जबलपुर: प्राकृतिक खेती ने बदली सविता की जिंदगी
01 जुलाई 2026, जबलपुर: जबलपुर: प्राकृतिक खेती ने बदली सविता की जिंदगी – रासायनिक खेती से बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच जिले के पाटन विकासखंड के सिमरिया कंतोरा गांव की किसान सविता विश्वकर्मा ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी खेती और जिंदगी दोनों की तस्वीर बदल दी। कभी यूरिया-डीएपी और रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहने वाली सविता आज प्राकृतिक खेती के जरिए 3 एकड़ जमीन से सालाना करीब ढाई लाख रुपए की आय अर्जित कर रही हैं। उनकी सफलता अब गांव के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
सविता विश्वकर्मा के पास कुल 3 एकड़ कृषि भूमि है, जिसमें वह धान, गेहूं, उड़द और मूंग की खेती करती हैं। सिंचाई के लिए उनके पास नलकूप है और उनके पास 6 देसी गायें भी हैं, जो प्राकृतिक खेती की उनकी पूरी व्यवस्था का आधार हैं। मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन विकास खंड पाटन के अंतर्गत लक्ष्मी स्व सहायता समूह से जुड़कर व सविता ने आत्मा परियोजना से क़ृषि सखी बन बीआरसी आदान का कार्य सीखा और अब उन्नत खेती कर रही है।
रासायनिक खेती से बढ़ी परेशानी, जमीन हुई पथरीली – सविता बताती हैं कि लंबे समय तक यूरिया और डीएपी के उपयोग से उनकी जमीन की उर्वरता प्रभावित होने लगी थी। खेत की मिट्टी पथरीली होती जा रही थी, जिससे बार-बार सिंचाई करनी पड़ती थी। फसलों को कीट और रोगों से बचाने के लिए भारी मात्रा में रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता था। इससे खेती की इनपुट कॉस्ट लगातार बढ़ रही थी, जबकि उत्पादन और लाभ दोनों उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल रहे थे।
आत्मा परियोजना से मिली राह, प्रशिक्षण से बदला नजरिया– खेती में बढ़ती लागत और घटते लाभ के बीच सविता का चयन आत्मा परियोजना के माध्यम से कृषि सखी के रूप में हुआ। इसके बाद उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिया गया। शुरुआत में उन्हें संदेह था कि बिना यूरिया-डीएपी के फसल कैसे होगी, लेकिन क़ृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें पहले एक एकड़ में प्रयोग करने की सलाह दी।
प्रशिक्षण के बाद सविता ने अपनी देसी गाय के गोबर-गोमूत्र और ऐसी पत्तियों से, जिन्हें पशु नहीं खाते, जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और दशपर्णी अर्क जैसे जैविक आदान तैयार करना शुरू किया। इनका उपयोग उन्होंने खेत में किया और धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती को अपनाते रही।
पहले साल चुनौतियां, फिर दिखने लगा बदलाव – सविता के अनुसार प्राकृतिक खेती की शुरुआत आसान नहीं थी। पहले साल उत्पादन में कुछ कमी जरूर आई, लेकिन खेत की मिट्टी में नमी रुकने लगी, सिंचाई की जरूरत कम हुई और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता भी घट गई। इसका सीधा असर लागत पर पड़ा। कुछ ही समय बाद उत्पादन में सुधार हुआ और पहले की तुलना में अधिक उपज मिलने लगी। इससे उनकी आमदनी भी बढ़ी।
अब कोई खेत खाली नहीं, साल भर होती है खेती – आज सविता विश्वकर्मा अपनी 3 एकड़ जमीन पर साल भर खेती करती हैं। धान, गेहूं, उड़द और मूंग जैसी फसलें लेकर वह खेत को खाली नहीं छोड़तीं। प्राकृतिक खेती और बेहतर फसल प्रबंधन के चलते अब उनकी सालाना आय करीब 2.5 लाख रुपए तक पहुंच गई है। वह खेती के साथ-साथ जैविक आदान तैयार करने और किसानों को उसके उपयोग के बारे में बताने का काम भी कर रही हैं।
सरकारी मदद से बीआरसी संचालन, गांव में बढ़ा प्रभाव – सविता को आत्मा परियोजना की ओर से सहयोग मिला और उनकी मदद से बायो रिसोर्स सेंटर का संचालन भी शुरू हुआ। इससे गांव में प्राकृतिक खेती के प्रति रुचि बढ़ी है। पहले गांव में केवल एक-दो किसान ही प्राकृतिक खेती करते थे, लेकिन अब बीआरसी खुलने और सविता के प्रयासों से कई किसान जैविक आदानों के उपयोग की ओर बढ़ रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर उनकी निर्भरता कम हो रही है।
दूसरे किसानों के लिए बनीं प्रेरणा – सविता विश्वकर्मा की सफलता यह साबित करती है कि मेहनत, धैर्य, प्रशिक्षण और सही तकनीक के सहारे प्राकृतिक खेती न केवल लागत कम कर सकती है, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ा सकती है। साथ ही इससे मिट्टी की सेहत, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की भी रक्षा होती है। सविता आज अपने गांव और आसपास के किसानों के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं।
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