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हरियाणा के वैज्ञानिकों ने बनाई गेहूं की नई किस्म WH 1309, कम समय में देगी अधिक पैदावार; जानिए फायदे  

12 सितम्बर 2025, नई दिल्ली: हरियाणा के वैज्ञानिकों ने बनाई गेहूं की नई किस्म WH 1309, कम समय में देगी अधिक पैदावार; जानिए फायदे – हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के वैज्ञानिकों ने गेहूं की एक नई पछेती किस्म WH 1309 विकसित की है, जो कम समय में तैयार होकर किसानों को अधिक पैदावार देने में सक्षम है। यह किस्म सिर्फ 123 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को समय और लागत दोनों की बचत होती है। खास बात यह है कि यह किस्म देरी से बुवाई की स्थिति में भी अच्छा उत्पादन देती है, जो हरियाणा के मौसम और खेती की परिस्थितियों को देखते हुए बहुत ही लाभकारी है।

इस किस्म को तैयार करने का उद्देश्य किसानों को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से राहत देना है। मार्च महीने में तापमान में बढ़ोतरी के कारण पारंपरिक गेहूं की फसलों पर नकारात्मक असर पड़ता है, लेकिन WH 1309 गर्मी सहन करने में सक्षम है और इसकी उपज पर तापमान वृद्धि का ज्यादा असर नहीं होता। यह किस्म खासतौर पर हरियाणा के उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहां धान की कटाई में देरी होती है, जिससे गेहूं की बुवाई समय पर नहीं हो पाती।

अधिक उपज, मोटे दाने और रोगों से सुरक्षा

विश्वविद्यालय द्वारा किए गए फील्ड परीक्षणों में WH 1309 ने सिंचित परिस्थितियों में औसतन 55.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम 64.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज दी है। किसानों के खेतों में हुए परीक्षणों में भी इसकी औसत उपज 54.3 क्विंटल/हेक्टेयर रही, जो कि पहले की किस्म WH 1124 की तुलना में लगभग 12.7 प्रतिशत अधिक है। इसके दाने मोटे, चमकीले होते हैं और चपाती की गुणवत्ता के लिहाज से भी यह किस्म बहुत अच्छी मानी जा रही है।

यह किस्म पीला रतुआ, भूरा रतुआ और अन्य प्रमुख रोगों के प्रति काफी हद तक प्रतिरोधी है, जिससे किसानों को दवाइयों और कीटनाशकों पर खर्च कम करना पड़ेगा। इसके अलावा यह किस्म जैविक खेती और लवणीय मिट्टी के लिए भी उपयुक्त मानी गई है, जिससे इसका उपयोग अधिक क्षेत्रों में किया जा सकता है।

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बुवाई का सही समय और खाद प्रबंधन

इस किस्म की बुवाई का सबसे अच्छा समय 1 दिसंबर से 20 दिसंबर के बीच माना गया है। बीज की मात्रा 125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखी जानी चाहिए। वैज्ञानिकों की सिफारिश के अनुसार अच्छी उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 150 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस, 30 किलो पोटाश और 25 किलो जिंक सल्फेट देना चाहिए। इसकी ऊंचाई लगभग 98 सेंटीमीटर होती है, जिससे इसकी फसल में गिरने का खतरा बहुत कम होता है।

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इस किस्म की एक और बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ 83 दिनों में बालियां निकालती है और 123 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। इसमें 13.2% प्रोटीन और 81.9 किलो/हेक्टेलीटर का दाना वजन होता है, जो इसकी पौष्टिकता और बाजार मूल्य को बढ़ाता है।

इन वैज्ञानिकों ने निभाई अहम भूमिका

WH 1309 को विकसित करने में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के गेहूं एवं जौ अनुभाग की वैज्ञानिक टीम ने अहम भूमिका निभाई है। इस टीम में डॉ. विक्रम सिंह, एम.एस. दलाल, ओ.पी. बिश्नोई, दिव्या फोगाट, योगेंद्र कुमार, हर्ष, वाई.पी.एस. सोलंकी समेत कई अन्य वैज्ञानिक शामिल रहे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.आर. कांबोज और अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने इसे किसानों के लिए उपयोगी बताया है और इसके अधिक से अधिक उपयोग की सलाह दी है।

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