राज्य कृषि समाचार (State News)

सोशल मीडिया से सीखी मशरूम की खेती, मोनू तिवारी ने घर के कमरे से शुरू किया व्यवसाय; अब बड़े शहरों से मिल रहे ऑर्डर

22 जनवरी 2026, सागर: सोशल मीडिया से सीखी मशरूम की खेती, मोनू तिवारी ने घर के कमरे से शुरू किया व्यवसाय; अब बड़े शहरों से मिल रहे ऑर्डर – सागर जिले के रहली ब्लॉक के वार्ड नंबर 03 निवासी मोनू तिवारी ने यह साबित कर दिया है कि अगर सीखने की लगन हो, तो संसाधनों की कमी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। मोनू ने अपने साथी सोनू के साथ मिलकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से मशरूम की खेती की जानकारी हासिल की और अपने घर के एक छोटे से कमरे से ही मशरूम उत्पादन की शुरुआत की। आज यह छोटा सा प्रयोग उनकी आजीविका का मजबूत आधार बनता जा रहा है।

मोनू तिवारी ने बताया कि उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के केवल YouTube और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए मशरूम की खेती करना सीखा। शुरुआती तौर पर उन्होंने अपने घर के एक कमरे में सीमित संसाधनों के साथ प्रयोग किया। मेहनत और सही देखरेख का परिणाम यह रहा कि पहली ही फसल सफल रही और मशरूम की गुणवत्ता को जबलपुर में पास कर लिया गया।

उन्होंने बताया कि मशरूम की खेती 10 नवंबर से शुरू की गई थी, जिसमें 30 से 40 दिनों के भीतर फसल तैयार हो जाती है। वर्तमान में मशरूम की फुटकर कीमत 350 से 400 रुपये प्रति किलो है, जबकि थोक में 150 से 200 रुपये प्रति किलो की दर से बिक्री हो रही है। अब तक करीब 10 किलो मशरूम का उत्पादन किया जा चुका है, जिसके सैंपल जबलपुर, दमोह, सागर और स्थानीय सब्जी मंडी में भेजे गए हैं। अच्छी गुणवत्ता के चलते अब बड़े शहरों से ऑर्डर मिलने लगे हैं।

मोनू का कहना है कि मशरूम की खेती में देखरेख बेहद जरूरी होती है, खासकर गर्मियों में तापमान को लगभग 25 डिग्री सेल्सियस बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। हालांकि, इसकी लागत अपेक्षाकृत कम है, जो करीब 80 से 90 रुपये प्रति किलो आती है, जबकि मुनाफा अच्छा निकलता है। इस आय से वे अपने परिवार के खर्च और बच्चों की पढ़ाई का खर्च आसानी से वहन कर पा रहे हैं।

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मोनू तिवारी की यह पहल आसपास के युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है। कई युवा उनसे जानकारी लेकर बड़े स्तर पर मशरूम की खेती शुरू करने की योजना बना रहे हैं। मोनू का मानना है कि अगर युवा नई तकनीक और सोशल मीडिया का सही उपयोग करें, तो कम पूंजी में भी स्वरोजगार के मजबूत अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

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यह कहानी न केवल आत्मनिर्भरता की मिसाल है, बल्कि यह भी दिखाती है कि डिजिटल माध्यम आज ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खोल रहे हैं। 

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