राज्य कृषि समाचार (State News)किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)

केंचुए ने बदली किसान आशीष की किस्मत! वर्मी कम्पोस्ट से सालाना कमा रहे लाखों, जानिए उनकी सफलता का राज

13 सितम्बर 2025, भोपाल: केंचुए ने बदली किसान आशीष की किस्मत! वर्मी कम्पोस्ट से सालाना कमा रहे लाखों, जानिए उनकी सफलता का राज – मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के गांव रिंडा के किसान आशीष पाटीदार अपने खेतों में जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने केंचुओं के जरिए शुद्ध वर्मी कम्पोस्ट (जैविक खाद) बनाना शुरू किया है। इससे न केवल उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है, बल्कि आसपास के किसान भी उनसे जैविक खाद प्राप्त कर रहे हैं और वे उन्हें जैविक खेती की सलाह भी देते हैं। उन्होंने बताया कि जैविक खेती की शुरुआत उन्होंने मंदसौर के उद्यानिकी विभाग से प्रशिक्षण लेकर की। 

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वहां उन्हें 2 किलो केंचुए और पूरी तकनीकी जानकारी मिली। इसी सहयोग और अपनी मेहनत के बल पर वे एक साल में 300 कट्टे जैविक खाद तैयार कर चुके हैं। उनकी बनाई खाद को किसानों ने बहुत पसंद किया, खासकर अफीम और लहसुन की खेती करने वाले किसानों ने इसे हाथोंहाथ अपनाया। उन्होंने इसे 500 से 550 रुपये प्रति कट्टा की दर से बेचा है।

पर्यावरण और आमदनी दोनों संवारते मंदसौर के किसान

दलोदा अखिलानंद गौशाला में वे खुद जैविक खाद बनाते हैं और वहीं से गोबर भी लाते हैं। गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने में उनका योगदान है। उनके पास 10 बीघा जमीन है, जिसमें वे जैविक खेती करते हैं और अच्छी कीमत पर फसल बेचते हैं। कृषि विभाग की बलराम तालाब योजना का भी उन्होंने लाभ लिया है। इस योजना से जल संरक्षण, जैविक खेती और आय तीनों में सुधार होता है।

आशीष रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते। इसके बजाय वे नीम खली, गौमूत्र, दशपर्णी अर्क और जीवामृत जैसे जैविक उपायों से कीटों का नियंत्रण करते हैं। खेत में बची नरवाई (फसल अवशेष) को जलाने के बजाय वे उसे डी-कंपोजर और जीवामृत से सड़ाकर पोषक जैविक खाद बनाते हैं, जिससे मिट्टी स्वस्थ रहती है और उत्पादन बढ़ता है।

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भविष्य की योजनाएं और प्रकृति से जुड़ाव

जैविक खाद के निर्माण से आशीष पाटीदार को अच्छी आय हुई है। अब वे इस काम को व्यवसाय के रूप में और बढ़ाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में वे हर साल 1000 से 1500 कट्टे जैविक खाद बनाएंगे। इसके लिए वे एक नई, छोटी यूनिट स्थापित करने की योजना बना रहे हैं। वे सिर्फ मुनाफा ही नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण की सेवा को भी महत्व देते हैं। उनका मानना है, “खेती सिर्फ मुनाफे का जरिया नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने का माध्यम भी है।

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