुवाई क्षेत्रफल का 2.4 प्रतिशत क्षेत्र में ही जैविक क्षेत्रफल है। उन्होंने बताया कि जैविक प्रोडक्ट के लिए ट्रेसियाबिलिटि की पद्धति है प्रमाणीकरण के लिए पी.जी.एस. पद्धति है। लेकिन किसानों में जागरूकता की कमी है। अंतः जागरूकता बढ़ाना है अभी कृषि में दाल तिलहन तथा मिलेट्स की आसानी से जैविक खेती भी की जा सकती है। डॉ. शांति कुमार शर्मा, निदेशक अनुसंधान ने बताया कि जैविक खेती में व्यवसायिक स्तर आदानों का उत्पादन किया जा रहा है जिनमें कीटनाशक रसायनों व उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण व भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्यस हो रहा है, साथ ही फल, सब्जी व अनाज की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है ।

कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ रोशन चौधरी, सहायक आचार्य, ने सभी का स्वागत किया तथा कार्यक्रम में सभी का धन्यवाद डॉ अरविंद वर्मा ने ज्ञापित किया।

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