ICAR-आईजीएफआरआई ने विकसित की नई लूसर्न किस्म, देगी 90 टन प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा उत्पादन
22 मई 2026, नई दिल्ली: ICAR-आईजीएफआरआई ने विकसित की नई लूसर्न किस्म, देगी 90 टन प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा उत्पादन – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत कार्यरत भारतीय घास एवं चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) ने लूसर्न की नई उन्नत किस्म “आईजीएफआरआई-डीएल-2 (AWCL-2)” विकसित की है। इस नई किस्म को 13 मई 2025 को जारी करने की अनुशंसा की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह किस्म पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकती है, क्योंकि इससे प्रति हेक्टेयर 85 से 90 टन तक हरा चारा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
यह किस्म आनंद-2 और वीविल चेक के संकरण से विकसित की गई जनसंख्या आधारित किस्म है। लूसर्न एक बहुवर्षीय और अत्यधिक पौष्टिक दलहनी चारा फसल मानी जाती है, जिसे मुख्य रूप से सिंचित क्षेत्रों में उगाया जाता है।
पौष्टिकता और उत्पादन दोनों में बेहतर
नई लूसर्न किस्म की ऊंचाई लगभग 85 से 90 सेंटीमीटर तक होती है। इसके पत्ते हल्के गहरे हरे रंग के, छोटे और किनारों पर दाँतेदार होते हैं, जबकि इसके फूल हल्के से मध्यम बैंगनी रंग के पाए जाते हैं। इसके बीज पीले और मध्यम आकार के होते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह किस्म हर साल 85-90 टन प्रति हेक्टेयर हरा चारा और 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सूखा पदार्थ उत्पादन देने में सक्षम है। इसके अलावा इसमें 2.5 से 3 टन प्रति हेक्टेयर तक कच्चा प्रोटीन उत्पादन और 1 से 1.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज उत्पादन दर्ज किया गया है।
पशुओं के लिए अत्यधिक पौष्टिक
इस किस्म में 16 से 18 प्रतिशत तक कच्चा प्रोटीन पाया जाता है, जो पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक माना जाता है। साथ ही इसमें कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम और कई जरूरी विटामिन प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी पाचन क्षमता भी काफी अच्छी है, जिससे पशु इसे आसानी से ग्रहण कर सकते हैं। यही वजह है कि लूसर्न को “चारा फसलों की रानी” भी कहा जाता है।
रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी
नई किस्म रतुआ रोग और लीफ माइनर के प्रति प्रतिरोधी पाई गई है, जबकि वीविल और हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा जैसे कीटों के प्रति इसमें मध्यम स्तर का प्रतिरोध मौजूद है। इससे किसानों को फसल सुरक्षा पर कम खर्च करना पड़ेगा।
पशुपालकों की आय बढ़ाने में मददगार
विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार, गर्भधारण दर बढ़ाने और दूध उत्पादन के साथ दूध में वसा प्रतिशत बढ़ाने में भी सहायक है। इससे दुग्ध उत्पादकों की आय बढ़ने की संभावना है।
इसके सूखे पत्तों का उपयोग लीफ मील के रूप में पशुओं को खिलाने में किया जा सकता है। इसकी स्वादिष्टता अधिक होने के कारण पशु इसे आसानी से खाते हैं।
मधुमक्खी पालन और फार्मा उद्योग में भी उपयोगी
नई लूसर्न किस्म मधुमक्खी पालन के लिए भी उपयुक्त मानी जा रही है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने बताया कि औषधीय दृष्टि से इसका उपयोग फार्मा उद्योग में रेचक (Laxative) दवाएं तैयार करने में भी किया जा सकता है।
बड़े स्तर पर अपनाने से बढ़ेगा चारा उत्पादन
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि इस नई किस्म को देश में लूसर्न की कुल खेती के केवल 25 प्रतिशत क्षेत्र में भी अपनाया जाए, तो लगभग 20 लाख टन अतिरिक्त हरे चारे का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे देश में पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की उपलब्धता बढ़ेगी और डेयरी क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।
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