भदोही में किसानों को मिली ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी की खेती की नई राह
10 अक्टूबर 2026, भदोही: भदोही में किसानों को मिली ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी की खेती की नई राह – परंपरागत धान-गेहूं की खेती छोड़कर भदोही के किसान अब ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी जैसी नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। जिले की पुरानी कलेक्ट्रेट स्थित उद्यान विभाग कार्यालय में मंगलवार को दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ, जिसमें 48 किसानों को आधुनिक बागवानी की बारीकियां सिखाई गईं।
जिला उद्यान अधिकारी ममता सिंह यादव ने किसानों को ड्रैगन फ्रूट, स्ट्रॉबेरी और टिशू कल्चर केले की खेती का तरीका समझाया। उन्होंने विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी भी किसानों को दी, जिनके जरिए इन फसलों पर अनुदान लिया जा सकता है।
एक बीघा में ड्रैगन फ्रूट, मुनाफे की उम्मीद
प्रशिक्षण में शामिल किसान सिमांत मिश्रा पहले से करीब एक बीघा खेत में ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि परंपरागत फसलों के मुकाबले इसमें लागत भले ही शुरुआत में ज्यादा लगती है, लेकिन एक बार पौधा लग जाने के बाद कई साल तक उपज मिलती रहती है। कार्यक्रम में बताया गया कि स्थानीय बाजार में ड्रैगन फ्रूट 120 रुपये प्रति फल या इससे अधिक दाम में बिक जाता है।
प्रशिक्षण में फिरोज अहमद, धर्मेंद्र कुमार मौर्य, सुभाष सिंह, प्रकाश गुप्ता और नीरज कुमार पांडेय समेत कई किसान मौजूद रहे। अधिकारियों ने किसानों को समझाया कि ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों में सिंचाई की जरूरत भी धान-गेहूं के मुकाबले कम पड़ती है, जिससे पानी की बचत होती है।
धान-गेहूं से आगे बढ़ने की तैयारी
उद्यान विभाग का कहना है कि भदोही में अभी ज्यादातर किसान धान और गेहूं की ही खेती करते हैं, लेकिन मिट्टी और मौसम की स्थिति को देखते हुए कुछ नई फसलें भी यहां अच्छी उपज दे सकती हैं। विभाग आगे भी समय-समय पर इस तरह के प्रशिक्षण आयोजित करने की योजना बना रहा है, ताकि ज्यादा किसान इन फसलों से परिचित हो सकें और अपनी आमदनी के स्रोत बढ़ा सकें। प्रशिक्षण में शामिल किसानों ने विभाग से मांग की कि अनुदान की प्रक्रिया को और आसान बनाया जाए, ताकि छोटे किसान भी इसका लाभ उठा सकें।
प्रशिक्षण में बताया गया कि ड्रैगन फ्रूट का पौधा एक बार लगने के बाद करीब दो दशक तक फल देता रहता है, जिससे शुरुआती निवेश के बाद सालों तक नई लागत कम ही लगती है। स्ट्रॉबेरी की खेती में उपज जल्दी मिलने लगती है, लेकिन इसे ठंड के मौसम में ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। टिशू कल्चर केले के बारे में बताया गया कि इससे पौधों में बीमारी लगने का खतरा परंपरागत तरीके से तैयार पौधों के मुकाबले कम रहता है और उपज भी एक समान मिलती है।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि जिले में कई किसान अभी भी सिर्फ परंपरागत खेती पर निर्भर हैं, जिससे मौसम की मार या बाजार में दाम गिरने पर उन्हें सीधा नुकसान उठाना पड़ता है। नई फसलों की तरफ कदम बढ़ाने से किसानों के पास आमदनी के एक से ज्यादा विकल्प रहेंगे। विभाग ने किसानों को सलाह दी कि वे शुरुआत में कम क्षेत्र में ही नई फसल लगाकर अनुभव लें, इससे पहले कि पूरी जमीन पर एक साथ प्रयोग करें।
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