औषधीय गुणों से भरपूर तुम्बा की खेती शुष्क एवं अतिशुष्क क्षेत्रों में आय का जरिया

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15 फरवरी 2021, जयपुर। औषधीयों गुणों से भरपूर तुम्बा की खेती शुष्क एवं अतिशुष्क क्षेत्रों में आय का जरिया बहुत ही कम बारिश होने की वजह से किसनों के लिए रेगिस्तान में जहां एक ओर फसल उत्पादन करना बहुत कठिन कार्य है, वही दूसरी तरफ खरीफ फसल में खरपतवार ने नाम से जाने वाला तुम्बा आजकल आय का अच्छा जरिया बन रहा है। सूखे क्षेत्रों में पशुपालन ही अधिकतर किसानों का जीवनयापन करने का एकमात्र साधन है। हरे एवं सूखे चारे के अभाव की वजह से पशुपालकों को अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ता है। रेगिस्तान में तुम्बा आसानी से पनपने की वजह से किसानों के लिए एक अतिरिक्त आय का साधन बन सकता है। तुम्बा का छिल्का पशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के साथ साथ देशी एवं आयुर्वेदिक औषधीयों में काम आता है। इसके अलवा गाय, भेड़, बकरी व ऊंट आदि में होने वाली बीमारियों के उपचार में काम आता है। इसकी पत्तियां बकरियों के पौष्टिक चारे के रूप में काम आती है तथा उनका दूध बढ़ाती है। तुम्बा पशुओं में थनों पर सूजन को कम करने वाला, कृमि को निकालने में मददगार, पशु की पाचन शक्ति को बढ़ाने वाला और रक्त को शुद्ध करने का कार्य करता है। पशु आहार के साथ एक तुम्बा पशु को रोज खिलाने से पशु स्वस्थ एवं बीमारियों से दूर रहता है। रेगिस्तान में किसान तुम्बा को खरपतवार के तौर पर देखा करते थे। लेकिन आजकल इसकी मांग औषधीयों गुणों से भरपूर होने की वजह से बाजार में अधिक होने के कारण अच्छे दामों पर बिक्री हो जाती है। तुम्बा का अचार, केंडी, मुरब्बा और चूर्ण बना कर घरेलू उपयोग के साथ साथ बाजार में बेचकर मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। शुष्क और अतिशुष्क क्षेत्र में तुम्बा जैसी फसल को अपनाया जाना आवश्यक हो गया है जो बहुत ही कम वर्षा व व्यय में संभव है। यह खरीफ के मौसम की फसल होने साथ ही भू-संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पेट साफ करने, मानसिक तनाव, पीलिया, मूत्र रोगों में लाभदायक है। तुम्बा को इंद्रायण, सिट्रलस कॉलोसिंथस एवं बिटर ऐपल इत्यादि नामों से जाना जाता है। इसके फल के गूदे को सुखाकर औषधि के लिए काम में लाते हैं।

ऐसे तैयार होता है तुम्बे का आचार व केंडी

सर्वप्रथम तुम्बे का छिलका उतारकर चुने के पानी में सात से आठ दिनों तक भिगोकर रखा जाता है ताकि यह मीठा हो जाए। एक किलो चूना प्रति चार किलो तुम्बा के लिए पर्याप्त होता है। इस चूने को उपयोग में लाने से पूर्व दस लीटर पानी डालकर रात भर के लिए रखने के पश्चात चूने के पानी को निथारकर कपड़े से छानकर इसको अलग करके इसमे तुम्बे को साथ से आठ दिनों तक के लिए डाल दिया जाता है। इसके बाद में इसको साफ पानी से धोया जाता है। अब इसको धूप में सुखाया जाता है, ताकि इसकी नमी पूरी तरह से खत्म हो सके। इसके बाद में सूखे हुए तुम्बे में हल्दी, राई, मेथी, सौंफ, जीरा, हिंग, सरसों का तेल डाल दिया जाता है। सुखाने के बाद की प्रक्रिया ठीक उसी तरह रहेगी जैसे की साधारण आचार बनाने की होती है। यदि इस सूखे हुए तुम्बे को चीनी की चासनी में उबालकर रख दिया जाय तो यह केंडी बन जाती है। पौष्टिक एवं स्वादिष्ट तुम्बे का अचार बाजार में 400 रूपये किलो तक बिकता है जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है।

तुम्बे का चूर्ण भी करें तैयार

  • तुम्बे का चूर्ण पेट, बदहजमी, गैस इत्यादि में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। सर्वप्रथम तुम्बे का काटकर इसमें आवश्यकता अनुसार काला नमक, सैंधा नमक, सफेद नमक, अजवाइन और मेथी मिलाकर इसको दस से पन्द्रह दिनों तक डिब्बे में बंद करके छाया में रख दिया जाता है। इसके पश्चात इसको निकालकर धूप में दस से पन्द्रह तक सुखा लिया जाता है ताकि इसकी नमी पूरी तरह से खत्म हो जाय । अब इसको मिक्सर में अच्छी तरह से पीसकर चूर्ण तैयार कर लिया जाता है। इसका सेवन समस्या होने पर बहुत कम मात्रा में करें।
    औषधीयों गुणों से भरपूर तुम्बा होता है फायदेमंद
    आयुर्वेद में इसे शीतल, रेचक और गुल्म, पित्त, उदररोग, कफ ,कुष्ठ तथा ज्वर को दूर करने वाला कहा गया है। यह निम्नलिखित तरह से फायदा पहुंचता है –
  • तुम्बा के बीजों का तेल नारियल के तेल में मिलाकर सिर में नित्य मालिश करने से सफेद बाल काले हो जाते है । तुम्बा की जड़ का चूर्ण गुड़ के साथ इस्तेमाल करने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • मधुमेह में सुगर लेवल बढऩे पर तुम्बा के 5 से 7 फलों को पैरों से नित्य 10 मिनट तक कुचले, इससे बढ़ी हुई शुगर अपने स्तर पर आ जाती है। यह प्रयोग मधुमेह में काफी लाभ देता है। तुम्बा की जड़ का नश्य देने से मिर्गी रोग में काफी लाभ मिलता है।
  • अगर आपको खांसी कई दिनों से है और ठीक नहीं रही है तो तुम्बा के पक्के फल में 10-15 कालीमिर्च भर दे और धूप में रख दे।
  • रोज एक कालीमिर्च-पिप्पली और शहद के साथ मिलाकर सेवन करे
  • कैसी भी कफ खांसी हो ठीक हो जाती है ।
  • तुम्बा की जड़ को पीसकर इसे हल्का गरम करके सूजन वाली जगह बाँधने से सूजन जल्दी ही ठीक हो जाती है और कब्ज की समस्या में तुम्बा की जड़ का चूर्ण 1 ग्राम की मात्रा में गुड के साथ सेवन करने से कब्ज खत्म हो जाएगी ।
  • 3 ग्राम बड़ी तुम्बा के मूल चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर खाने से सर्पदंशजन्य अथवा बिच्छू दंश वेदना आदि के विषाक्त प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है। तुम्बा के जड़ के चूर्ण में सरसों के तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से बुखार से आराम मिलता है। तुम्बा के फल के गूदे को गरम करके पेट पर बाँधने से आँतों में स्थित कीड़े मर जाते है ।
  • सिरदर्द में तुम्बा की जड़ को तिल के तेल में पक्का ले। इस तेल की मस्तक पर मालिश करने से सिरदर्द की समस्या जाती रहती है और फोड़े फुंसियों में तुम्बा की जड़ को पीस कर इसका लेप प्रभावित स्थान पर करने से फोड़े फुंसियां बैठ जाती है ।
    कैसे और कब करें इसकी खेती
    पहली वर्षा के बाद जून-जुलाई माह का समय बुआई हेतु उपयुक्त रहता है। सामान्यत: यह 150-300 मिमी वाले क्षेत्रों में इस फसल का अच्छा उत्पादन होता हैं। इसके बीजों की बुवाई 3 मीटर दूरी पर व कतारों में 1-1 मीटर पर की जाती है। एक स्थान पर दो उपचारित बीज 2 से.मी. गहराई तक गाढऩा उचित होता है। एक एकड़ में 250 ग्राम बीज पर्याप्त होते है। इसके पौधे नर्सरी के रूप में उगाकर पौध के माध्यम से भी रोपण किये जाते हैं। इस प्रकार बीजों की आवश्यकता आधी रह जाती है। नवम्बर-दिसम्बर महिने में फल पीले पडऩे पर तोड़ लिये जाते है अत: इसकी दो बार तुड़ाई करें। पहली तुड़ाई नवम्बर के अंत में और दूसरी दिसम्बर के अंत में की जानी चाहिये। फल सूखने पर बीज अलग कर लेते है एक एकड़ में लगभग 2 क्वि. बीज प्राप्त होते हंै। एक एकड़ में लगभग 3-3.5 क्वि. फल प्राप्त होते है ।
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