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राज्य कृषि समाचार (State News)

प्राकृतिक खेती का आधार है बीजामृत: कम लागत में करें बीज उपचार, फसल रहेगी रोगमुक्त

16 जुलाई 2026, भोपाल: प्राकृतिक खेती का आधार है बीजामृत: कम लागत में करें बीज उपचार, फसल रहेगी रोगमुक्त – खेती की बढ़ती लागत और रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों के बीच प्राकृतिक खेती (Natural Farming) किसानों के लिए एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। प्राकृतिक खेती की शुरुआत बीज संस्कार (बीज उपचार) से होती है, जिसमें बीजामृत का विशेष महत्व है। यह एक प्राकृतिक घोल है, जो बीजों को फफूंद, कीट तथा मिट्टी जनित रोगों से बचाकर स्वस्थ अंकुरण और बेहतर फसल विकास में सहायक होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार बीजामृत बीजों के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करता है। इसके उपयोग से बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ती है, लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और पौधों की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है। इससे रासायनिक बीज उपचार पर होने वाला खर्च भी कम हो जाता है।

ऐसे तैयार करें बीजामृत

बीजामृत तैयार करने के लिए लगभग 20 लीटर पानी में 5 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर, 5 लीटर देशी गाय का गौमूत्र, 50 ग्राम चूना (जिसे पहले पानी में घोलकर रखा गया हो) तथा खेत की मेड़ या बरगद-पीपल जैसे स्वस्थ वृक्ष की जड़ों के पास की एक मुट्ठी उपजाऊ मिट्टी मिलाई जाती है। इस मिश्रण को अच्छी तरह घोलकर कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है, जिससे इसमें लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं।

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इसके बाद बीजों को इस घोल से अच्छी तरह उपचारित कर छाया में सुखाया जाता है और फिर बुवाई की जाती है। इससे बीजों को प्रारंभिक अवस्था में रोगों से सुरक्षा मिलती है और अंकुरण अधिक समान एवं स्वस्थ होता है।

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किसानों को मिलते हैं अनेक लाभ

बीजामृत के नियमित उपयोग से रासायनिक फफूंदनाशकों की आवश्यकता कम हो जाती है, खेती की लागत घटती है और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता बनी रहती है। साथ ही फसल की प्रारंभिक वृद्धि मजबूत होने से उत्पादन क्षमता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों के लिए बीजामृत पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। कम लागत में घर पर तैयार होने वाला यह जैविक घोल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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