खेत तैयार, बारिश शुरू – खाद के इंतजार में किसान
लेखक: मधुकर पवार
26 जून 2026, भोपाल: खेत तैयार, बारिश शुरू – खाद के इंतजार में किसान – मध्यप्रदेश सरकार ने खाद वितरण में पारदर्शिता लाने और कालाबाजारी पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से ई-टोकन आधारित नई व्यवस्था लागू की है। उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन किसी भी व्यवस्था की सफलता उसकी मंशा से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से तय होती है। दुर्भाग्य से खरीफ मौसम की शुरुआत में ही यह खाद वितरण क़ी नई व्यवस्था किसानों के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं कि किसानों को ई-टोकन तो मिल रहे हैं, लेकिन खाद नहीं मिल रही है । कई किसानों को तो 25 से 30 किलोमीटर दूर केंद्रों से खाद खरीदने के टोकन मिल रहे हैं l
आवंटित केंद्र घंटों इंतजार के बाद जब यह बताया जाता है कि स्टॉक समाप्त हो चुका है या सर्वर नहीं चल रहा है, इस कारण किसान खाद प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं l टोकन की वैधता समाप्त हो जाती है, जिससे पुनः टोकन लेकर वही कवायद फिर से अपनानी पड़ती है l किसानों के लिए यह स्थिति बेहद तकलीफदायक होती है l खाद वितरण क़ी यह समस्या केवल तकनीकी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट सुविधा, डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन प्रक्रियाओं की सीमाएं और समस्याएं तो पहले से ही मौजूद हैं। बुजुर्ग किसान, बटाईदार और छोटे कृषक इस व्यवस्था में सबसे अधिक परेशान हो रहे हैं। खरीफ क़ी फसलें पूरी तरह वर्षा पर निर्भर होती और बोवनी का कार्य शुरू हो चुका है । खाद क़ी कमी के चलते बुवाई के कुछ दिन और निकल जाने पर खरीफ क़ी फसलों का रकबा भी कम हो सकता है जिससे खरीफ उत्पादकता भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में खाद के लिए किसानों को बार-बार चक्कर लगवाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। सरकार का दावा है कि प्रदेश में खाद की कोई कमी नहीं है, लेकिन यदि खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है तो किसानों की लंबी कतारें और बढ़ती शिकायतें किस ओर संकेत करती हैं? जाहिर है कि समस्या केवल उपलब्धता की नहीं, बल्कि वितरण प्रबंधन की भी है। वास्तविक मांग और सरकारी आकलन के बीच का अंतर भी सामने आ रहा है। खेत का रकबा और किसान की जरूरत हमेशा एक जैसी नहीं होती है । अतः किसानों क़ो कितना खाद चाहिए, इसकी जानकारी प्राप्त कर उपलब्धता सुनिश्चित क़ी जानी चाहिए l साथ ही उर्वरकों के संतुलित उपयोग करने के बारे में भी किसानों क़ो जागरूक करना होगा l कृषि वैज्ञानिक, कृषि विभाग के अधिकारी और कृषि विज्ञान केंद्रों क़ो और सक्रियता से इस दिशा में काम करने क़ी जरूरत है l निजी खाद विक्रेता भी अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। खाद का परिवहन, भण्डारण और प्रबंधन क़ी लागत बढ़ने और एमआरपी की बाध्यता के कारण अनेक विक्रेताओं ने खाद का कारोबार सीमित कर दिया है।
इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। परिणाम यह है कि किसान न तो सहकारी समितियों से पर्याप्त खाद प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही निजी बाजार से खरीद पा रहे हैं l अधिक कीमत देकर भी किसानों क़ो खाद नहीं मिल रहा है l कालाबाजारी पर अंकुश तो लग गया है लेकिन किसानों क़ो खाद क़ी उपलब्धता के बावजूद नहीं मिलना, व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है l डिजिटल तकनीक का विरोध नहीं किया जा सकता। कृषि क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए तकनीक का उपयोग समय की मांग है। लेकिन किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उसकी जमीनी तैयारियां पूरी होना आवश्यक है। यदि तकनीकी खामियां, स्टॉक प्रबंधन की कमियां और वितरण संबंधी अव्यवस्थाएं दूर नहीं की गईं, तो अच्छी मंशा वाली यह व्यवस्था किसानों के लिए बोझ बन सकती है। इसका खामियाजा किसानों क़ो भुगतना पड़ रहा है l
सरकार को चाहिए कि वह तत्काल जमीनी स्तर से प्राप्त शिकायतों की समीक्षा कर ई-टोकन प्रणाली की कमियों को दूर करे और वितरण केंद्रों की संख्या बढ़ाए l साथ ही किसानों क़ी आवश्यकता के मद्देनजर पर्याप्त स्टॉक उपलब्धता सुनिश्चित करे। जब तक नई व्यवस्था पूरी तरह स्थिर नहीं हो जाती, तब तक पारंपरिक व्यवस्था को भी समानांतर रूप से जारी रखी जा सकती ताकि किसानों क़ो समय पर खाद उपलब्ध हो सके l किसान को तकनीक से नहीं, खाद पर्याप्त और चाही गई खाद समय पर नहीं मिल पाने क़ी समस्या है। यदि समय पर खाद नहीं मिली तो उसका नुकसान केवल किसान का नहीं, बल्कि पूरे कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का होगा। खाद नहीं मिलने क़ी स्थिति में काफ़ी संख्या में किसान बोवनी नहीं करने का भी मन बना रहे हैं l इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ई-टोकन व्यवस्था किसानों की सुविधा का माध्यम बने, उनकी नई परेशानी का नहीं।
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