मानसून की बेरुखी से बिगड़ सकता है खेती का गणित, किसानों की बढ़ेगी चिंता
02 सितंबर 2026, भोपाल: मानसून की बेरुखी से बिगड़ सकता है खेती का गणित, किसानों की बढ़ेगी चिंता – दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम दौर में देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश ने कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। मानसून की यह बेरुखी केवल खेतों तक सीमित रहने वाली समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर किसान की आमदनी से लेकर बाजार में खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और आम परिवारों की रसोई तक दिखाई दे सकता है। देश में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आय और रोजगार का प्रमुख आधार है, इसलिए वर्षा का असंतुलन सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
इस बार स्थिति कुछ अलग तरह की है। कहीं बारिश कम होने से खरीफ फसलों की बुवाई और बढ़वार प्रभावित हुई है, तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है। यानी किसान के सामने संकट दोनों तरफ से है। जहां पानी की कमी है, वहां सिंचाई का संकट है और जहां पानी अधिक गिरा है, वहां जलभराव और फसल खराब होने की आशंका है।
बारिश कम रहने का सबसे बड़ा असर उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि प्रमुख फसलों की पैदावार घटती है तो बाजार में आपूर्ति प्रभावित होगी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर आम आदमी के घरेलू बजट पर पड़ेगा। दूसरी ओर कम उत्पादन का मतलब किसानों की आय में कमी भी हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून का स्वरूप लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। कभी कम समय में अत्यधिक बारिश और कभी लंबे अंतराल तक सूखा जैसी स्थिति खेती के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। ऐसे में केवल मानसून पर निर्भर कृषि व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है।
जरूरत है कि सिंचाई के वैकल्पिक साधनों का विस्तार हो, खेत-तालाब और जल संचयन को बढ़ावा मिले तथा किसानों को मौसम आधारित सलाह समय पर उपलब्ध कराई जाए। साथ ही फसल बीमा, भंडारण और आपदा राहत व्यवस्था को मजबूत करना होगा। मानसून की अनिश्चितता को देखते हुए अब खेती को मौसम के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत तैयारी और तकनीक के सहारे सुरक्षित करने का समय है।
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