हरियाणा के किसान ने पांच किस्मों की हल्दी से बदली अपनी किस्मत
16 सितंबर 2026, सोनीपत: हरियाणा के किसान ने पांच किस्मों की हल्दी से बदली अपनी किस्मत – हरियाणा के सोनीपत जिले के मोई माजरी गांव में किसान जोगिंदर राणा ने परंपरागत खेती छोड़कर हल्दी की खेती अपनाई और आज सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने अपने खेत में पांच अलग-अलग किस्मों की हल्दी उगाई है, जिनमें देसी राजेश्वरी, आमी, काली, कस्तूरी और लकाडोंग शामिल हैं।
शुरुआत में जोगिंदर राणा ने आधा एकड़ जमीन पर हल्दी की खेती शुरू की, जिससे उन्हें करीब 2 लाख रुपये की आमदनी हुई। इस सफलता को देखते हुए उन्होंने धीरे-धीरे अपना रकबा बढ़ाकर 3.5 एकड़ कर लिया, जिससे अब उन्हें सालाना करीब 6 लाख रुपये की शुद्ध आय हो रही है।
हरियाणा में परंपरागत रूप से गेहूं-धान का फसल चक्र ही ज्यादा प्रचलित रहा है, जिसमें भूजल का इस्तेमाल भी काफी ज्यादा होता है। ऐसे में हल्दी जैसी मसाला फसल की ओर रुख करना न सिर्फ आमदनी बढ़ाने का जरिया बना, बल्कि पानी की खपत घटाने के लिहाज से भी एक अहम बदलाव माना जा रहा है।
हल्दी की खेती में धान की तुलना में सिंचाई की जरूरत काफी कम रहती है, और एक बार बोई गई फसल करीब आठ-नौ महीने बाद तैयार होती है। इस दौरान खरपतवार नियंत्रण और सही जल निकासी का खास ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि जड़ में पानी भरने से हल्दी की गांठ सड़ने का खतरा रहता है।
सिर्फ उत्पादन नहीं, वैल्यू एडिशन पर भी जोर
जोगिंदर राणा कहते हैं, “खेती में केवल उत्पादन बढ़ाना ही जरूरी नहीं, बल्कि फसल की विविधता, प्रोसेसिंग और सही मार्केटिंग के जरिए किसान अपनी आय को कई गुना तक बढ़ा सकते हैं।” वे अपनी हल्दी को सीधे बेचने की बजाय उसका पाउडर और चिप्स बनाकर बेचते हैं, जिससे उन्हें कच्ची हल्दी के मुकाबले काफी बेहतर दाम मिलता है।
उन्होंने अपने खेत में हल्दी के साथ प्याज की सहफसली खेती भी शुरू की है, जिससे एक ही जमीन से दो फसलों की आमदनी हो रही है। इसके अलावा वे अपने बीज खुद तैयार करते हैं और आसपास के किसानों को भी बेचते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त कमाई होती है।
देश में हल्दी की बड़ी खपत मसाला उद्योग और घरेलू बाजार दोनों में होती है, और ज्यादातर उत्पादन अभी भी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे परंपरागत हल्दी उत्पादक राज्यों से आता है। ऐसे में उत्तर भारत के किसानों का हल्दी की ओर रुख करना मसाला बाजार में आपूर्ति के नए स्रोत खोल सकता है।
हल्दी की गांठों को उबालने, सुखाने और पॉलिश करने के बाद ही उसका पाउडर तैयार किया जाता है, और यही प्रोसेसिंग प्रक्रिया कच्ची हल्दी के मुकाबले किसान को कहीं बेहतर दाम दिलाती है। जोगिंदर राणा की सही मार्केटिंग रणनीति की बदौलत ही उन्हें कच्चे माल के बजाय तैयार उत्पाद बेचकर ज्यादा मुनाफा मिल पा रहा है।
आसपास के किसानों के लिए बनी मिसाल
जोगिंदर राणा की सफलता को देखकर क्षेत्र के कई किसान अब पारंपरिक फसलों की जगह मसाला फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। हरियाणा जैसे राज्य में, जहां गेहूं-धान का चक्र आमतौर पर प्रचलित है, वहां हल्दी जैसी मसाला फसल की सफलता किसानों के बीच नई उम्मीद जगा रही है।
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